शनिवार, 29 दिसंबर 2012

थैंक्स गॉड दामिनी को बुला लिया

आज सुबह उठा तो फिजा में कुहरा छाया हुआ था। सोच रहा था की ऐसे मौसम में कहा जाये। घर से बाहर सड़क पर निकला तो कुछ मित्र मिले और उनके मुह से यह सुनते ही जैसे सदमा  लगा की दामिनी मर गयी। दिल के किसी कोने में दर्द का एहसास हुआ। महसूस हुआ की आँखों में कुछ नमी सी आ गयी है। दिल उदास हो गया। जिसके लिए लाखो लोग दुआएं कर रहे थे उसे भगवान  ने क्यों बुला लिया।
ओह याद आया भगवान् ने लोंगो की दुआएं सुन ली तभी तो उसे अपने पास बुलाया। लिखने का कुछ मन नहीं हो रहा रहा था। पर सुबह की मौन संवेदना में ऊपर वाले से बात करने का जो एहसास हुआ। सोचा उसे ही लिख डालू।
जिस दिन दामिनी के साथ घटना घटी उसी दिन से वह असहनीय पीड़ा के दौर से गुजर रही थी। उस दिन
शाम को वह जब घर से फिल्म देखने  निकली होगी तो मन में उमंगें होंगी। वह भविष्य के सपने बुन रही होगी जैसे तमाम लड़कियां अपने जीवन के सपने बुनती होंगी। कितनी मस्ती में पोपकोर्न खाते हुए फिल्म देखि होगी। वह से जब घर के लिए निकली होगी तो उसे एहसास भी नहीं होगा की कुछ हैवानियत के दरिन्दे उसकी जिन्दगी को तबाह करने का कही मंसूबा बना रहें होंगे। देखते ही देखते उसका जीवन एक ऐसे हादसे का शिकार हो जायेगा की उसका अंतिम पड़ाव सिर्फ मौत ही होगी।
हे प्रभु तुम बहुत ही दयावान हो। वे लोग नासमझ हैं जो तुम पर इलज़ाम लगते हैं की तुम्हे किसी की भावनाओ का ख्याल नहीं रहता। तुम किसी के दर्द को एहसास नहीं करते। गलत हैं लोग तुम तो बहुत ही दयालू हो। तुम्हे पता था की वह कितने दर्द से गुजर रही थी। उसका शरीर एक शरीर नहीं बल्कि डाक्टरों के लिए प्रयोगशाला बन गया था। जिस तरह एक मिटटी के खिलौने को कुम्हार बनाता और तोड़ता है उसी तरह तो दामिनी के  साथ भी हो रहा था। कुछ लोग उसके घायल जिस्म को राजनीती का आखाडा भी बना दिए थे। भगवन बहुत अच्छा किया जो उसे अपनी पनाह में बुला लिया। वह बच  भी जाती तो क्या होता। उसके साथ जो हुआ क्या वह एहसास उसे जीने देता। बलात्कारियों ने तो सिर्फ एक बार ही हैवानियत दिखाई। पर हमारे नेता चुनाव के दौरान बार बार उसके साथ बलात्कार करते। उसके ज़ख्मो को बार बार कुरेदा  जाता। उसे राजनितिक मुद्दा बना दिया जाता। उस दौरान उसे जो एहसास होता क्या वह जी पाती। शायद नहीं। जब वह बाहर निकलती तो क्या लोंगो की चुभती निगाहों को वह सहन कर पाती। आज जो लोग उसके लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। क्या उनकी निगाहे उसकी हंसी नहीं उड़ाते। क्या उसे उपेक्षा और तिरस्कार का दंश नहीं झेलना  पड़ता। लोंगो की निगाहों में सहानुभूति भी होती तो क्या वह सहन कर पाती।
दामिनी तुम भले ही चली गयी पर तुमने एक नयी बहस भी छेड़ दी है। लोंगो को जागरूक किया है। शायद तुम्हारे बलिदान का असर सर्कार पर हो और एक नए कानून का सृजन हो। हो सकता है कुछ और दामिनियाँ तुम्हारी वजह से बच  जाये। तुमने उन लडकियों को हिम्मत दी है। जो हालातों से घबरा जाती हैं। तुम मरी नहीं हो दामिनी बल्कि तुमने बलिदान दिया है। तुम महान  हो क्योंकि तू आततायियों के सामने झुकी नहीं बल्कि तुमने अपनी अस्मिता के लिए अपनी जान को न्योछावर कर दिया। तुम महान हो दामिनी। भगवान तुम्हारी आत्मा को शांति प्रदान करे।
भगवान् तुम्हे भी धन्यवाद की तुमने दामिनी को असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिला  दी।

                           दामिनी को सच्ची श्रद्धांजलि 

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

भदोही की पत्रकारिता का युगपुरुष पुरुष मिथिलेश द्विवेदी

 युवा पत्रकार मिथिलेश जी 
जनपद निर्माण के पुर्व से ही भदोही की पत्रकारिता ने हमेशा अपनी लेखनी के माध्यम से विभिन्न मुद्दों को उठाकर विकास व सामाजिक बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किन्तु पिछले कई वर्षो में जिस तरह पत्रकारिता का व्यवसायी कर्ण हुआ है और संस्कारविहीन लोग इस क्षेत्र में भागीदारी निभाने की शुरुआत किये है। उससे पत्रकारिता का स्तर दिनोदिन गिरता दिखाई दिया है। वही कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से पत्रकारिता और पत्रकारों का सम्मान बढाने व  बचाने  में महती भूमिका निभाई है। अभी तक वरिष्ठ पत्रकार  हरीन्द्र नाथ उपाध्याय, लक्ष्मी शंकर पाण्डेय, प्रभुनाथ शुक्ला, सुरेश गाँधी, नागेन्द्र सिंह  जैसे कुछ  पत्रकार हैं जिन्होंने  अपनी निष्पक्ष लेखनी का लोहा मनवाया है। इनमे से कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें सामाजिक व प्रशासनिक स्तर पर धमकियाँ दी गयी या फिर फर्जी मामलो में फंसने का दुष्चक्र रच गया।
इन्ही में पत्रकारों में जनपद के एक ऐसी पत्रकार का नाम भी शामिल है जिसने अपनी उत्क्रिस्ट लेखनी का परचम जनपद ही नहीं वरन राष्ट्रिय स्तर तक लहराया है। जिसकी लेखन शैली पठनीय होने के साथ समाज को एक सन्देश भी देती है। सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दे को यह युवा पत्रकार जिस गंभीरता से प्रस्तुति करता है। वह निश्चय ही काबिले तारीफ होता है। कुछ दिनों पहले फेसबुक के माध्यम से अपनी बेटी को पिता का नाम दिलाने का प्रयास करने वाली डिंपल मिश्र नामक महिला की बात को जब उक्त पत्रकार ने अपनी लेखनी के माध्यम से उठाना शुरू किया तो वह आवाज़ इस गूंजी की जिसने भी सुना वही एक पिडित महिला की आवाज़ बन गया और जनपद के इतिहास में यह मामला दर्ज हो गया। जी हां हम बात कर रहे हैं युवा पत्रकार मिथिलेश द्विवेदी की जो सिमित संसाधनों में भी अपना लोहा मनवाने के लिए लोंगो को विवश कर दिया।
मिथिलेश द्विवेदी भदोही जनपद के महुआरी जंगीगंज निवासी व वरिष्ठ पत्रकार बलराम दुबे व हीरावती देवी  के पुत्र है। इनका जन्म 8 जनवरी 1978 को हुआ। इन्होने 1993 में हाईस्कूल  की शिक्षा बैरीबिसा और 1995 में  इंटर की शिक्षा सागरपुर बवाई से ली। 1998 में ज्ञानपुर से स्नातक करने के बाद इलाहाबाद से पत्रकारिता में डिप्लोमा लिया। लेखन का शौक इन्हें पढाई के दौरान से ही था। पत्रकारिता की शुरुआत श्री द्विवेदी ने मुंबई से की। वहा पर उत्तरभारतीयो में लोकप्रिय समाचार पत्र यशोभूमि के साथ कई अखबारों में काम  किया। तत्पश्चात भदोही लौट आये और वाराणसी से प्रकाशित हिंदी दैनिक अख़बार आज में लेखन शुरू किया। इसके बाद अमर उजाला  में काम  करने के पश्चात् 2006 में दैनिक  जागरण में काम  करना शुरू किया। आज तक अनवरत दैनिक जागरण में ही कार्यरत हैं। मिथिलेश जी की लेखन शैली का ही कमाल  है की किसी न किसी मुद्दे को लेकर वे चर्चित होते रहे। गत वर्ष ज्ञानपुर में एक कैदी की बर्बर पिटाई का मुद्दा उठा कर जेल में चल रहे तालिबानी कानून की पोल खोलकर सनसनी मचा  दी। यह मुद्दा भी राष्ट्रिय स्तर पर चर्चित हुआ। इस वर्ष के नवम्बर माह में डिंपल मिश्र प्रकरण को इन्होने जिस गंभीरता से उठाया वह सामाजिक सरोकार से जुड़ा  एक ऐसा मुद्दा था। जिससे तमाम महिलाये पीड़ित हैं। मिथिलेश जी ने प्रिंट मीडिया के साथ चैनलों को भी मजबूर कर दिया और सभी ने डिंपल के मुद्दे को प्राथमिकता दी ।उन्होंने पंचायतो को भी जागरूक किया।  यह मामला यदि राष्ट्रिय स्तर पर चर्चित हुआ तो वह मिथिलेश और दैनिक जागरण की देन रही।
इस दौरान उन्हें कई विषम परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ा। एक तरफ दबंगों की धमकियाँ मिली तो दूसरी तरफ उन्हें खरॆएदने का प्रयास भी किया गया किन्तु स्वच्छ पत्रकारिता को समर्पित हो चूके इस शख्स को न तो भय विचलित कर पाया और न ही  लालच।
दूसरी तरफ  इस प्रकरण को लेकर पत्रकारिता का एक विकृत रूप भी सामने आया। चंद रूपये की लालच में कुछ पत्रकार बिक भी गए। जिसे जनपद के लोंगो ने महसूस भी किया। वही एक समाचार पत्र के संवाददाता ने फर्जी फायरिंग और पथराव की झूठी खबर फैलाकर मिथिलेश के मनोबल को तोड़ने का प्रयास किया। किन्तु समाज और पत्रकारिता के लिए समर्पित हो चुके इस युगपुरुष का मनोबल इतना अडिग है की उसे तोडना असंभव है। 

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

क्या यू पी को है किसी बलात्कार का इंतजार

क्या यू  पी को है किसी बलात्कार का इंतजार
दिल्ली में हुए बलात्कार की घटना के बाद हुए आन्दोलन को लेकर पूरे देश में एक उबाल सा आ गया। पीडिता के पक्ष में हुए धरना प्रदर्शन की जो शुरुआत दिल्ली में हुयी उसका असर पूरे देश में देखा गया। चाहे मीडिया में चेहरा दिखने की ललक हो या घटना के बाद उपजे आक्रोश का परिणाम किन्तु इसे एक सुखद शुरुआत कही जा सकती है की लोग जागरूक हुए और पीडिता के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद की। इसका असर भी देखने को मिला। राज्यपाल ने कहा है की अब ऐसे मामलो को अनदेखा नहीं किया जायेगा। हालाँकि उनके शब्द अवश्य अलग हैं किन्तु भाव यही है। उन्होंने स्पेशल कमिश्रनर सुधीर यादव का नंबर (09818099012) और ईमेल (splcptraffic@gmail.com) आईडी दी। कहा है  कि पीड़ित लड़कियां या महिलाएं कभी भी इस नंबर और ईमेल आईडी पर अपना कंप्लेंट दर्ज करवा सकती हैं। पुलिस तुरंत हूबहू पीड़ित के शब्दों में कंप्लेंट दर्ज करेगी। टालमटोल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। साथ ही, पुलिसवालों को महिलाओं के साथ सभ्य तरीके से पेश आने की ट्रेनिंग दी जाएगी। एयरपोर्ट के प्राइवेट कैब्स के ड्राइवरों, बसों और ऑटो ड्राइवरों के लिए फोटो आईडी कार्ड जरूरी कर दिया गया है। ये आई कार्ड पुलिस वेरिफिकेशन के बाद ही ड्राइवरों को जारी किए जाएंगे।
यह एक अच्छी शुरुआत है। किन्तु यही शुरुआत अगर इस घटना से पहले हुयी होती शायद आज ऐसी परिस्थितियां नहीं बनती। या फिर लोग धरना प्रदर्शन नहीं करते तब भी न तो किसी अधिकारी के ऊपर कार्यवाही होती और न ही फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनाये जाने की पहल होती।

ऐसा नहीं है की देश के और भी जगहों में ऐसी घटनाये नहीं होती है। महिलाओ के ऊपर अत्याचार और बलात्कार की घटनाये आम बात हो गयी है। उत्तरप्रदेश भी इन मामलो में पीछे नहीं है। स्कूल जाते समय लडकियों की छेड़खानी जैसी घटनाये आम बात बात हैं। यदि कोई लड़की या उसके अभिभावक थाने  में जाते हैं तो उनकी बाते नहीं सुनी जाती। लोग एकजुट होकर मांग करें की उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में महिलाओ से जुड़े मामले की सुनवाई तुरंत हो। इश्वर न करे की कोई ऐसी घटना किसी की बहन बेटी के साथ घटे किन्तु महिला उत्पीडन और बलात्कार जैसी घटनाओ के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बने और मामलो की सुनवाई त्वरित हो। 

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

क्या सचमुच रेहान दोषी है ... ?

होली के रंग में सराबोर रेहान, शमसुद्दीन, दानिश और अन्य 
मुहर्रम पर्व पर एक बार फिर दो दिलो में दरार पैदा करने का असफल प्रयास किया गया। किन्तु भदोही की गंगा जमुनी तहजीब और भाईचारे को कलंकित करने का जो मंसूबा लोग पाले बौठे थे उन्हें मुह की खानी पड़ी। भदोही की अवाम ने बता दिया की हम लोग कालीन के ताने बाने  की तरह हमेशा एक दुसरे  गुंथे रहे हैं और गुंथे रहेंगे। हमें तोडं पाना किसी के बस की बात नहीं है। कुछ लोंगो ने यहाँ पर दंगा होने की अफवाह फैलाई की किन्तु यह कदापि दंगा नहीं था। चंद  सिरफिरों की कारगुजारियों को हम दंगा कहा भी नहीं सकते। बवाल करने में जो भीड़ देखि गयी उसमे अधिकतर नए उम्र के बच्चे थे जो आवेश में आ गए और बवाल खड़ा हो गया। इसमें समाज का बुद्धिजीवी तबका नहीं बल्कि अनपढ़ और जाहिल लोग थे।
मुशायरे में रेहान को सम्मानित करते आयोजक 
हालाँकि प्रशासन और यहाँ के लोंगो को धन्यवाद देना होगा की उन्होनो सूझबूझ दिखाई और दो दिन में ही माहौल ऐसे परिवर्तित हुआ जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। यदि मामले की शुरुआत में ही पुलिस ने सख्ती दिखाई होती तो शायद मामला शुरू में ही शांत हो गया होता पर ऐसा हो नहीं पाया।
मुझे झटका तब लगा जब आरोपियों में रेहान हाशमी  का नाम सामने आया। रेहान हासमी एक ऐसा युवा है जो अपनी शायरी के चलते पूरे देश में वाहवाही लूट रहा है। वह मुशायरे की शान बन चूका है। उसने भदोही में अपनी पत्रकारिता व समाजसेवा के चलते भी अलग पहचान बनायीं है।
आप सोच रहे होंगे की विवाद के इतने दिनों बाद मैं यह क्यों लिख रहा हूँ। दरअसल आज नगर के कुछ स्थानों पर मैं गया। कई जगह ठण्ड के कारन लोग कांप रहे थे। अलावा नहीं जल रहे हैं। लोग रेहान को याद कर रहे थे। जब ठण्ड शुरू होती थी तो रेहान लोंगो से सहयोग लेकर ठेले पर लकडिया लादकर जगह जगह अलाव जलाया करता था। लोंगो की दुआये लेता था। यही वजह रही की लोग उसे याद कर रहे हैं। आज आरोपी बनाये जाने से वह गायब है। उसका पता नहीं है। पता नहीं वह कहा होगा। लोग उसे याद कर रहे हैं।
रेहान ने बताया था मुझे जब दरोपुर में विवाद हुआ तो वह घर पर था। सुबह 9 बजकर 16 मिनट पर एक अधिकारी का फ़ोन आया और वह बुलाने पर गया ताकि वह लोंगो को समझा सके।
उस वक्त मैं ऑफिस में था जब फ़ोन आया मेरे पास और बताया गया की दरोपुर में विवाद हुआ है। ऑफिस से निकल कर कोतवाली पहुंचा। वह पर हलचल मची थी। पैदल दरोपुर की तरफ भगा। वह जाकर देखा तो हालात बेकाबू थे लोग तनाव में थे। अधिकारीयों के पसीने छूट रहे थे। विधायक जाहिद बेग का  सर फुट चूका था। भीड़ बेकाबू हो गयी थी। रेहान भीड़ को संभल रहा था। यह भीड़ रेहान के समझाने पर भी मानने को तैयार नहीं थी। वह लोंगो की गलिया सुन रहा था। कई लोंगो ने उसे भी इट पत्थर से मारे। पर वह डटा था। पोलिस भले ही पीछे थी किन्तु वह लोंगो को संभाल रहा था। माहौल ख़राब हो चूका था। लोंगो में भय था। अराजक तत्व अपने गंदे मंसूबो को अंजाम देने पर तुले थे। प्रशासन के लिए यह संकट का समय था। सुबह लोंगो ने बताया की रेहान रात भर अधिकारीयों के साथ मोहल्ला दर मोहल्ला जाकर ताजियादारो का अनुनय विनय किया। लोंगो से ताजिया दफ़न करने की मिन्नते की। किसी तरह ताजिया दफ़न हुआ।
घटना के लगभग एक सप्ताह बाद मामला उभर कर सामने आया की रेहान भी अराज़क तत्वों में शामिल है। ऐसा पुलिस का कहना रहा।
मैं बड़े अचरज में पड़ा। आखिर जो युवक  अधिकारी के बुलावे पर ही घटना स्थल पर गया और रात भर अधिकारियो के साथ ही रहा उसे विवाद भड़काने का मौका कब मिला। यदि यह सही है तो वह निश्चय ही बहुत चालाक है जो अधिकारियो को चकमा देकर विवाद भड़काने में भी लगा रहा।
होली के दिन मुझे रंगों से बहुत डर लगता है, पर रेहान रंगों में सराबोर हो जाता है। होली दीपावली पर जो मस्ती वह करता है शायद मैं भी नहीं कर पाया था। जो युवक अपनी शायरी से भदोही का नाम देश के जगहों पर जाकर रोशन कर रहा है। जो आने वाले दिनों में भदोही की पहचान बनने  वाला है। यदि वह वास्तव में वह दोषी है तो उसे सजा जरूर मिलनी चाहिए। क्योंकि यदि उसने ऐसा किया तो  उसने मेरा भी विश्वास तोडा है। किन्तु इस मामले की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। उसका दोष क्या है, उसने कहा पर गलती की यह जानकारी मीडिया को भी मिलनी चाहिए। प्रशासन को चाहिए की उसकी गलतियों को उजागर करे और साक्ष्य के साथ सबके सामने रखे। पर उसका दोष नहीं है तो क्या वह जिस मानसिक दबाव से गुजर रहा है उसकी भरपाई कौन करेगा ...? 

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

लड़की खिलौना नहीं, तोड़ो और फेंक दो

एक खबर पढ़कर मन बहुत विचलित हुआ, उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही एक लड़की अपने प्रेमी के साथ फिल्म देख कर घर जा रही थी और चाँद सिरफिरे लोंगो ने उसकी अस्मत को लूटा उअर चलती बस से फेंक दिया। मरणासन्न अवस्था में उसे अस्पताल में भरती कराया गया। शायद वह लड़की बच  भी जाय। पर क्या वह सामान्य जीवन जी पायेगी शायद नहीं। ऐसी घटनाये आये दिन घट रही  हैं। ऐसी घटनाओ को अंजाम देने वाले जिन्हें नरपिशाच की संज्ञा देना उचित समझूंगा। वे बड़े घर के बिगडैल बेटे ही होंगे। क्या पुलिस उनका पता लगा पाई है। यदि नहीं लगा पाई तो क्यों ? डेल्ही जैसे शहर में सुरक्षा के दृष्टि से जगह जगह सीसी टीवी कैमरे लगाये गए हैं। सफ़ेद रंग की वह बस कही न कही किसी कैमरे में कैद हुयी होगी। पर मैं समझता हूँ की धनकुबेरो के कुपुत्र अपनी मर्दानगी पर कही जाकर जश्न मना रहे होंगे और किसी दिन फिर एक बड़ी घटना को अंजाम देंगे। सर्कार के नुमैन्दे उनको बचाने की जुगत में लगे होंगे। क्योंकि उन्ही धनकुबेरो के पैसे से हमारे जनप्रतिनिधियों के शौक पूरे होते हैं।
देखा जाय तो असली दोषी वे नहीं  हैं। बल्कि दोषी वे हैं जो इन्हें बचाने के प्रयास में लगे होंगे। जिस लड़की के साथ यह घटना घटी है। उसके परिवार की हालत क्या होगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। उनके मन मष्तिस्क में तूफ़ान उठा होगा उसकी हम सिर्फ कल्पना कर सकते हैं किन्तु उस दर्द को वही महसूस कर सकता है जिसके ऊपर यह बीत रहा होगा।
कुछ लोग यह भी सोच रहे होंगे की एक लड़की को रात को फिल्म देखने जाने की जरूरत ही क्या थी। पर सोचने वाली बात यह है की वह घटना जब घटी तो उस समय रात के दस भी नहीं बजे होंगे। महानगरो के लिए यह समय कोई मायने नहीं रखता है। हम सामाजिक समानता की बात करते हैं। हम यह भी गर्व करते हैं हमारे देश की नारियां चाँद पर पहुँच चुकी है। यह भी कहा जाता है की एक शिक्षित महिला ही परिवार को शिक्षित कर सकती है। कहने का तात्पर्य यही है की बिना महिलाओ के शिक्षित हुए बिना समाज शिक्षित नहीं हो सकता।
पर सोचना यह भी होगा की जब तक इस तरह के नर पिशाच दिल्ली में घुमते रहेंगे तो लोग अपनी लडकियों को दिल्ली भेजकर उच्च शिक्षा दिलाना गवारा करेंगे शायद नहीं। आज पूर्वांचल के कई शहरो से लोग अपनी लड़कियों को महानगरो में भेजते है। वे सोचते हैं की यदि उनकी लड़की पढ़ लिख लेगी तो वह अपने परिवार के साथ देश का नाम भी रोशन करेगी। पर इस घटना सिर्फ उसी एक परिवार को दुःख के भवर में नहीं धकेला है, बल्कि उन सभी परिवारों को भयाक्रांत कर दिया है। जिनके घर की लड़कियां आज महानगरो में जाकर पढ़ रही हैं। हजरों परिवार आज भयभीत होंगे। ऐसी घटनाएँ सिर्फ एक परिवार नहीं बल्कि हजारो लाखो परिवारों के मन में एक अंजना सा भय पैदा कर देती हैं। सवाल यह उठता है की हमारी सर्कार ऐसी घटनाओ को रकने के लिए और दोषियों को सजा दिलाने के लिए कौन सा कदम उठती है या इसे मात्र एक घटना मानकर इसे राजनितिक बयानबाज़ी तक सिमित रख कर भूल जाती है। लड़की एक खिलौना नहीं है जिसके साथ खेलो और तोड़कर फेंक दो। वह किसी की बेटी और बहन है। वह कैसे सुरक्षित रहेगी यह सोचना हम सभी का दायित्व है।

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

ग्रामीण मीडिया कमजोर नहीं -- मिथिलेश द्विवेदी और डिंपल मिश्र

बड़े शहरो में रहने वाले लोग ग्रामीण क्षेत्र के पत्रकारों को उतनी अहमियत नहीं देते देखा जाय तो यही कहना श्रेयस्कर होगा की ग्रामीण अंचल के पत्रकारों को बड़े शहरों में देखने का नजरिया कुछ अलग होता है। पर देखा जाय तो ग्रामीण अंचल के पत्रकार एक अभाब ग्रस्त जीवन जीने के साथ जो पत्रकारिता करते है। वह निश्चय ही प्रशंसनीय है। यह सौ फीसदी सत्य है की देश की 80 प्रतिशत आबादी गाव में बसती है। पर गावो की समस्याओ को न तो समाचार पत्र में और न ही न्यूज़ चैनल में विशेस जगह दी जाती है। सारी खबरे महानगरो पर ही आश्रित रहती है।
एक नहीं कई मामले मैंने देखे है। किसी समाचार पत्र में [नाम नहीं लूँगा] शुक्रवार को एक खबर छपी थी की दो मुस्लिम है गुजरात के जो मोदी को ही वोट देंगे। मैं सोचा शीर्षक के बाद कुछ विशेष मसाला होगा। पर बहुत ही सामान्य खबर थी और उसे मुख्य पेज पर स्थान दिया गया था। मैं सोचता रहा आखिर क्यों ..?
चैनलो पर छोटी छोटी घटनाये यदि महानगरो की है तो प्रमुखता से दिखाई जाती है या छप जाती है। पर उससे बड़ी घटना या खबर छोटे नगरो या ग्रामीण क्षेत्रो में घटती हैं तो वह चैनल या अख़बार के लिए मायने नहीं रखता है।  क्योंकि वह खबर लिखने वाला पत्रकार एक छोटे से कसबे का है। आखिर बड़े पत्रकारों को यह कैसे हजम हो की छोटी जगह का पत्रकार मुख्य पेज पर आये। एक तो कम संसाधन में मेहनत  का काम  करे दुसरे  उसके हौसले को भी नहीं देखा जाता। शोषण की बात उठाने वाला कितना शोषित खुद होता है इसकी कल्पना न तो कोई करता है और न ही उसके तकलीफों को महसूस करता है।


मिथिलेश द्विवेदी और डिंपल मिश्र 
आज दिल कह रहा था कुछ लिखने का जो सच हो। बिना किसी लाग लपेट के वह भी डंके की चोट पर। हो सकता है किसी को कुछ बुरा लगे पर क्या करे अपनी आदत ही बेलगाम है।
डिंपल मिश्र एक बेसहारा महिला जो पति की बेवफाई का शिकार हुयी। अपनी बच्ची को लेकर किसी तरह जीवन गुजर बसर करती रही। पिता ने मरने से पहले एक छत सर पर छोड़ दी थी। अपनी बच्ची को लेकर दर दर की ठोकर खा रही महिला लोंगो से गुहार लगा रही थी। उसे सबसे बड़ा डर यह था की जब उसकी बेटी बड़ी होगी तो उससे पूछेगी की उसका बाप कौन है वह क्या बताएगी। उसे यह चिंता नहीं थी की उसका पेट कैसे भरेगा। उसे सिर्फ यह चिंता थी की उसका सम्मान कैसे रहेगा। वह पिछले चार महीने से लोंगो को अपना दुखड़ा सुना रही थी। पर कोई सुनने को तैयार नहीं। लोग भरोषा देते थे की वे उनके साथ है पर कैसे साथ हैं यह कोई बताने को तैयार नहीं था। वह मजाक बन गयी थी।
एक दो बार खबरे भी छपी पर फार्मेल्टी के तौर पर।
मिथिलेश द्विवेदी। भदोही के ऐसे पत्रकार का नाम जिसे कोई डर या लालच विचलित नहीं कर सकता। उसके लिए पत्रकारिता पूजा है। समर्पण है। मेरा सौभाग्य है की दैनिक जागरण में लगभग  तीन साल मिथिलेश जी के सानिध्य में बहुत कुछ सीखने को मिला। मैं भले ही अख़बार से अलग हो गया पर उनसे मेरा जुडाव हमेशा बना  रहा। वे मुझे बड़ा भाई मानते रहे और मैं उन्हें अपना गुरु मानता रहा। कुछ ऐसा ही प्रेम है हम दोनों के बीच।
डिंपल मिश्र की बार बार गुहार सुनकर वे विचलित हो गए और उसके हौसले को मजबूत किये जब वह आने को तैयार हुयी तो उन्होंने सहयोग का भरोषा जगाया। मुझे आश्चर्य होता है की दैनिक जागरण के सम्मानित संपादक ने उनका साथ दिया और वे लग गए मिसन में। अपनी बेटी को गोद में लेकर म्हणत मजदूरी करने वाली एक लड़की को उल्हासनगर के लोंगो ने चन्दा  देकर भदोही भेज दिया और जिस भदोही के एक युवक ने उसे धोखा दिया था उसी भदोही के एक पत्रकार ने उसे सम्मान दिला दिया। मिथिलेश के समर्पण और पत्रकारिता के के प्रति आश्था ने डिंपल के साथ हजारो हाथ कर दिए। ऐसे हालत पैदा हुए की सभी मीडिया को डिंपल के साथ खड़ा होना पड़ा। मिथलेश ने यह दिखा दिया की गाव में रहने वालो पत्रकारों में प्रतिभा की कमी नहीं है। कमी सिर्फ यह है की वे चाटुकार नहीं है । उन्हें मठाधीशों के चरण वंदन करने नहीं आता है। वे सम्मान के भूखे है।  यह गाव में रहने वाले एक पत्रकार की निष्ठां ही थी की मुंबई से लेकर पूरे देश की मीडिया इस मुद्दे पर एकजुट दिखाई दी। जिस संस्थान ने मिथिलेश के साथ हमेशा अन्याय किया है। उसी ने उन्हें आत्मिक शांति की अनुभूति भी करायी। जो गरीब अबला आत्महत्या की बात करती थी आज उसका मनोबल मजबूत हुआ है। वह सम्मान की भूखी थी और उसे सम्मान मिल गया। अब आचल नहीं पूछेगी की उसका बाप कौन है। और यह सब हुआ सिर्फ और सिर्फ डिंपल के विश्वास और डिंपल के मुह्बोले भाई मिथिलेश द्विवेदी के कारण। आज यदि भदोही की मीडिया का नाम पूरे देश में उछला है तो उसका श्रेय सिर्फ मिथिलेश जी को जाता है। और दुसरे उनके सहयोगियों के समर्थन का भी जो उनके साथ कंधे से कन्धा मिलकर खड़े रहे।

अभी और भी है दास्ताँ। 
{ डिम्पल मिश्र प्रकरण सिर्फ प्रेम विवाह में धोखा खायी एक महिला की दास्ताँ नहीं है। बल्कि गावो से महानगरो में पहुंचकर पथभ्रष्ट हो चुके युवको के लिए एक नजीर भी है। शायद इस तरह के कई मामले अभी प्रकाश में आने है क्योंकि डिंपल की दिलेरी ने महिलाओ को नयी रह दिखाई है। वही भदोही की मीडिया का एक कुरूप चेहरा भी सामने आया है। किस तरह मीडिया के लोग इस तरह के मुद्दों पर बिकते हैं। किस तरह की राजनीती करते है वह भी सामने आया है। इस 11 दिनों में बहुत कुछ देखने को मिला। किस तरह से मिथिलेश जी लड़े। किस तरह उनके साथ रहने वाले ही उन्हें हताश करने का प्रयास किये। इस कहानी के पीछे जो कुरूप चेहरा दिखाई दिया। वह भी यहाँ उजागर होगा। वह भी डंके की चोट पर]


गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

नारी सम्मान का इतिहास प्यार शादी धोखा और भरोसा



डिंपल मिश्र ने बदल दिया भदोही मीडिया और फेसबुक का इतिहास
वाराणसी के एक छोटे से गाँव में पैदा हुयी एक मासूम सी बच्ची बारह वर्ष की उम्र में मुंबई गयी, वह मुंबई के सायन उपनगर में अपने पिता माँ और दो भाइयो के साथ रहती थी, १९९२ में जब बाबरी ढांचा ढहाया गया तो मुंबई में दंगा भड़क उठा, एक मासूम बालिका को लोंगो ने हाथ में तलवार लेकर घेर लिया, उसकी आँखों के सामने कई लोंगो को मार दिया गया, उसका घर जला दिया गया, हालाँकि लोंगो ने उसे बच्ची जानकर छोड़ दिया, उसका परिवार भाग कर एक नयी बन रही बिल्डिंग में शरण ली, उस लड़की को परिवार वाले प्यार से सोनिया बुलाते थे, जिसका नाम है डिंपल मिश्र,
पिता ने ठाणे जिला के उल्हासनगर में घर बनाया, बड़ी हुयी तो कपडा मिल काम करने वाले उसके पिता बलवंत मिश्र रिटायर हो गए, एक विकलांग भाई गाँव में रहने लगा और दूसरा भाई पिता और बहन का साथ छोड़कर अलग घर बसा लिया, १९९८ में माँ भी बेसहारा छोड़कर चली गयी,
अपने पिता और अपना पेट पालने के लिए वह रिलायंस में काम करने लगी, उसका काम था बकाया बिलों की वसूली करना, एक दिन वह भूल से अपने निजी मोबाइल द्वारा एक बकायेदार ठाणे निवासी विपिन मिश्र को फ़ोन कर दिया, विपिन मूलतः भदोही जनपद के गोपीगंज थाना क्षेत्र के मूलापुर गाँव का रहने वाला है,
उसका no मिलने के बाद विपिन बार बार फ़ोन करने लगा, वह उसकी कंपनी के गेट पर खड़ा होकर इंतजार करता, पीछा करके उसके घर तक आता, विपिन ने डिंपल के पिता को भी भरोशे में लिया, डिंपल के पिता शादी के लिए परेशान थे, विपिन ने कहा की वह भी अकेला है, उसके पिता से उसकी नहीं बनती, दोनों शादी करके खुश रहेंगे, विपिन द्वारा बार बार दबाव दिए जाने से डिंपल के पिता ने एक दुर्गा मंदिर में दर्जनों लोंगो के सामने हिन्दू रीती रिवाज़ के साथ डिंपल और विपिन की शादी कर दी, दोनों पति पत्नी विपिन के घर पर रहने लगे,
जब इसकी भनक विपिन के पिता नागेन्द्र नाथ मिश्र को मिली तो वे मुंबई पहुंचे और डिंपल को घर से मारपीट कर भगा दिए, उस दौरान विपिन ने साथ दिया और दोनों आकर डिंपल के पिता के घर आकर रहने लगे, कुछ दिन तक दोनों प्रेम से साथ रहने लगे, विपिन अपने घर भी आने जाने लगा, इसी दौरा डिंपल के पेट में विपिन का बच्चा पलने लगा, विपिन का मोह भी डिंपल से भंग होना शुरू हो गया,
डिंपल के पिता अपनी बेटी के लिए विपिन के  पिता से भी गिडगिडाने लगे तब विपिन के पिता ने दस लाख रूपये दहेज़ की मांग रखी और कहा की बिना दहेज़ लिए स्वीकार नहीं करेंगे,
८ अप्रैल २०११ को सदमे के चलते डिंपल के पिता का निधन हो गया, २ मई को जब अस्पताल में डिंपल ने मासूम अंचल को जन्म दे रही तो उसे अस्पताल में भरती कराकर विपिन दादा के बीमारी का बहाना बनाया और ५ मई को इलाहबाद जनपद के हंडिया तहसील निवासी राकेश कुमार पाण्डेय की बेटी क्षमा पाण्डेय से भरी दहेज़ लेकर विवाह कर लिया, इसकी जानकारी काफी दिन बाद डिंपल को हुयी, वह विपिन से रोने गिडगिडाने लगी, पर उसका असर विपिन पर नहीं पड़ा, वे लोग डिंपल की दूसरी शादी करना चाहते थे, पर वह तैयार नहीं थी,
पति की बेवफाई का शिकार बनी डिंपल ने सोशल मीडिया का सहारा लिया, फेसबुक के जरिये वह भदोही के लोंगो को दोस्त बनाना शुरू किया, अपना दुखड़ा वह सबको सुनाने लगी,
उधर ११ सितम्बर को उलहास्नगर के थाने में मुकादम दर्ज कराया पर एक गरीब की सुनवाई पुलिस नहीं की, उल्टा उसे ही परेशान किया जाता रहा, पुलिस स्टेसन  में बुलाकर उसे अपमानित किया जाता और विपिन को कुर्सी पर बैठकर पुलिस चाय पिलाती, उसकी गरीबी का मजाक बनाया जाता, अपनी मासूम बेटी को लेकर वह दर दर की ठोकरे खाती रही,
सब जगह से निराश होकर उसने भदोही में रहने वाले अपने फेसबुक के दोस्तों से कहा की यदि मैं आपकी बेटी या बहन होती तो भी आप ऐसा ही करते, मेरी कोई नहीं सुनेगा तो मैं अपनी बेटी के साथ आत्महत्या कर लूंगी,
भदोही के लोंगो का इमान उसने जगाया और लोग उसकी मदद में खड़े हुए, उसे भरोषा दिलाया,
फेसबुक के जरिये अपनी जंग की शुरुआत करने वाली एक अबला रणचंडी बन गयी, जन हथेली पर लेकर अपने बेटी के साथ वह आ पहुंची भदोही,
३० नवम्बर को वह बारात लेकर मूलापुर गाँव पहुँचने का एलान कर दिया, मोहल्ले के लोंगो से क़र्ज़ लेकर वह हवाई जहाज़ के आई थी और सीधे पति के घर पहुंची. मुंबई से चलकर अकेली आने वाली औरत को हजारो लोंगो का साथ मिला, बैंड बाजे के साथ वह धमक पड़ी पति की चौखट पर, उसकी हिम्मत थी की वह रणचंडी बन चुकी थी क्योंकि वह अपने बेटी को नाजायज़ नहीं कहलाना चाहती थी, एक फूल अंगारा बन चूका था,
ससुराल वाले घर छोड़कर भाग चुके थे, उसकी जिन्दगी बर्बाद करने में मुख्य भूमिका निभाने वाले विपिन के चाचा नागेन्द्रनाथ ने विपिन और उसके पिता को ही अपना दुश्मन बता दिया, कल तक उसके साथ कोई नहीं था, पर वह वाराणसी पहुंची तो दो दर्ज़न से अधिक मीडिया वालो ने उसे घेर लिया, समाजसेवी संगठनो और फेसबुक साथियों ने उसका इस्तकबाल किया,
भदोही के इतिहास में आजतक किसी ने भी मीडिया में उतनी जगह नहीं पाई थी जितनी  जगह उसे मिली, फ्रंट पेज से लेकर स्थानीय पेज का पूरा पन्ना उसके नाम से रंगा जाने लगा. मुंबई से अकेली चली एक निरीह महिला सेलिब्रेटी बन चुकी थी, मुहर्रम पर हुए बवाल की खबरे गायब हो गयी और हर जगह डिंपल डिंपल और सिर्फ डिंपल.
जगह जगह उसके स्वागत होने लगे, वह जहा भी जाती लोग गाजे बाजे से उसका स्वागत करते, उसे माला पहनाया जाता और फूल बरसाए जाते, जो पुलिस महाराष्ट में उसका अपमान करती वही पुलिस यहाँ सुरक्षा में तैनात है, जान से मारने की धमकिया मिलती रही और उसके इरादे मजबूत होते रहे, उसने ठान लिया है वह अपना हक़ लेकर रहेगी, अपनी बेटी को उसका हक़ दिलाकर रहेगी,
जिस फेसबुक को बन्द करने की मांग संसद में उठी उसी फेसबुक को उसने अपने हक़ की लड़ाई का जरिया बना दिया, शायद ही फेसबुक के इतिहास में ऐसी कोई घटना हुयी होगी जिसने फेसबुक के मायने बदल दिए, भदोही की मीडिया को उसने सकारात्मक सोच में परिवर्तित किया, ग्राम प्रधानो की महापंचायत ने उसके पक्ष में फैसला सुनकर अपनी जिम्मेदारियों का एहसास किया, जनपद की सभी ४८१ ग्राम पंचायतो ने उसका समर्थन किया, जनपद की सबसे बड़ी पंचायत जिला पंचायत अध्यक्षा श्यामला सरोज ने भी समर्थन दिया, डिस्टिक बार असोसिएसन ने समर्थन दिया, सामाजिक संगठनो ने समर्थन दिया, हालाँकि राजनितिक दल चुप्पी साधे पड़े है.
डिंपल ने यह दिखा दिया की नारी कभी अबला नहीं होती, वह दुर्गा भी है और झाँसी की रानी भी, बस वह अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ जंग छेड़ दे.
सामाजिक जंग जीत चुकी डिंपल अब कानूनी लड़ाई लड़ेगी और अपना हक़ लेकर रहेगी, उसने महिलाओ के आत्मसम्मान को जगाया है.
धन्य हो तुम क्योंकि तुम भारत की नारी हो, डिंपल मिश्र तुम्हे बार बार सलाम, तुम देश  के उन लाखो नारियो की प्रेरणा स्रोत हो जो अन्याय और उत्पीडन का शिकार होकर घर में घुटने को मजबूर है. भदोही की मीडिया और जनता तुम्हारा नमन करती है.
{ डिंपल मिश्र से हुयी बातचीत और जनचर्चाओ तथा मीडिया में आई खबरों पर प्रकाशित}