शनिवार, 5 जनवरी 2013

राजनितिक वर्चस्व में लोकतंत्र की हत्या

भदोही ब्लाक प्रमुख चुनाव ने उठाये सवालिया निशान
राजनितिक वर्चस्व की जंग में क्या सचमुच लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। यह सवाल आज हर भदोही वासी के दिल में उठ रहा है किन्तु लोंगो के मन में भय है और कोई भी खुलकर बोलने से कतरा रहा है। चुनाव के दौरान जो हालात पैदा हुए क्या वह लोकतंत्र में होना चाहिए, यदि हां तो मान लीजिये की कोई भी व्यक्ति अब महफूज़ नहीं रह गया है।
बता दे की अब राजनीती सेवा का माध्यम नहीं बल्कि वर्चस्व और व्यवसाय का  माध्यम बन चूका है। यही वजह है की कोई भी व्यक्ति अब राजनीती को गन्दी बताकर इसमें आना नहीं चाहता है। शायद यह सही भी है   के दौरान जो हालात पैदा हो रहा है वह तो यही बता रहे हैं। 4 जनवरी को भदोही ब्लाक प्रमुख चुनाव में जो भी हुआ वह लोकतंत्र के लिए घातक है। मात्र 114 क्षेत्र पंचायत सदस्यों के लिए भदोही जनपद के सभी अधिकारी ही नहीं लगे थे बल्कि मिर्ज़ापुर और सोनभद्र से भरी संख्या में फ़ोर्स मंगाई गयी थी। चौरी रोड पर दो किलोमीटर की परिधि में कोई भी नहीं आ जा सकता था। सारी दुकाने बंद थी। कर्फ्यू जैसा माहौल था। लोंगो के दिलो में भय था। पूरा जनपद इस चुनाव को लेकर सशंकित था। लोग पल पल की ख़बरें ले रहे थे। यह मुकाबला प्रशांत सिंह और सुनीता यादव के बीच था। प्रिंट मीडिया में जो खबरे आई उसमे साफ साफ लिखा गया की यह मुकाबला प्रशांत और प्रह्ससं के बीच था। क्षेत्र पंचायत सदस्यों के डर का आलम यह था की वे लोग एक ट्रक में मवेशियों की तरह बैठकर आये। आखिर यह डर किससे था। आखिर उन्हें क्यों डर सता रहा था की वे सुरक्षित मतदान स्थल तक नहीं पहुँच पाएंगे। आने के बाद भी उन्हें प्रशासन द्वारा घंटो बैरियर पर क्यों रोक लिया गया। चैनलों पर खबर आने के बाद ही उन्हें मतदान की अनुमति मिली। आखिर क्यों? यह सवाल अभी तक लोंगो के दिलों में है।
सबसे बड़ी बात यह है की हजारों लोंगो का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षेत्र पंचायत सदस्य इतने नासमझ कैसे हो गए की उन्हें अपना वोट देने भी नहीं आया। कुल पड़े 112 मतों में 23 मत अवैध घोषित हो गए। यह एक आश्चर्य नहीं तो और क्या है। जिन जनप्रतिनिधियों को जनता ने ही चुन कर अपना प्रतिनिधित्व करने भेजा वे खुद वोट देना नहीं चाहते। यदि 114 लोंगो को वोट देने के लिए पूरा प्रशासन ऐसे ही लगा रहा तो सामान्य चुनाव कैसे होंगे।
लोंगो को सोचना होगा की लोकतंत्र की स्थापना इसलिए हुयी थी की लोग अपना वोट बिना किसी भय के देकर अपनी सर्कार अपनी इच्छा के अनुरूप चुन सके। पर जिस तरह राजनीती में अपराध का बोलबाला बढ़ता जा रहा है क्या यह आने वाले दिनों में लोकतंत्र के लिए घातक नहीं है। शायद ऐसे ही हालत धीरे धीरे हर जगह हो रहे हैं। यदि इसी तरह हालात बनते रहे तो लोंगो को मंथन करना होगा की आने वाले दिनों में देश के हालात क्या होंगे। 

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