शनिवार, 16 जुलाई 2011

कसाब आतंकवादी या भारतीय मेहमान

मित्रों जिस देश की आधे से ज्यादा आबादी दो वक्त का खाना भी मुश्किल से जुटा पा रही हो, उस देश में कसाब जैसे आतंकवादि पर प्रति दिन 8,50,000 रु खर्च करना. और इस देश के गृह मंत्री द्वारा उसकी सजा की फ़ाइल को इस लिए राष्ट्रपति के पास न भेजना. की उसके एक वर्ग विशेष के वोटर नाराज हो जायेंगे क्या यह देश से गदारी नहीं है.
यह प्रश्न हिंदुस्तान की आवाज़ गूगल ग्रुप द्वारा आयोजित लेख प्रतियोगिता में पूछा गया था. जिसका मैंने जो जवाब दिया उसे अक्षरशः यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ.





 
मैंने सोचा था की इसका जवाब और लोंगो को पढ़ने के बाद दूंगा. मगर रह नहीं पाया. हो सकता है और लोग यही सोच ले और जवाब न आये, सच लिखने पर कही सांप्रदायिक होने का ठप्पा न लग जाय. खैर छोडिये.. एक कहानी आपको सुनाता हूँ.


एक राजा को संतान नहीं हो रही थी किसी महात्मा ने बताया की एक बड़ा तालाब खुदवाओ और उसे दूध से भर दो, राजा ने यह आदेश जारी किया की सभी प्रजा मिलकर तालाब खोदे और उसे दूध से भर दे. तालाब खोदना मजबूरी थी. भाई जान कौन गवाए पर दूध,, यहाँ पर दिमाग लगने लगा, एक ने सोचा भैया देखता कौन है चलिए एक बाल्टी पानी डाल देता हूँ. किसे पता चलेगा. सुबह देखा गया की पूरा तालाब भरा है लेकिन पानी से...

कहने का तात्पर्य यही है की आप सब लोग कही यह न सोच लेना की मैं नहीं लिखा तो क्या हुआ और लोग तो लिखेंगे ही, पर आप यह सोचे की हो सकता है लोग न लिखे मैं लिख देता हूँ. निश्चित तौर पर आप लोग कुछ न कुछ सोचते ही रहते हैं. चर्चा भी करते हैं. यदि आप लोंगो ने कसाब के बारे में पढ़ा या लिखा या सुना है तो कुछ न कुछ अवश्य लिखे ताकि हमारे तरफ से किया जा रहा यह कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहे.



कसाब आतंकी या मेहमान

यह प्रश्न सभी भारतवासियों के दिल में खटक रहा है की कसाब के मामले में सरकार सही कर रही है गलत ...

दोस्तों इस मामले में यह कहना चाहता हूँ की हो सकता है सरकार कसाब जैसे आतंकी को मुस्लिम मानकर चल रही है. आज़ादी के बाद आज तक हिन्दू मुसलमानों के दिलो से दुरिया कम नहीं हो पाई हैं. देश बंटवारे के समय जिन्ना ने कहा था की " हमारे खान-पान, हमारे रहन सहन हमारे क्रियाकलाप, पूजा पढ़ती यह तक कोई बात अपसा में नहीं मिलती लिहाजा मुसलमानों को अलग देश चाहिए." {हो सकता है शब्दों का हेर फेर हो पर भाव यही थे.} मोह में आकर गाँधी ने देश को टुकडो में बांटने का काम किया. और हिन्दू मुसलमानों के बीच एक ऐसी गहरी खाई पैदा हो गयी जिसे पाटा नहीं जा सका , क्या फायदा मिला देश को खंडित करने का.. मेरी सोच शायद गलत हो पर यह आप बता सकते है देश जब आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था तब हिन्दू मुसलमानों में भले ही कुछ न मिलता हो पर विचार अवश्य आपस में मिले थे. पर बंटवारे के बाद विचारो में भी मतभेद आ गया, कुछ मुसलमानों ने भारत की क्रिकेट में हुयी हार पर तालिया बजायी तो यह इलज़ाम सारे मुसलमानों पर लगा, इसका एक कारण यह भी रहा की ऐसी घटनाओ पर आम मुसलमान चुप्पी साध लेता है. आज मुस्लिम ब्लोगरो ने असीमानंद और साध्वी के बारे में लिखा और भगवा { केसरिया} रंग को ही आतंक घोषित कर दिया. मैं देखता भी हूँ मुस्लिम ब्लोगर कसाब के बारे में बहुत कुछ नहीं लिखा. यदि किसी ने एक लेख कसाब के विरोध में लिखे तो १० लेख भगवा के विरोध में लिख डाला .. जबकि केसरिया रंग की महत्ता क्या है, यही नहीं पता लोंगो को, भले ही कुछ लोग कहें की असीमानंद या साध्वी ने कुछ गलत नहीं किया, पर यह जाँच का विषय है, यदि वास्तव में उन लोंगो ने इस आतंक की घटना को अंजाम दिया है तो वह गलत है. हिंसा कही से भी जायज़ नहीं है, पर यह परिश्तिथिया पैदा क्यों हो रही हैं. हमारे विचारो में परिवर्तन आ गया है. हम शिक्षित भले ही हो रहे है पर धर्म को लेकर कुंठित हो रहे हैं. हमें निष्ठावान होना चाहिए जबकि हम कट्टर हो रहे हैं. कट्टरता हिंसा ही सिखाती है. मुसलमान कुरान के प्रति कट्टर होता है वह समझौता नहीं करना चाहता, जिन्ना को हम साधुवाद देंगे क्योंकि उस व्यक्ति ने सच कहने का साहस किया.

मैं देखता हूँ जब कही त्योहारों पर बैठक करते है तो गंगा जमुनी तहजीब की दुहाई दी जाती है. कितने शर्म की बात है हम अपने स्वार्थ के लिए उसे भी नहीं बख्सते जिसे हम अपनी माँ कहते हैं. हमारी सनातन परम्परा में गंगा को माँ कहा जाता है. गंगा जमुनी तहजीब तब कायम होगी जब हिन्दू ईद पर मुसलमानों के गले लगकर मुबारकबाद दे तो मुसलमान होली पर गले लगने और अबीर लगाने का साहस करे, दोनों नदिया जब आपस में मिलती है तो धार एक हो जाती है. क्या कभी ऐसा लगा.

हमने कुरान के हिंदी संस्करण को पढ़ा है, जिसमे जगह बहुदेवादी और मुशरिक मूर्तिपूजक} शब्द का प्रयोग हुआ है. जिसके के आगे क्या लिखा है बताना शायद उचित नहीं होगा. यहाँ हम दूसरे विषय पर बात कर रहे हैं.

एक अच्छे समाज के लिए हमें उन बातो को छोड़ना होगा. जो आपस में द्वेष पैदा करती है और यह परिवर्तन सिर्फ हिन्दुओ में है.

हिन्दू धर्म में कहा खाने को लिखा है कहा नहीं, किसके साथ रहना है किससे के साथ नहीं. पाबन्दिया वहा भी है पर लोंगो ने समझौता कर लिया. ऐसा नहीं है की मुसलमान नहीं चाहता वह भी चाहता है की प्रेम मोहब्बत से लोग रहे पर वह संख्या ही कम है. हमारे कुछ दोस्त मुसलमान है जो समाज में सम्मानित ओहदा रखते हैं. पर वे अन्दर अन्दर मुसलमानों की ही गालिया सुनते है. क्योंकि वे होली भी खेलता है और दुर्गा पूजा पर आयोजन भी करते हैं. हमारे यहाँ दुर्गा पूजा की शुरू आत एक मुसलमान भाई ने ही किया था, पर आज भी वह मुसलमानों की जमात में नहीं बैठ पाता.

दोनों तरफ के संकुचित विचारधारा को ख़त्म करना होगा. और यह शुरुआत हिन्दुओ ने की पर उत्तर न पाकर वे भी पीछे लौटने लगे हैं.

और यही सोच आतंकी के आतंक को देखने के बजाय उसके नाम को देखती है. जब उसकी गन से गोलियां निकल रही थी तो धर्म या जाति नहीं पूछ रही थी वह हिन्दुस्तानी को निशां बना रही थी. जब लोग कसाब को आतंवादी मान रहे थे चाहे वे हिन्दू हो या मुसलमान तब उसे जिन्दा किया गया और मुसलमान बना दिया गया. यह काम सरकार ने किया वोट पाने के लिए. आज उसके खातिर जितना पैसा खर्च किया गया या जा रहा है. यदि वही पैसा अपने देश के गरीबो को सहायतार्थ दिया जाता तो कितने लोंगो के घर में चूल्हे जल जाते वह चूल्हा हिन्दू का होता या मुसलमान का पर एक भारतीय का अवश्य होता. क्योंकि इसी सवाल का जवाब ढूढने में पूरा देश लगा हुआ है. सरकार सोच रही है की यदि अफजल या कसाब को फांसी दी गयी तो मुसलमान नाराज़ न हो जाय. और चुप्पी साधकर मुसलमान इस बात पर मुहर लगा रहा है. गुजरात की बात करने वाले गोधरा और कश्मीर की भी बात करे. .

सरकार और मुसलमान यदि कसाब के बारे में चुप है तो वह मेहमान

नहीं तो आतंकवादी.

शनिवार, 2 जुलाई 2011

मुझे घर भी बचाना है, वतन को भी बचाना है.

मित्रो बहुत पहले मैंने एक ग़ज़ल पढ़ी थी जिसे मैं आज भी गुनगुनाता हूँ .... कुछ दिनों आपसे दूर रहने के बाद वापस आया तो सोचा कुछ बाते हो जाय...  आपके लिए सबसे पहले " मुनव्वर राना" साहब की एक ग़ज़ल...

नुमायिस के लिए गुलकारियां दोनों तरफ से हैं.
लड़ाई की मगर तैयारियां दोनों तरफ से हैं..

मुलाकातों पर हँसते, बोलते गुनगुनाते हैं..
तबियत में मगर बेजारियां दोनों तरफ से हैं...

खुले रखते हैं दरवाजे दिलो के रात दिन दोनों..
मगर सरहद पर पह्रेदारियां दोनों तरफ से हैं..

उसे हालत ने रोका, मुझे मेरे मसायल ने..
वफ़ा की राह में दुश्वारियां दोनों तरफ से हैं..

मेरा दुश्मन मुझे तकता है, मैं दुश्मन को तकता हूँ..
की हायल राह में किलकारियां दोनों तरफ से हैं...

मुझे घर भी बचाना है, वतन को भी बचाना है..
मेरे कंधे पर जिम्मेदारियां दोनों तरफ से हैं. .

पढने पर यह लगता है की यह ग़ज़ल भारत और पाकिस्तान के लिए लिखी गयी है, पर यही हालत हमारे देश के अन्दर भी है. आज हम चाहे तो अपने दिलो को साफ करके अपने देश को विश्व का सिरमौर बना सकते है, पर नहीं राजनीतिज्ञों की तरह हम आपस के किसी न किसी विवादों में उलझे ही रहते है. कही मंदिर-मस्जिद तो कही जाति-धर्म के नाम पर झगडे शुरू हो जाते है. इतिहास गवाह है  व्यवस्था परिवर्तन कभी सत्ता से जुड़े लोग नहीं करते बल्कि रोजाना के झंझावतो से जूझ रही आम जनता करती है.. लोंगो ने सोचा होगा की देश आज़ाद होने  के बाद लोग सुख से जीवन बसर करेंगे. जिस मकसद के लिए हमारे पुरखो ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए, वह मकसद अभी पूर्ण नहीं हुआ है. भ्रष्टाचार, तानाशाही, गुलामी आज भी कायम है, बस स्वरूप बदला गया है.
पहले विदेशी हम पर शासन करते है. अब अपने ही देश के चंद लोग कर रहे है. राजनीती सेवा नहीं व्यवसाय बनकर रह गयी है. हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. और हमारे दिलो में एक दूसरे के प्रति दूरियां आज भी कायम है.. अक्सर लोग कहते हैं की आपसी सौहार्द, भाईचारा, प्रेम कायम रखना होगा. पर इन लफ्जों का प्रयोग कब तक होता रहेगा. कब तक हम चंद लोंगो की चाल में फंसकर आपस में लड़ते रहेंगे.
आज चलन सा हो गया है, हर बातो को लोग धर्म और जाति से जोड़ देते हैं. ताकि लोग आपस में लड़ते रहे.. हमें मुद्दों के आधार पर उन सभी का समर्थन करना चाहिए जो देश हित में कार्य करते हैं. चाहे वह किसी भी धर्म या जाति के हो. . हालाँकि जब भी कोई आगे आयेगा, उसे यह साबित करना होगा की वह इमानदार है, आज बाबा रामदेव हो या अन्ना यदि उनका समर्थन करना है तो स्वाभाविक रूप से कई सवाल भी खड़े होंगे.
देश की जनता के साथ बार-बार विश्वासघात होता रहा है. वह छली जाती रही है. लिहाजा किसी पर सहज विश्वास नहीं कर पाती. मैं यहाँ पर किसी व्यक्ति विशेष की बात नहीं कर रहा हूँ, बाबा और अन्ना एक उदहारण स्वरुप है. धर्म की रक्षा के लिए जब भगवान श्री राम और योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया तो उनके ऊपर भी कई आरोप लगे. तब समाज इतना विकृत नहीं था. वे एक रावन और एक कंस के लिए आये थे. उन्हें पता था की उनका दुश्मन कौन है. पर आज अनगिनत रावन और कंस फैले है. जिनका संहार सहज ही नहीं किया जा सकता. स्वाभाविक रूप से देखा जाय तो आरोप-प्रत्यारोप उन्ही पर लगते हैं जो आगे बढ़कर कुछ करना चाहते है. अपनी जिम्मेदारियों से मुह मोड़कर घर में बैठने वालो पर कैसा आरोप लगेगा. हमें एकजुट होकर सिर्फ भारतीय होना होगा. आपस में जो शिकायते हैं उन्हें दूर करना होगा. एक दूसरे के प्रति दिल में जो प्रश्न घूमते रहते हैं. उन पर सवाल-जवाब करना होगा. जब तक हम एक दूसरे को संतुष्ट नहीं कर पाएंगे, तब तक विवाद ख़त्म होने के सवाल ही पैदा नहीं होते.
" भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" ब्लॉग नहीं मिशन है..
मित्रो, जब मैंने ब्लॉग लेखन में कदम बढाया तो इस दुनिया से अनजान था. ब्लोगों पर विचरण के दौरान देखा तो पाया की सब खुद को बड़ा बताने में ही लगे हैं. आरोप मढने में ही लगे है. यही स्तिथि साझा ब्लोगों पर भी थी. धार्मिक उन्माद यहाँ भी हावी था. बिना किसी नियम के. .. हमारी संस्कृति हमारी परम्परा हमारे जीवन का आधार है. इस पर प्रहार हम सहन नहीं कर पाते. फिर भी कुछ लोंगो की आदत बन चुकी है दूसरो को नीचा दिखाने की.. हमारे एक अज़ीज़ मित्र जो साझा ब्लॉग कई वर्षो से संचालित करते है.  उन्होंने एक लेख लिखा की "जापान में कहर"  इसलिए बरपा की वहा लोग इस्लाम को नहीं मानते. वे बड़े ही अच्छे लेखक है. मैं उनका सम्मान करता हूँ. पर उनकी इस बात पर हंसी आ गयी. ऐसे कई लेख उन्होंने लिखे है.
अब यदि कोई लेखक यह कह देता की इराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे देश अशांत इसलिए है की वहा हिन्दू धर्म की अवहेलना होती है. हिन्दुओ को मारा जाता है. पर आज तक किसी ने नहीं कहा ... हमारे एक बहुत ही अच्छे मित्र और जिन्हें मैं ब्लॉग जगत में अपना गुरु भी मानता हूँ.. उनसे मैंने काफी कुछ सीखा है. वे महापुरुषों, ऋषियों, मुनियों, मनु आदि के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, पर अंत में वह कह देते हैं की सनातन धर्म आज का इस्लाम है. ऐसी बेहूदगी बातो से हमें बचाना होगा. उनके शब्दों का सार यही है की सभी लोग इस्लाम अपना ले. जो संभव नहीं हो सकता उन बातो को करके हम नाहक विवाद पैदा क्यों करे. ऐसे तमाम लोंगो के उदाहरण है, पर दो लोंगो के सिर्फ मैंने इसलिए दिए क्योंकि दोनों लोग मेरे अज़ीज़ है और मेरी बातो का बुरा नहीं मानते.
आजकल जो मुद्दे चल रहे हैं. सभी भारतीयों को एकजुट होकर उनपर गंभीर होना होगा. धर्म को राजनीती से अलग रखना होगा.
और अंत में..........
भारतीय ब्लॉग लेखक मंच की स्थापना ११ फरवरी २०११ को हुयी, इस मंच को हमने परिवार की संज्ञा दी, ताकि हमारे सभी हिंदी लेखक भाई एक परिवार की तरह मिलजुल कर रहे, अपनी शिकायते भी दर्ज कराये तो भी गरिमा के साथ. हार परिवार में कुछ न कुछ बाते होती रहती हैं, यहाँ भी होगी पर उसे दिल पर ले लेना या व्यक्तिगत बना लेना कही से भी उचित नहीं है. आप सभी के प्रेम की ही देन है की अल्प समय में यह मंच उन बुलंदियों की ओर कदम बढ़ा रहा है. जिसकी कल्पना शायद हमको भी नहीं थी. इसमें आप सभी लेखको व पाठकों तथा समर्थको का सहयोग है. इसके लिए मैं विशेष रूप से योगेन्द्र जी का शुक्रगुजार हूँ. जिन्होंने अपना कीमती समय इस मंच के लिए हमेशा दिया और दे रहे हैं. 
काफी दिनों तक दूर रहने के बाद फिर परिवार में लौटा तो सोचा कुछ दिल की बात कर ली जाय. आप सभी के सहयोग साधुवाद ...
जाते-जाते चन्द लाईने........
चन्द लोंगो की यही कोशिश रही है दोस्तों....
आदमी का आदमी से फासला बढ़ता रहे...
अपनी आँखों से हमें भी खोलनी हैं पट्टियाँ.
फायदा क्या है की अँधा काफिला चलता रहे....