शनिवार, 29 दिसंबर 2012

थैंक्स गॉड दामिनी को बुला लिया

आज सुबह उठा तो फिजा में कुहरा छाया हुआ था। सोच रहा था की ऐसे मौसम में कहा जाये। घर से बाहर सड़क पर निकला तो कुछ मित्र मिले और उनके मुह से यह सुनते ही जैसे सदमा  लगा की दामिनी मर गयी। दिल के किसी कोने में दर्द का एहसास हुआ। महसूस हुआ की आँखों में कुछ नमी सी आ गयी है। दिल उदास हो गया। जिसके लिए लाखो लोग दुआएं कर रहे थे उसे भगवान  ने क्यों बुला लिया।
ओह याद आया भगवान् ने लोंगो की दुआएं सुन ली तभी तो उसे अपने पास बुलाया। लिखने का कुछ मन नहीं हो रहा रहा था। पर सुबह की मौन संवेदना में ऊपर वाले से बात करने का जो एहसास हुआ। सोचा उसे ही लिख डालू।
जिस दिन दामिनी के साथ घटना घटी उसी दिन से वह असहनीय पीड़ा के दौर से गुजर रही थी। उस दिन
शाम को वह जब घर से फिल्म देखने  निकली होगी तो मन में उमंगें होंगी। वह भविष्य के सपने बुन रही होगी जैसे तमाम लड़कियां अपने जीवन के सपने बुनती होंगी। कितनी मस्ती में पोपकोर्न खाते हुए फिल्म देखि होगी। वह से जब घर के लिए निकली होगी तो उसे एहसास भी नहीं होगा की कुछ हैवानियत के दरिन्दे उसकी जिन्दगी को तबाह करने का कही मंसूबा बना रहें होंगे। देखते ही देखते उसका जीवन एक ऐसे हादसे का शिकार हो जायेगा की उसका अंतिम पड़ाव सिर्फ मौत ही होगी।
हे प्रभु तुम बहुत ही दयावान हो। वे लोग नासमझ हैं जो तुम पर इलज़ाम लगते हैं की तुम्हे किसी की भावनाओ का ख्याल नहीं रहता। तुम किसी के दर्द को एहसास नहीं करते। गलत हैं लोग तुम तो बहुत ही दयालू हो। तुम्हे पता था की वह कितने दर्द से गुजर रही थी। उसका शरीर एक शरीर नहीं बल्कि डाक्टरों के लिए प्रयोगशाला बन गया था। जिस तरह एक मिटटी के खिलौने को कुम्हार बनाता और तोड़ता है उसी तरह तो दामिनी के  साथ भी हो रहा था। कुछ लोग उसके घायल जिस्म को राजनीती का आखाडा भी बना दिए थे। भगवन बहुत अच्छा किया जो उसे अपनी पनाह में बुला लिया। वह बच  भी जाती तो क्या होता। उसके साथ जो हुआ क्या वह एहसास उसे जीने देता। बलात्कारियों ने तो सिर्फ एक बार ही हैवानियत दिखाई। पर हमारे नेता चुनाव के दौरान बार बार उसके साथ बलात्कार करते। उसके ज़ख्मो को बार बार कुरेदा  जाता। उसे राजनितिक मुद्दा बना दिया जाता। उस दौरान उसे जो एहसास होता क्या वह जी पाती। शायद नहीं। जब वह बाहर निकलती तो क्या लोंगो की चुभती निगाहों को वह सहन कर पाती। आज जो लोग उसके लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। क्या उनकी निगाहे उसकी हंसी नहीं उड़ाते। क्या उसे उपेक्षा और तिरस्कार का दंश नहीं झेलना  पड़ता। लोंगो की निगाहों में सहानुभूति भी होती तो क्या वह सहन कर पाती।
दामिनी तुम भले ही चली गयी पर तुमने एक नयी बहस भी छेड़ दी है। लोंगो को जागरूक किया है। शायद तुम्हारे बलिदान का असर सर्कार पर हो और एक नए कानून का सृजन हो। हो सकता है कुछ और दामिनियाँ तुम्हारी वजह से बच  जाये। तुमने उन लडकियों को हिम्मत दी है। जो हालातों से घबरा जाती हैं। तुम मरी नहीं हो दामिनी बल्कि तुमने बलिदान दिया है। तुम महान  हो क्योंकि तू आततायियों के सामने झुकी नहीं बल्कि तुमने अपनी अस्मिता के लिए अपनी जान को न्योछावर कर दिया। तुम महान हो दामिनी। भगवान तुम्हारी आत्मा को शांति प्रदान करे।
भगवान् तुम्हे भी धन्यवाद की तुमने दामिनी को असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिला  दी।

                           दामिनी को सच्ची श्रद्धांजलि 

8 टिप्‍पणियां:

कविता रावत ने कहा…

भगवान् ऐसा दुःख और सजा किसी को न दे ....
उसका बलिदान व्यर्थ न जाय अब हर एक को यही सोचना और करना है ....दामिनी के बलिदान को नमन!

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

शानदार अभिव्यक्ति,
जारी रहिये,
बधाई।

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

शालिनी कौशिक ने कहा…

बहुत सही बात कही है आपने .सार्थक अभिव्यक्ति भारत सरकार को देश व्यवस्थित करना होगा .

अरूण साथी ने कहा…

dukhad, dardna, par samaj hi ise mita sakta he..

हरीश सिंह ने कहा…

aap sabhi ka aabhar

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बेटी दामिनी को श्रद्धांजलि

हम तुम्हें मरने ना देंगे
जब तलक जिंदा कलम है..

Savita Mishra ने कहा…

जब वह सड़क किनारे पड़ी थी तो यही दिल्ली नोयडा वासी क्या सब मर गये थे ....हो हल्ला मचाना आजकल लोगो का व्योसाय सा बन गया है मोमबत्ती जलाई आन्दोलन किया फिर शांत ..सामने जब घटना होती है तब तो सांप सुघ जाता है सबको .....दामिनी मर गयी अच्छा हुआ वर्ना यही आन्दोलन कारी ही शायद उसे जीने ना देते .....और अब तक ना जाने कितनी तो भेंट चढ़ चुकी ..और प्रभु जाने कितनी चढ़नी बाकी है इस सिरफिरे घटिया समाज और लोगो के हाथो