शनिवार, 10 नवंबर 2012

आशुतोष और उसकी शर्ट

यह है मेरा दोस्त आशु 
यही शर्ट नहीं उसकी याद है।
कभी कभी मन  जब अकेला होता है तो उसकी याद आती है जो दिल के बहुत करीब रहा हो। वैसे तो मेरे सभी दोस्त मेरे दिल के करीब रहे है। पर जब कुछ पुराने पन्नो को पलटता हूँ आशुतोष का चेहरा आँखों के समक्ष नाच उठता है। 1992 में जब अयोध्या मामले को लेकर हिन्दू मुसलमानों के बीच दुश्मनी की दरार सियासत दा डालने में लगे हुए थे। उसी दौरान हमारी दोस्ती का रिश्ता मजबूत हो रहा था। उस दौरान स्वतंत्र भारत में पाठक पन्ना आता था। मुझे लिखने का शौक था और मैं कविताये लिखा करता था, और उसी पन्ने पर आशुतोष की कविताये ग़ज़ल छपते थे। हम दोनों एक दुसरे को नाम से परिचित थे। आशुतोष के पिताजी महेश सिंह जी मूलतः बलिया जनपद के रहने वाले है और वे भदोही के ज्ञानपुर रोड पर एक विद्यालय में शिक्षक थे। एक बार  दुर्गा पूजा के दौरान मै  अकेले टहलते हुए ज्ञानपुर रोड पर पहुंचा और ओमप्रकाश  जी के घर के पास रखी एक चौकी पर बैठ गया उसी चौकी पर एक तरफ एक लड़का बैठा था। बातचीत में सभ्य था। उसने मुझसे मेरा नाम पूछा और मैंने बताया जब उसने अपना नाम बताया तो हम एक दुसरे से परिचित हुए एक अच्छा एहसास यह था की हम भले ही पहली बार मिले थे पर लग रहा था जैसे काफी दिन से जानते है। राष्ट्रवादी विचारधारा के चलते, हमारी मित्रता भी प्रगाढ़ हो गयी। घर आना जाना खाना पीना सोना बैठना बात करना किसी मुद्दे पर चर्चा करना सब शुरू हो गया। विचार मिलते थे लिहाजा सम्बन्ध मजबूत हो गए। कुछ दिन बाद आशुतोष के पिताजी का तबादला सोनभद्र हो गया। सब लोग यहाँ से चले गए। आशु वाराणसी में रहकर पढाई करने लगा। नए दोस्त नया परिवेश। धीरे धीरे हम दूर हो गए। जिन्दगी के व्यस्तताओ से कभी फारिग रहता तो उसकी याद अक्सर आती थी। उसका छोटा भाई नीरज, जो हम लोंगो की सेवा में ही व्यस्त रहता था। आशुतोष की दबंगई घर में ऐसी थी की वह सभी पर रॉब दिखता था। नीरज बेचारा दुबका रहता उसके सामने, तमाम यादे आज भी याद  है, और याद  दिलाती उसकी चौकी। जब वह यहाँ से गया तो,अपनी चौकी [ तख़्त] मेरे यहाँ छोड़ गया। उसी पर मैं जब भी रोज़ सोता उसकी याद बनी रहती। इसी तरह कई साल गुजर गए। करीब तीन साल पहले एक मित्र प्रदीप सिंह से उसका नम्बर  मिला। पता चला की उसकी शादी हो चुकी है। और वह मलेशिया में  कर्टिन  यूनी . में प्रोफ़ेसर है, मुझे एक सुखद आश्चर्य हुआ, जिसके भविष्य को लेकर मैं चिंतित रहता था आज  वह काफी उंचाइयो  पर पहुँच गया।  मैंने फ़ोन मिलाया और ज्योंही एक कोड वर्ड का नाम लिया और वह पहचान गया हम लोग काफी खुश हुए, करीब 12 वर्षो के बाद वह मिला भदोही आया और हम लोग मिले वह मेरे लिए एक शर्ट  लाया था जिसे मैं आज  भी कभी कभी पहनता हूँ। नीरज आज बड़ा हो गया है। नोएडा में इंजिनियर है। इसी महीने उसकी शादी है। शायद एक बार फिर पुरानी  यादे एक जुट हो जाय ।