शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

तेजपत्ता और पत्रकार

आप सोच रहे होंगे की आखिर यह कैसा शीर्षक  है भला तेजपत्ता और पत्रकार का क्या मुकाबला, तेजपत्ता मसाला है और पत्रकार ... भाई यह भी तो अख़बार के लिए मसाले का ही काम करता है. चलिए आपको एक छोटी  सी कहानी बताता हूँ. करीब ढाई वर्ष पूर्व बसपा विधायक श्रीमती अर्चना सरोज की मौत के बाद भदोही विधानसभा में उप-चुनाव हुआ था. प्रदेश के काबिना मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी यहाँ पर आये और भाषण दिया की राजनितिक पार्टियों ने मुसलमानों को तेजपत्ता समझती है. उन्हें इस्तेमाल करने के बाद उसी तरह फेंक दिया जाता है. जिस तरह मसाले में तेजपत्ता का इस्तेमाल होता है और उसे बाहर फेंक दिया जाता है. उप-चुनाव में सिद्दीकी साहब यही रुक कर भ्रमण करते रहे और यही भाषण देते रहे रहे. उनके भाषण के चन्द दिन बाद सतीशचंद मिश्रा का कार्यक्रम लगा. उनके स्वागत के लिए और व्यवस्था के लिए सिद्दीकी साहब को ही लगाया था. जब सतीश जी भाषण दिए और चलते बने तब सिद्दीकी साहब का वक्तब्य उन्ही के लिए प्रयोग होने लगा. लोग पहले यह समझते थे की मायावती के दाये हाथ यदि मिश्रा जी है तो बाये हाथ सिद्दीकी साहब, पर चुनाव में यह दिखा की सिद्दीकी साहब खुद तेजपत्ता की तरह इस्तेमाल हो रहे है. यह हवा ऐसी फैली की दर्जनों मंत्रियो, सांसदों, विधायको के बाद भी बसपा चुनाव हार गयी.
अब आते है वर्तमान विधानसभा चुनाव पर ... चुनाव से पहले यहाँ पर पत्रकारों की काफी पूंछ हो रही थी. टिकट मिलने के पहले पत्रकारों को खूब तरजीह मिलती थी. अपने पक्ष में टिकट के दावेदार खूब बयान छपवाते थे. पर टिकट मिलने के बाद जो परिवर्तन आया उससे बेचारे पत्रकार कही के न रहे......... पैड न्यूज़ के चक्कर में [ मेरा अख़बार नहीं]  पैकेज मिलने की उम्मीद में अखबारों ने समाचार छपने में रोक लगा दी. पर सभी प्रत्यासियो ने हाथ खड़े  कर दिए. करोडो की उम्मीद लगाये अख़बार मालिक भी भौचक हैं. खैर जो हुआ वह ठीक ही है. पर बेचारो पत्रकारों को क्या कहे. यह तो अछूत हो गए है. प्रत्यासी पत्रकारों से इस तरह कन्नी कट रहे है जैसे वे मिलते ही कुछ मांगने लगेगे. यहाँ पर जब पत्रकार बंधू इकठ्ठा होते हैं तो बस एक ही चर्चा...... यार कुछ मिल नहीं रहा है. छोटे नगरो में रहने वाले पत्रकार बेचारो का यही हाल है. पर खुल कर कोई कुछ नहीं कह पाता. आज भी कुछ बंधू बैठे यही बात कर रहे थे. जब मैं यह सुना तो सिद्दीकी साहब याद आ गए. 
वैसे बुरा क्या है इस्तेमाल होने वाली चीज़ समय  आने पर इस्तेमाल ही होती है.  
अरे भाई पत्रकार बंधुओ मायावती जी ने सिद्दीकी साहब को ही नहीं, मिश्रा जी को भी और हाथी नहीं गणेश है-- ब्रह्मा विष्णु महेश है और ब्रह्मण शंख बजाएगा हाथी बढ़ता जायेगा जैसे नारों को लगाने वाला ब्रह्माण  समाज भी तो खुद को तेजपत्ता बन चूका है/ फिर प्रत्यासियो ने आपको तेजपत्ता बना दिया तो क्या हर्ज़ है. आज तो तेजपत्ता बनाने का ही दौर है. लोग तेजपत्ते की तरह इस्तेमाल कर फेंक देते है. घबराइए मत महगाई के दौर में कभी न कभी तेजपत्ते की भी कीमत बढ़ेगी.