सोमवार, 11 अप्रैल 2011

माफियाओं के चंगुल में ब्लागिंग -4

हिन्दू कट्टर कैसे........... ?  मेरी नजर में कट्टरता....

क्या इसी सभ्यता पर करेंगे हिंदी का सम्मान [ चौथा भाग ]

 लोग कहते है की   कट्टरता हमारे लिए  घातक है पर इस बात को मैं नहीं मानता , कट्टरता ही एक ऐसा रास्ता  है जो सारे विवाद को नष्ट कर सकता है. पर कट्टरता क्या होती है शायद यह किसी को पता नहीं है, और जो कट्टरता हमारे समाज  को विध्वंस कर रही है,  वह रूढ़िवादिता में सिमटी एक  ऐसी कट्टरता है जो हिन्दू धर्म को चौपट कर रही है. जब लोग कहते है की इस्लाम तलवार के दम पर बना एक ऐसा धर्म है जो लोंगो को भयाक्रांत करता है. जब मैं छोटा था तो मैं भी इस बात को मानता था. पर धीरे-धीरे जब मैं समाज से जुड़ता गया तो देखा और महसूस किया की कोई भी धर्म सिर्फ डर या तलवार के दम पर इतना विशाल नहीं हो सकता. कोई न कोई बात इस्लाम में जरुर है जो दिनों दिन आगे बढ़ता गया. आखिर इस बात का राज़  क्या है. जब इसकी गहराई में गया तो पाया की हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियाँ और छुआछूत तथा इस्लाम में समावेश प्रेम ने ही इस्लाम को मानने वालो में इजाफा किया है. यदि देखा जाय तो हिन्दू कोई धर्म नहीं बल्कि एक जीवन शैली है, हिन्दू धर्मशास्त्र  जीवन जीने के नियम है. पर हिन्दुओ ने उन नियमो को मानना छोड़ दिया है. " यदि यह कहे की आज मुसलमान उन नियमो को अधिक मानता है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. जो काम और जिन नियमो आदर्शो का पालन मुसलमान करता है यदि हिन्दू  उन्ही नियमो का पालन करता तो आज के भारत में उतने मुसलमान कदापि नहीं होते जितने आज की तारीख़ में हैं. " जिस तरह "गीता" एक सम्पूर्ण जीवन शैली है. उसी प्रकार "कुरान" सभी हिन्दू धर्म शाश्त्रो का सार है. कुरान में लिखी लगभग सभी बाते किसी न किसी हिन्दू धर्म शास्त्र में मिल जाएगी. जो आपसी प्रेम मुसलमानों में है वह हिन्दुओ में रह ही नहीं गया है. जब मुसलमान मस्जिद में नमाज़ पढने जाता है तो नमाज़ पढने के बाद एक दुसरे से गले मिलता है, वह यह नहीं देखता की उसकी बगल में खड़ा व्यक्ति किस जाती है पर जब हिन्दू मंदिर में पूजा करने जाता है तो छोटी जाती से दुरी बना लेता लेता है क्योंकि इश्वर के दरबार में भी उसे छुआछूत की बीमारी जकड़े रहती है. वहा भी धर्म भ्रष्ट होने का भय बना रहता है. मैं पूछना चाहता हूँ हिन्दू धर्म के उन ठेकेदारों से क्या इसी दम पर तुम हिन्दू धर्म को मजबूत बनाओगे. कट्टर बनो पर धर्म के प्रति, धर्म जो शिक्षा देते है उन पर अमल करो. फिर तो सरे विवाद ही ख़त्म हो जायेंगे. 

पर यहाँ पर हम धर्म की चर्चा  करने नहीं बैठे है. आज हम हिन्दुओ की कथित कट्टरता पर बात करेंगे जिस कट्टरता ने हमेशा हिन्दुओ को कमजोर करने का काम किया है. आज के परिवेश में यदि किसी हिन्दू से पूछा जाय की वह किस जाती का है तो कोई भी हिन्दू यह नहीं कहेगा की वह हिन्दू है. ब्राह्मन,   ठाकुर, यादव, चमार, पासी { माफ़ करना भाई कोई एस सी एस टी  मत लगवा देना }  गड़ेरिया, कोइरी, बनिया आदि आदि जाती बताएगा...... और यही सवाल यदि किसी मुसलमान से किया जाय तो वह सिर्फ मुसलमान कहेगा, यह है धर्म के प्रति सच्ची आस्था , जातिया मुसलमानों में भी बनी  है पर उससे उनका समाज नहीं टूटता, वहा पर जातियां खान-पान व व्यवहार को नहीं बाँटती, वहा पर छुआ छूत नहीं है. यदि कही दिखता भी है तो  उसका कारण  जातियां नहीं होती, जबकि हिन्दू धर्म में ऊँची नाक वाले छोटी जाति के यहाँ खाना तो दूर पानी पीना भी पसंद नही करेंगे. छुआ छूत का कैंसर हमारे अन्दर इतना समां गया है. की उसे बाबा रामदेव का योग भी दूर नहीं कर सकता. हिन्दू शिक्षित भले ही हो पर धार्मिक कुरीतियों में जकड़कर इतना असहाय हो चुका है की  वह छटपटाने के बावजूद उस बंधन से निकलना नहीं चाहता. और यही  कारण धीरे-धीरे हिन्दू धर्म को कमजोर कर रहा है. 

जिन मुसलमानों पर हम अंगुलिया उठाते है. सच्चा  प्रेम हमें वही दिखाई देता है. हिन्दू  आज यदि उसी प्रेम को अपनाये होते तो हिन्दू समाज का बंटवारा नहीं होता, जाति पाति  के आधार पर हम बंटे  नहीं होते. मै आज तक मुसलमानों की जितनी भी पार्टियों में गया वह पर जाति के आधार पर सम्मान पाते किसी को नहीं देखा. चाहे पठान हो या अंसारी, जिसमे जितनी क़ाबलियत वह उतना ही सम्मान का अधिकारी., हम किसी भी मुसलमान  भाई के यहाँ गए. सभी जितने प्रेम से मिलते हैं. क्या उतने ही प्रेम से हम उनसे मिलते है. भले ही लोग कहे मिलते है पर ऐसा नहीं है. आज भी हिन्दू  की बड़ी जातियों में मुसलमानों के लिए या हिन्दू  छोटी जातियों के लिए अलग से बर्तन निकाल  कर रखे जाते है. इस्लाम इतना कमजोर नहीं है की वह सिर्फ बर्तनों के आधार पर खतरे में पड़ जाय. पर हिन्दू धर्म खतरे में पड़ जाता है. जब हमारा धर्म इतना कमजोर है. कि सिर्फ छूने और खाने से कमजोर हो जाता है और भ्रष्ट हो जाता है तो ऐसे धर्म का मालिक कौन हो सकता है. 

मेरी नजर में जो मुसलमान है वह मुसलमान मैं भी हूँ. जी हाँ जनाब हरीश सिंह एक सच्चा मुसलमान है.मुसलमान का मतलब जानते हैं. " कुरान में केवल मुस्लिम शब्द का इस्तेमाल हुआ है. जिसके माने है, एक वो शख्स जो अपनी तमाम इच्छाओ को और अपने आप को खुदा { ईश्वर} के आगे नतमस्तक कर दे.

मेरी नजर में मुसलमान वह है जो "

जिसका सम्पूर्ण ईमान अपने ईश्वर अपने परवरदिगार के प्रति हो.  और यही भाव हिन्दुओ का भी होना चाहिए, निश्चित रूप से इस सृष्टी का संचालन करने वाला एकमात्र वाही परमात्मा है जिसे मुसलमान खुदा कहता है, ईसाई गाड कहता है या हिन्दू भगवान कहता है. जिसने भी सम्पूर्ण मानव जाति को इस पृथ्वी पर भेजा है वह एक ही है चाहे उसे हम किसी भी नाम से पुकारे. यदि ऐसा नहीं होता हमारे शरीर एक जैसे नहीं होते, हमारे खून का रंग एक नहीं होता बल्कि कुछ न कुछ अलग जरूर होता. हरीश सिंह एक सच्चा मुसलमान भी है और हिन्दू भी है. क्या फर्क पड़ता है. हम ईश्वर के प्रति समर्पित है. इसीलिए प्रेम कि भाषा बोलता है पर कुछ लोंगो को प्रेम कि यह भाषा समझ में नहीं आती. ईश्वर कि बनायीं हुई इस अनमोल कृति से प्रेम करना सीखो बंधुओ. कमियां सभी में होती है क्योंकि कोई मानव  खुदा नहीं है, यदि समाज को विवाद मुक्त करना है तो जाति के आधार पर धर्म के आधार पर  इन्सान को इंसानों से मत बांटो, यदि यह कोई मुसलमान यह समझे कि उसने हिन्दुओ की बुराई करके या भगवान को गाली देकर  कोई तीर मार लिया या हिन्दू यह समझे की उसने मुसलमानों को गाली देकर या खुदा को गाली देकर जग जीत लिया तो यह बेवकूफी और पागलपन के सिवा कुछ नहीं है. समाज से विवाद ख़त्म करना है उंच-नीच, धर्म-जाति, हिन्दू मुसलमान की बातों को छोड़कर प्रेम करना सीखो. खुद के अन्दर खो रहे इन्सान को देखो तभी मानव जाति का भला हो सकता है.
                                                                         क्रमशः ..............................

 

12 टिप्‍पणियां:

Bhushan ने कहा…

हरीश सिंह जी, आपके विचार बहुत अच्छे हैं. आपका सामाजिक-धार्मिक विश्लेषण मानने योग्य है. कोई भी धर्म बिना मानवीय दृष्टिकोण के नहीं फैल सकता. कुरान में लिखा है कि बच्चों को मारो मत, तुम्हें जन्नत मिलेगी. यह सामान्य अनुदेश नहीं है. (हिंदू नहीं कहूँगा) भारत के रहने वाले भी मानवीय दृष्टिकोण रखते हैं लेकिन छुआछूत और जातिगत ऊँच-नीच ने समाज को बाँट दिया हुआ है. इसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है.
ईश्वर से प्रार्थना है कि आपकी भावनाओं के अनुरूप देश में एकता का भाव दृढ़ हो.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

रामनवमी की हार्दिक शुभकामनायें.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

आपने विषय को गहराई से समझने का प्रयास किया है और उसे सच्चाई से कहने का साहस भी किया है। यही सच हमें मार्ग दिखाता है। आपने सच कहा है कि हमें रचने वाला परमेश्वर एक ही है। इसीलिए हरेक देश में रहने वाले इंसानों की बनावट एक ही है। जब हम ग़ौर से देखते हैं तो पता चलता है कि हमारे माता-पिता भी एक ही हैं। अंतर मात्र इतना है कि अलग-अलग भाषाओं में उनके नाम अलग-अलग हैं। जैसे कि सूर्य को अरबी में शम्स कहा जाता है लेकिन इन दोनों ही नामों से अभिप्रेत एक ही चीज़ होती है।
कालांतर में वासनाओं में जीने वालों ने खुद को परिस्थितियों के अनुसार ढालने के नाम पर बहुत सी चीज़ें और बहुत सी नई परंपराएं धर्म में मिला दीं। हिंदू धर्म के साथ भी यही किया गया और इसलाम के साथ भी और यह काम हमेशा हुआ। इन्हीं कुरीतियों ने समाज को बहुत कष्ट दिया है। ये कुरीतियां कभी धर्म नहीं थीं। धर्म कभी कष्ट नहीं देता, कभी अनिष्ट नहीं करता। कल्याण धर्म में ही निहित है। हमारा कल्याण ईश्वर के प्रति अपनी इच्छाओं को समर्पित करके उसके मार्गदर्शन में जीवन गुज़ारने में ही है। इसीलिए
हमारे पूर्वज हमें ईश्वर से जोड़ते हैं जो कि कल्याणकारी है The Lord Shiva and First Man Shiv ji

अल्लाह के रसूल (स.) ने फ़रमाया-
‘ज़ुल्म से बचते रहो, क्योंकि ज़ुल्म क़ियामत के दिन अंधेरे के रूप में ज़ाहिर होगा और लालच से भी बचते रहो, क्योंकि तुम से पहले के लोगों की बर्बादी लालच से हुई है। लालच की वजह ही से उन्होंने इन्सानों का खून बहाया और उनकी जिन चीज़ों को अल्लाह ने हराम किया था, उन्हें हलाल कर लिया।‘

Patali-The-Village ने कहा…

आप के बिचारों से सहमत हूँ| धन्यवाद|

आशुतोष ने कहा…

हरीश भाई :
कई बार आप के लेखों में हिन्दू विरोध झलकता है मगर मैं औरों की तरह आप को मुल्ला हरीश खान नहीं कहूँगा..
मेरे कुछ प्रश्न हैं..कृपया लेख लिखकर हो सके तो स्पस्ट कर दें..
... माना मैंने हिन्दू धर्म बहुत ख़राब है..मैं इस्लाम स्वीकार करना चाहता हूँ..कौन सा इस्लाम स्वीकार करूँ..
१ अलकायदा का इस्लाम
२ तालिबान का इस्लाम
३ पाकिस्तान का इस्लाम
४ हिंदुस्तान के सिमी और कश्मीर का इस्लाम
५ या एक सीधे साधे सच्चे भारतीय मुस्लमान का इस्लाम जिसको इस मार काट से लेना देना नहीं है...मगर इस्लामिक विश्व बहुमत उसको गद्दार कहता है...और भारत में वो अपने कुछ गद्दार बंधुओं के कारण शंका की दृष्टि से देखा जाता है???

....आप को वर्ण व्योस्था बुरी लगती है ..
१ क्या आप को लगता है वर्ण व्योस्था वही थी जिसका विकृत रूप कालांतर में हम देख रहें है और आप परोस रहें है..अगर हो सके तो पढ़ेंक्या वर्ण व्योस्था प्रासंगिक है ?? क्या हम आज भी उसे अनुसरित कर रहें हैं??
२ क्या आप पूरे यकीन और प्रमाण के साथ कह सकतें है की इस्लाम में जातिवाद वर्णवाद नहीं है...

और हाँ हरीश भाई:
आप जैसे अनुभवी व्यक्ति से कश्मीरी पंडितो के विस्थापन का कारण एवं कारकों पर एक लेख मिल जाए तो इस पापी हिन्दू का जीवन धन्य हो जाए...
आप के जबाब की प्रतिच्छा रहेगी

shanno ने कहा…

हरीश जी, आपका ब्लॉग मुझे बहुत पसंद आया और ये लेख भी. बहुत शुभकामनायें...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

सार्थक लेख ....
गहन विश्लेषण ...

G.N.SHAW ने कहा…

आज -कल सबसे बड़ा धर्म मानवता की होनी चाहिए ! इससे हम दूर होते चले जा रहे है ! बहुत ही बेजोड़ ताल - मेल !बहु

बेनामी ने कहा…

हरीश सिँह
फटती तो तुम्हारी है मुसलमानो से.
कि मुसलमान आकर तुम्हारी माँ बहन कर जाते है.
और तुम्हारे जैसे लोग तब भी लल्लो चप्पो करते रहते है.

इस देश की बर्बादी इन बाहरी लोगो ने इतनी नही की
जितनी तुम्हारे जैसे नपुंसको ने की.

ऐ लोकप्रियता के भूखे गिद्ध हरीश सिँह
तुमसे इतना ही कहूंगा कि कुऐ से बाहर निकलो .
और लोकप्रियता की भूख के चलते इतने नीचे मत गिर जाना.
कि तुम्हारी आने वाली पीढ़िया तुमपे थूके.

बेनामी ने कहा…

ही ही ही ही
सारी दुनिया इस्लाम को घ्रणा से देख रही है.
अमेरिका मे टेरी जोँस कुरान जला रहा है.

और ये महाशय हरीश सिँह लोगो को इस्लाम की खूबिया गिना रहे है

सही है
नपुंसकता आदमी से क्या न करा दे.

लगे रहो बेटा हरीश
इसमे तुम्हारी कोई गलती नही है.
जब आदमी कमजोर और नपुंसक होता है.
तो वो किसी के भी तलवे चाट लेता है.

और कोई आदमी उसकी चाहे जितनी @§#£?§ कर दे .
लेकिन वो तब भी उसके तलवे चाटता है.

वो भी क्या करे नपुंसक जो है.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

@ मित्र आशुतोष ! आपने कहा कि
' माना मैंने हिन्दू धर्म बहुत ख़राब है'
भाई जो बात आपसे मानने के लिए कही नहीं जा रही है , आप उसे मानने की हठ क्यों कर रहे हैं ?
ग़ज़नवी का या मक़बूल फ़िदा का भी कोई ज़िक्र पोस्ट में नहीं था तो उनका ज़िक्र क्यों कर देता ?
अब आपने छेड़ा है तो आप ज़रा ध्यान दीजिए कि ग़ज़नवी ने अपने राज्य में मौजूद पत्थर के बामियान बुद्ध को तो छेड़ा तक नहीं और सोमनाथ के मंदिर पर हमला करने के लिए भारी कष्ट उठाकर इतनी दूर तक बार बार आया । कारण केवल लालच था । मक़बूल फ़िदा ने भी केवल माल और शोहरत के लालच में ही हिंदू देवी की नग्न तस्वीर बनाई । इस्लाम के अनुसार मंदिर लूटना भी हराम है और तस्वीर बनाना भी । नंगी तस्वीर बनाना तो और भी बड़ा पाप है और किसी की धार्मिक हस्ती का नंगा चित्र बनाना तो 'फ़ित्ना' है जो कि बहुत बड़ा जुर्म और गुनाह है अल्लाह की नज़र में । दोनों ही लालच में पड़ गए और इस्लाम से हट गए। वे लालच से बच जाते तो इन जघन्य जुर्मों से भी बच जाते।
लेकिन दुख होता है यह देखकर कि मक़बूल फ़िदा की हरकत पर वावेला मचाने वाले तब चुप रहते हैं जब देवी देवताओं की नंगी मूर्तियाँ हिंदू खुद बनाते हैं और चौराहों पर खुलेआम स्थापित करते हैं। उनके लिए तो वे चंदा भी देते हैं ।
देवबंद में त्रिपुर बाला सुंदरी का एक प्राचीन मंदिर है । उसमें भी देवी की नंगी मूर्ति है और यह चलन हिंदुओं में आम है । अगर मक़बूल फ़िदा का काम ग़लत है तो क्या उसी काम को ख़ुद करना सही है ?
अमेरिका दुनिया में जहाँ भी तेल आदि हड़पने के लिए जो अनाचार कर रहा है उसके पीछे उसका राष्ट्रवाद और लालच ही तो है , ईसा मसीह तो इन कामों से रोकते हैं ।
गाँधी जी को भी गोली एक राष्ट्रवादी ने ही मारी है , हिंदू धर्म तो रोकता है इस तरह किसी की जान लेने से।
अगर कोई राष्ट्रवादी होना चाहे तो वह किसका अनुसरण करे ?
1. गाँधी जी के राष्ट्रवाद का
2. सावरकर और गोडसे के राष्ट्रवाद का
3. दयानंद जी के राष्ट्रवाद का
4. विवेकानंद जी के राष्ट्रवाद का
5. सुभाषचंद्र बोस के राष्ट्रवाद का
या फिर
6. मौलाना आज़ाद और अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ाँ के राष्ट्रवाद का
किसका राष्ट्रवाद ठीक है और किसका ग़लत और क्यों ?
इन प्रश्नों पर भी विचार किया जाना आवश्यक है।
आपने मेरा लेख पसंद किया आपका शुक्रिया !

http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/04/4.html

किलर झपाटा ने कहा…

अरे भाई लोगों ये हरीश सिंह नहीं, बुल्ले मुसलमान है यार, क्यों इसको हिन्दू समझ कर समझा रहे हो आप लोग। हा हा। और सलीम मियाँ कह रहे हैं वे जूतों से बात करते हैं। मत घबराइये मियाँ इधर हम भी झपाटे से बात करते हैं भाई। हा हा। और रही बात जमाल बाबू की, तो उन्हें तो वैसे ही इस्लाम का अजीर्ण हो गया है। बेचारे दवा खोजते फिर रहे हैं शिवलिंग में। शायद मिल जावे इन्हें, क्योंकि भोले बाबा कहाँ किसी को निराश करते हैं ?
बम बम ।