शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

कौन कहता है प्रलय नहीं हुयी ...?

बहुत दिनों से खबर पढने को मिल रही थी 2012 में दुनिया समाप्त हो जाएगी। इस खबर पर न्यूज़ चैनलो पर बड़े ही जोर शोर से प्रचारित भी किया जा रहा था। लोग चिंतित थे की दिसम्बर में दुनिया समाप्त होगी। 2012 बीत गया और लोग खुशियाँ मनाने लगे, राहत की साँस लिए की चलो दुनिया बच गयी। हो सकता है की दुनिया बच  गयी हो, पर भारत में प्रलय आई और लोंगो ने महसूस ही नहीं किया। मानव जीवन भले ही बच गया हो पर प्रलय को कोई भी नहीं रोक पाया। हमारा जमीर मर गया। हमारा स्वाभिमान मर गया और हम कहते हैं की प्रलय नहीं। क्या बचा है हमारे अन्दर। कहते हैं की जब इन्सान का सम्मान मर जय उसका स्वाभिमान मर जाय  तो उसके पास कुछ नहीं बचता है। हम जी रहे हैं। हमारी सांसे चल रही हैं पर हम जो जिन्दगी जी रहे हैं। क्या हम इसी जिन्दगी की अपेक्षा करते हैं। दिल्ली में दामिनी के साथ जो बलात्कार किया गया और उसके साथ जो बर्बरता की गयी वह मानवता को शर्मसार कर गयी। समाचार पत्रों में बलात्कार की घटनाएँ सुखियों में छपने लगी। एक बाढ़  सी आ गयी। लगाने लगा जैसे पूरे देश में सारे कम बंद हो गए हैं। सिर्फ बलात्कार हो रहे है, पता नहीं कितनी दमिनियाँ हैवानियत का शिकार हो गयी। देश के छोटे बढे सभी शहरों गावो में बलात्कार की घटनाएँ सामने आने लगी।
मन में सहज रूप से एक सवाल सा उठाना शुरू हो गया। यदि दामिनी के साथ वही घटना उसके गृह जनपद बलिया में घटी होती तो क्या सर्कार जागती। क्या इसी तरह आन्दोलन किया जाता। इसका जवाब भले ही लोंगो की नागाह में कुछ भी हो पर मेरी निगाह में सिर्फ ना ही है। क्योंकि बलात्कार की खबरे देश के कोने कोने से आना शुरू हो गयी किन्तु कही से भी आन्दोलन की खबरे नहीं आई। जिस जगह पर घटनाएँ हुयी वह के लोंगो का जमीर नहीं जागा क्योंकि जमीर तो मर चूका है। किसी ने बयां दिया था की दिल्ली में लोग टीवी पर आने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं। क्या उनका बयान सच नहीं है। यदि सच नहीं है तो देश के उन सभी जगहों पर आन्दोलन होने चाहिए थे जहाँ पर छोटी छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ। वे भी गरीब घर की बच्चियां थी, यदि वहां पर भी आन्दोलन होते तो शायद सरकार की आंख खुलती और उनके परिवारों को भी आर्थिक सहायता मिलती।
दामिनी के गाँव में राजनितिक रोटी सेंकने के लिए राजनेताओ का जमावड़ा लग रहा है। नेताओ को वोट की फिकर लगी है लिहाजा आर्थिक सहायता भी दी जा रही है। सभी राजनितिक लोंगो को यह भय सताने लगा है की कही दामिनी की लहर में उनका वोट बैंक न बह जाय ।
इसी बीच एक और घटना घटी भारत की सीमा की सुरक्षा करने वाले दो सैनिको की हत्या कर दी गयी। यहाँ किसी का जमीर नहीं जागा  कोई आन्दोलन नहीं हुआ। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री एक सैनिक को कन्धा देने पहुंचे पर उत्तरप्रदेश में वीर को कोई सम्मान नहीं मिला। प्रदेश की सर्कार डर  गयी शायद कही पाकिस्तान नाराज़ न हो हो जाय और वोट बैंक खिसक जाय।
सच में प्रलय आ चुकी है हमारा जमीर, मान सम्मान स्वाभिमान सब मर चूका है। यदि हम जिन्दा होते  तो पूरे देश में एक क्रांति आणि चाहिए थी ताकि पाकिस्तान की हिम्मत हिंदुस्तान को घूरने की नहीं होती और किसी मासूम का बलात्कार नहीं होता। 

1 टिप्पणी:

Savita Mishra ने कहा…

बहुत सही लेख ...हमारा भी मानना है लोग अपनी तस्वीरे खिचवाने के लिए आन्दोलन से जुड़े फिर पुलिस से दो दो हाथ होने पर यानी रोकने पर इसने विराट रूप ले लिया आन्दोलन में सभी युवक युवतिया थे और हमारा मानना है समाज में नेताओं और पुलिस के प्रति लोगो में जहर भरा है वह आन्दोलन के रूप में निकला ना की लड़की की मदद के लिय आये थे ..यदि ऐसा होता तो दिल्ली में दिन दहाड़े ऐसी घटनाओं की भरमार ना होती ना बच्चियों के साथ भारत जैसे नारी को देवी का दर्जा देने वाले देश में ऐसी घटनाओं की भरमार होती ..वैसे यह भी बस किताबी और ख्बाब सा है रिअल में औरतो को अपने ही देश में जितनी हेय दृष्टि से लोग देखते है यह किसी से भी नहीं छुपा है