बुधवार, 27 अप्रैल 2011

धर्म कोई बुरा नहीं होता, धर्मांध बुरे हैं

मित्रो, पिछले काफी दिनों से धर्म को लेकर चर्चाएँ छिड़ी हैं, कुछ लोग इसे विवादित विषय मानकर ऐसी चर्चाओ में भाग नहीं लेना चाहते. बल्कि खुद भाग जाते हैं. जबकि मौजूदा दौर में इस बात पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए. हल्ला बोल ने एक ऐसा मंच हमें दिया है. जिस पर हम लोग अपनी बात खुलकर कह सकते है, किसी भी बात के लिए सबका अलग-अलग नजरिया होता है, जरुरी नहीं की वह बात सभी की समझ में आ जाय. समझ में तब आएगी जब  हम सौम्य शब्दों में इसकी चर्चा करेंगे. आज हिन्दू या मुसलमान की परिभाषा  क्या है यह आप लोंगो को पता हो, पर शायद हमें नहीं है. जब मैं कोई भी बात करता हूँ तो विरोध होने लगता है. आखिर क्यों ..? यदि मैं नासमझ हूँ तो आप लोग हमें समझाएं, मैं कोई ज्ञानी नहीं हूँ, एक मोटी बुद्धि का व्यक्ति भी हो सकता हूँ. आशुतोष जी का कहना है की वे मुझे समझ नहीं पाए, ऐसे तमाम लोग होंगे जो हमें नहीं समझ पायें होंगे. जब की हम समझते हैं की हमें एक दूसरे को अच्छी तरह समझना चाहिए. यदि हमें समझ नहीं है तो आप लोग ही हमें समझाईये. 
मै  पहले ही कह चुका हूँ की इस ब्लॉग के नियम हमें स्वीकार हैं. निश्चित रूप से हिन्दुओ को भगवान राम का चरित्र और आदर्श पालन करना चाहिए. वहा यह भी लिखा है की जो मुसलमान भारत माँ का सम्मान करे, वन्दे मातरम स्वीकार करे. तिरंगे का सम्मान करे, वह इस ब्लॉग का लेखक बन सकता है, यानि राष्ट्रभक्त मुसलमानों से "हल्ला बोल" को कोई आपत्ति नहीं है, फिर आप बताये क्या मुसलमान इस्लाम त्याग देगा, वह कुरान पढना छोड़ देगा. शायद नहीं..
मैंने बी.एन. शर्मा जी का भंडाफोडू  ब्लॉग पढ़ा है. और कुरान भी पढ़ा है. शर्मा जी लिखी बाते गलत नहीं है. यदि इस्लाम धर्म के मानने वाले उन सभी बातो का अनुकरण करें तो निश्चित रूप से वे सम्पूर्ण विश्व में वे इस्लाम का परचम लहराता ही देखेंगे. वे चाहेंगे की सभी मानव जाति मुसलमान हो जाय. संसार में एक भी मूर्तिपूजक न दिखाई दे, जैसा की लादेन की सोच है. मैं इस बात को भी मानता हूँ की आज के दौर में अधिकतर मुसलमान बाबर और लादेन का अनुकरण करते हैं. आज भी जब पाकिस्तान क्रिकेट जीतता है तो पटाखे छोड़ते हैं , मिठाइयाँ भी बांटते हैं. वे यह भूल जाते हैं की उसी पाकिस्तान में भारत से गए मुसलमान आज भी {मोहाजिर} शरणार्थी और बंगलादेश गए मुसलमान "बिहारी मुसलमान" कहे जाते हैं. 
मैं यह गर्व से कह सकता हूँ की भारत में रहने वाले मुसलमान आज भी विश्व के सबसे सुरक्षित स्थान में रहते है. यह उन्हें अपना धार्मिक आयोजन करने की पूरी आज़ादी है. . यह हिन्दुओ के ही प्रेम और भाईचारे के देन है.
इसके बावजूद जो मुसलमान इस्लाम के नाम पर आतंक फैलाये वह हमें मंजूर नहीं है. मुसलमान यदि गुजरात कांड को गलत और  कश्मीर में हिन्दुओ पर हो रहे जुल्म का समर्थन करे तो यह भी मुझे मंजूर नहीं है. 
पर इसके लिए इस्लाम को दोषी ठहराना कहा तक उचित है. उन सभी बातों को गलत मन्ना चाहिए जो वास्तव में गलत हैं.
महान वैज्ञानिक और पूर्व  राष्ट्रपति कलाम साहब, वीर अब्दुल हमीद, अशफाकुल्लाह खान भी तो मुसलमान है. 
क्रिकेट में भारत की तरफ से खेलने वाले ज़हीर खान भी तो मुसलमान हैं. पर इनका आदर तो सभी करते है, शायद आप लोग भी..
वही इस्लाम के नाम पर तिरंगा जलाने वाले, हिन्दुओ पर अत्याचार करने वाले, पाकिस्तान की जीत पर तालियाँ बजाने वाले, हिन्दू धर्म शास्त्रों पर अंगुली उठाने वाले, मकबूल फ़िदा हुसैन जैसे देवी देवताओ का नंगा चित्र बनाने वाले मुसलमानों को मैं नहीं स्वीकार करता. 
ऐसे लोंगो के लिए श्री राम का धनुष और कृष्ण का सुदर्शन चक्र उठाने से भी हमें परहेज नहीं है. इसे न तो हिंसा कही जाएगी और न हत्या, यह वध होता है और दुष्टों, राक्षसों का वध करना तो हिन्दू धर्म की परम्परा रही है. हिंसा  के लिए मैं हथियार उठाने का समर्थक नहीं हूँ पर वध के लिए हथियार उठाने को सदैव तैयार हूँ..
पर मैं आप लोंगो से पूछना चाहता हूँ आज कितने हिन्दू हैं जो वध के पक्षधर हैं. 

आज इस्लाम के नाम पर जो आतंक फैलाया जा रहा है, हिन्दुओ को प्रताड़ित किया जा रहा रहा है, जब उसके लिए मैं हिन्दुओ को दोषी ठहराता हूँ तो लोग मुझे बुरा भला कहने लगते है. उन्हें यह नहीं समझ में आता की मै मुल्ला हरीश हूँ या हरीश सिंह हूँ. जुल्म सहना और चुप रहना भी तो मूक समर्थन है और यह समर्थन हिन्दू करता है. जो खुद को सेकुलर कहलाता है.
आप लोंगो से मैं कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूँ. . क्या ए राजा, कलमानी जैसे हिन्दुओ को हिन्दू अपना आदर्श मानेगा. ? वोट बैंक ख़राब न हो जाय इसीलिए धर्मनिरपेक्षता के नाम पर चुप रहने वाले उन हिन्दू नेताओ को आप अपना आदर्श मानेंगे जो मुसलमानों द्वारा हिन्दुओ पर हो रहे अत्याचार को देखकर भी आपसी सौहार्द की बात करते हैं. .? क्या आप बसपा प्रमुख मायावती जी को अपना आदर्श मानेंगे जो भगवान राम की प्रतिमा और देवी देवताओ की प्रतिमा पर पेशाब करने{ प्रभु माफ़ करें} वाले पेरियार जैसे लोंगो के नाम पर मेले लगवाती हैं. .? क्या आप आप मुलायम सिंह को अपना आदर्श मानेंगे जो खुद को मुल्ला मुलायम सिंह कहलाना पसंद करते हैं और रामभक्तो पर इसलिए गोलियां चलवाते हैं ताकि उनका मुस्लिम वोट बैंक बचा रहे..?
यह कैसा हिंदुत्व है सच जानते हुए भी सच से मुह मोड़ता है. आप उन हिन्दुओ को क्या कहेंगे जो ऐसे लोंगो का समर्थन करके सत्ता सौप देते हैं. .. हिन्दू धर्म में भी बहुत से लोग भटके हुए हैं, उन्हें सच का ज्ञान नहीं है. क्या उन्हें गालियाँ देकर हम धर्म से जोड़ सकते हैं जी नहीं, उनके अन्दर छुपे हुए,दम तोड़ रहे हिंदुत्व को हमें जगाना होगा. यदि हमें हिन्दू और हिंदुत्व को मजबूत करना है तो प्रभु राम के आदर्शो का पालन करने के साथ दुष्टों और राक्षसों के वध को भी तैयार रहना होगा.. क्योंकि राक्षस सिर्फ मुसलमानों में ही नहीं, भरी संख्या में हिन्दू चोले  में भी हैं. 
"हल्ला बोल" कौन है मैं नहीं जनता पर  मैं समझता हूँ की ब्लॉग जगत में  "हल्ला बोल" ने पहली बार हमें एक ऐसा मंच दिया है, जिस पर हम खुलकर सदियों से चले आ रहे धार्मिक मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं. पर सोचिये कितने हिन्दू इस ब्लॉग पर आ रहे हैं. कितने लोग इसे विवादित मानकर आना नहीं चाहते और वही लोग उन लोंगो के ब्लॉग पर जाकर समर्थन करते हैं जहा पर हिन्दू धर्म की खिल्लियाँ उड़ाई जाती हैं. हमारे आराध्य पर अंगुलियाँ उठाई जाती हैं. ऐसे लोंगो को आप किस श्रेणी का हिन्दू कहेंगे.. यहाँ पर उन मुसलमानों को भी आना चाहिए जो खुद को राष्ट्रभक्त समझते हैं, और खुलकर चर्चा करनी चाहिए. जब तक हम बात नहीं करेंगे तब तक विवाद ख़त्म नहीं होंगे.. 
कश्मीर के हालात भी बनेंगे, गोधरा भी होगा, गुजरात कांड भी होगा, पाकिस्तान की जीत पर तालियाँ भी बजेंगी, और हिन्दू मुसलमानों को गालियाँ भी देते रहेंगे, और धर्म के नाम पर हिन्दू संस्कृति पर प्रहार भी होता रहेगा.. और इसके दोषी सिर्फ मुसलमान ही नहीं वे दोमुहे हिन्दू भी होंगे जो खुद को धर्मनिरपेक्ष कह कर अपनी कायरता दिखाते रहते हैं. 

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

मुस्लिम ब्लोगरों से : क्या यही इस्लाम है...?

जब मैं प्रेम और इंसानियत की बात करता हूँ तो कुछ ब्लोगर हम पर गालियों से प्रेम बरसाते हैं. पर मैं बुरा नहीं मानता, मुसलमान हमें हिन्दू मानता है, और कुछ हिन्दू ब्लोगर मुसलमानों का समर्थक ही नहीं बल्कि मुसलमान ही मानते हैं वे समझते हैं की मैं छाद्म्वेशधारी हूँ, कुछ लोंगो ने यह भी कहा की मैं अपने ब्लॉग की टीआरपी बढ़ाने के लिए विवाद खड़ा करता हूँ ......
बंधुओ मैं विवाद चाहता ही नहीं, बल्कि उसे जड़ से ख़त्म करना चाहता हूँ. मैं कोई साधू-संत या मौलवी नहीं की फूंक मारू और सब बदल जाये. मैं तो समझता हूँ मुझे छद्म वेशधारी बाबाओ और दकियानूसी विचारधारा के मुल्लाओ से दूर हो जाना चाहिए. धार्मिक ग्रन्थ जिन परिश्तिथियो में लिखे गए जब आदि मानव रहा करते थे. पूजा पद्धतियाँ वही हैं जिनका हम पालन करते हैं और उत्सव मनाते हैं. पर हिन्दू धर्म में ऐसा कही नहीं लिखा की जो इसे न माने उस पर अत्याचार करो. हा समाज के विरुद्ध और मानवता के विरुद्ध कार्य करने वाले के लिए दंड का प्राविधान अवश्य है.  
पर इस्लाम का हाल कुछ जुदा है. उसमे लिखी कई बाते विवादित हैं जो मानवता के विरुद्ध जाती है. इस्लाम को न मानने वाले मुशरिक यानि मूर्तिपूजक, काफ़िर जैसे शब्दों से नवाजे जाते हैं. आज कुरान के बारे में बोलने से हर कोई कतराता है. आखिर क्यों ..? किसी भी धर्म ग्रन्थ को पढ़कर यदि हमारे मन में सवाल उठते हैं तो उस धर्म के अनुयायियों का कर्तव्य बनता है की हमारी शंका का समाधान करें. न की उसे शरियत के खिलाफ कहकर बचते रहे,  कुरान में लिखी कई बातों पर आज भी सवाल उठाये जाते हैं. कुरान भी उस वक्त लिखा गया जब परिस्तिथिया आज से बिलकुल जुदा थी.  यदि आज के युग में उन सारी बातों का आचरण करेंगे तो उसका वही रूप होगा जो आशुतोष जी पोस्ट में है. यदि हमें स्वच्छ समाज बनाना है तो पहले मन को स्वच्छ बनायें. स्वच्छ्संदेश बनाने से क्या होगा. 
निचे दिए गया पोस्ट का लिंक भी देंखे. ..

एक ब्लॉग से लौट कर बिना किसी क्षमायाचना के......!!

यह पोस्ट राजीव ठेपदा   जी ने " भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" पर लिखी है, उसे भी पढ़े.

मेरी पोस्ट का मतलब किसी धर्म पर अंगुली उठाना नहीं होता बल्कि एक प्रश्न समाज के सामने रखना है. जिस पर लोग चर्चा करें की यह ख़त्म होनी चाहिए की नहीं. 
पिछली पोस्ट "मुस्लिम ब्लोगर यह बताएं क्या यह पोस्ट हिन्दुओ के भावनाओ पर कुठाराघात नहीं करती."
पर मुस्लिम ब्लोगरो को बोलना था पर कोई नहीं बोला और यह चुप्पी ही हमें दूर ले जा रही है, इसी चुप्पी के कारण आज हिन्दू मुसलमान के बीच दूरी है. जब तक एक दूसर के सवालो का जबाब हम नहीं देंगे तब तक शक के घेरे में रहेंगे.  अब एक प्रश्न और मुस्लिम ब्लोगरो से ..........
इस पोस्ट पर की गयी मेरी टिपण्णी.........
मैंने कब कहा आशुतोष जी की यह बात सही है, मैंने पहले ही कहा था की इस ब्लॉग के नियम सही है. कब गलत कहा. आज ऐसे ही कट्टर मुसलमान पूरे इस्लाम को बदनाम कर रहे है, ऐसे मुसलमान राष्ट्रद्रोही है ऐसे लोंगो को सरेआम बीच सड़क पर जूते से पीट कर मार देना चाहिए. राष्ट्रद्रोही और इंसानियत की हत्या करने वाले मुसलमानों को मैं कत्तई पसंद नहीं करता. और जो लोग इनका समर्थन करते हैं. ऐसे सभो लोंगो को मैं गद्दार समझता हूँ चाहे वे हिन्दू हो या मुसलमान,
आपने देखा यह भारत को औरंग की जमी बता रहा है और चाँद सितारा लहराने की बात कर रहा है. और वह किसके टिकट पर चुनाव लड़ रहा है. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस पार्टी के...... जो ऐसे लोंगो को बढ़ावा दे वे सभी गुनाहगार हैं. चाहे वे हिन्दू हो चाहे मुसलमान,, उसके लिए वे मतदाता भी दोषी हैं जो ऐसे पार्टी को वोट करते हैं जो इंसानियत की हत्या की बात करने वाले को बढ़ावा दे रहा है. जिन कुत्तो को सरेआम फंसी पर लटका देना चाहिए उसे चुनाव लडवाया जा रहा है. जो देश के मान-सम्मान और शान तिरंगे झंडो को जला रहा है उसे गोली से उड़ा देना चाहिए. चाहे वह किसी भी कौम का हो.. इस्लाम के नाम यह गंदगी खुद इस्लाम को बदनाम कर रही है.
मैं सभी मुसलमान भाइयों से अपील करना चाहूँगा. हमें यह बताएं........ क्या उनका इस्लाम ऐसा कहता है, यदि हां तो इस्लाम अच्छा कैसे. ...... ?
यह विवादित मसला नहीं बल्कि मानवता के लिए अति आवश्यक चर्चा का विषय है. यदि यही इस्लाम है तो इससे बुरा और कोई धर्म हो ही नहीं सकता.... ----------------------------
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मैं यह सवाल पूछना चाहता हूँ मैं हर उस ब्लोगर से जो ऐसे मसलो को विवादित कह विचार व्यक्त करने से इंकार कर देता है आखिर क्यों..?  . हम इसे कायरता मानते हैं, गीत, ग़ज़ल, कविता और कहानियां लिखकर साहित्यकार बने रहे और उन मसलो पर चर्चा करना ही बंद कर दे. जो मसले आज भी समाज के लिए घातक  बने हैं.  जरुरत इस बात की है कि हम उन सारे सवालों पर खुलकर एक दूसरे
से चर्चा करें. जब देश में इस्लाम के नाम पर, शरियत के नाम पर आतंक फैलाया जा रहा है, मानवता की हत्या की जा रही है, देश में तिरंगे जलाये जा रहे हैं, इस्लामिक झंडे फहराए जा रहे है तो हिन्दू निश्चित ही मुसलमानों को शक की दृष्टि से देखेगा. और इसका जवाब हर उस मुसलमान और उस कट्टरता के पोषक हिन्दुओ को भी देना होगा जो देश में अमन और शांति चाहता है,  नहीं तो कभी कश्मीर जैसे हालात  कही भी हो सकते हैं. गुजरात जैसी घटनाये कही भी हो सकती हैं.  जरुरी नहीं कि यह काम  मुसलमान ही करे. हालात पैदा होते है तो क्रांति के कारण ही बनते है.  जरुरत क्रांति की नहीं - शांति की है. धर्म के नाम पर आतंक की नहीं, मानवता और इंसानियत की रक्षा की है.....

अनुरोध -- इस चर्चा में अवश्य भाग ले....


शनिवार, 16 अप्रैल 2011

मुस्लिम ब्लोगर यह बताएं क्या यह पोस्ट हिन्दुओ के भावनाओ पर कुठाराघात नहीं करती.

मेरी सोच हमेशा यह रही है की प्रेम और इंसानियत से बढ़कर कोई धर्म नहीं होता. पर कुछ लोग धर्म के प्रति इतने कट्टर होते हैं की उनकी कट्टरता खुद उन्ही के धर्म को बदनाम करती है. अभिव्यक्ति की स्वंत्रता सभी को है, पर यही स्वंत्रता जब दूसरे के धर्म को बदनाम करने का हथियार बने तो यह अत्यंत निंदनीय है. और ऐसे ब्लोगर हर कौम में है. ईश्वर के बनाये हर इन्सान से मैं प्रेम करता हूँ. पर गलत विचारों का समर्थन कभी नहीं करता. 
इससे पहले मेरी पोस्ट "माफियाओं के चंगुल में ब्लागिंग" में अनवर भाई ने यह कहा यदि मैं शिव जी बारे में गलत लिखा है तो माफ़ी मांग लेंगे. नीचे जिस पोस्ट का उल्लेख किया जा रहा है वह अनवर भाई ने दुसरे के ब्लॉग से अपने सामुदायिक ब्लॉग पर लगायी है, जिसका लिंक भी दिया गया है.  क्या यह पोस्ट हिन्दुओ के भावनाओ पर चोट नहीं करती, खुले दिल से अपने विचार व्यक्त करें. अनवर भाई यह बताएं की यह गलत है या सही......... क्या वे माफ़ी मांगेंगे./ 
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एक अनुत्तरित सवाल जो हरेक शिवरात्रि पर पूछा जाता है .

क्या लिंग पूजन भारतीय संस्कृति है ?

           आज 'शिवरात्री' है। एक ऐसे भगवान की पूजा आराधना का दिन जिसे आदि शक्ति माना जाता है, जिसकी तीन आँखें हैं और जब वह मध्य कपाल में स्थित अपनी तीसरी आँख खोलता है तो दुनिया में प्रलय आ जाता है। इस भगवान का रूप बड़ा विचित्र है। शरीर पर मसान की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटा में गंगा नदी तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को उन्होंने अपना वाहन बना रखा है।
          भारत में तैतीस करोड़ देवी देवता हैं, मगर यह देव अनोखा है। सभी देवताओं का मस्तक पूजा जाता है, चरण पूजे जाते हैं, परन्तु इस देवता का 'लिंग' पूजा जाता है। बच्चेबूढ़ेनौजवान, स्त्रीपुरुष, सभी बिना किसी शर्म लिहाज़ के , योनी एवं लिंग की एक अत्यंत गुप्त गतिविधि को याद दिलाते इस मूर्तिशिल्प को पूरी श्रद्धा से पूजते हैं और उपवास भी रखते हैं।
          यह भगवान जिसकी बारात में भूतप्रेतपिशाचों जैसी काल्पनिक शक्तियाँ शामिल होती हैं, एक ऐसा शक्तिशाली देवता जो अपनी अर्धांगिनी के साथ एक हज़ार वर्षों तक संभोग करता है और जिसके वीर्य स्खलन से हिमालय पर्वत का निर्माण हो जाता है। एक ऐसा भगवान जो चढ़ावे में भाँगधतूरा पसंद करता है और विष पीकर नीलकण्ठ कहलाता है। ओफ्फोऔर भी न जाने क्याक्या विचित्र बातें इस भगवान के बारे में प्रचलित हैं जिन्हें सुनजानकर भी हमारे देश के लोग पूरी श्रद्धा से इस तथाकथित शक्ति की उपासना में लगे रहते है।
          हमारी पुरा कथाओं में इस तरह के बहुत से अदृभुत चरित्र और उनसे संबधित अदृभुत कहानियाँ है जिन्हें पढ़कर हमारे पुरखों की कल्पना शक्ति पर आश्चर्य होता है। सारी दुनिया ही में एक समय विशेष में ऐसी फेंटेसियाँ लिखी गईं जिनमें वैज्ञानिक तथ्यों से परे कल्पनातीत पात्रों, घटनाओं के साथ रोचक कथाओं का तानाबाना बुना गया है। सभी देशों में लोग सामंती युग की इन कथाओं को सुनसुनकर ही बड़े हुए हैं जो वैज्ञानिक चिंतन के अभाव में बेसिर पैर की मगर रोचक हैं। परन्तु, कथाकहानियों के पात्रों को जिस तरह से हमारे देश में देवत्व प्रदान किया गया है, अतीत के कल्पना संसार को ईश्वर की माया के रूप में अपना अंधविश्वास बनाया गया है, वैसा दुनिया के दूसरे किसी देश में नहीं देखा जाता। अंधविश्वास किसी न किसी रूप में हर देश में मौजूद है मगर भारत में जिस तरह से विज्ञान को ताक पर रखकर अंधविश्वासों को पारायण, जपतप, व्रतत्योहारों के रूप में किया जाता है यह बेहद दयनीय और क्षोभनीय है।
          देश की आज़ादी के समय गाँधी के तथाकथित 'सत्य' का ध्यान इस तरफ बिल्कुल नहीं गया। नेहरू से लेकर देश की प्रत्येक सरकार ने विज्ञान के प्रचार-प्रसार, शिक्षा और भारतीय जनमानस के बौद्धिक विकास में किस भयानक स्तर की लापरवाही बरती है, वह इन सब कर्मकांडों में जनमानस की, दिमाग ताक पर रखकर की जा रही गंभीरतापूर्ण भागीदारी से पता चलता है। आम जनसाधारण ही नहीं पढ़े लिखे शिक्षित दीक्षित लोग भी जिस तरह से आँख मूँदकर 'शिवलिंग' को भगवान मानकर उसकी आराधना में लीन दिखाई देते हैं, वह सब देखकर इस देश की हालत पर बहुत तरस आता है।
          यह भारतीय संस्कृति है! अंधविश्वासों का पारायण भारतीय संस्कृति है ! वे तथाकथित शक्तियाँ, जिन्होंने तथाकथित रूप से विश्व रचा, जो वस्तुगत रूप से अस्तित्व में ही नहीं हैं, उनकी पूजा-उपासना भारतीय संस्कृति है! जो लिंग 'मूत्रोत्तसर्जन' अथवा 'कामवासना' एवं 'संतानोत्पत्ति' के अलावा किसी काम का नही, उसकी आराधना, पूजन, नमन भारतीय संस्कृति है?
          चिंता का विषय है !! कब भारतीय जनमानस सही वैज्ञानिक चिंतन दृष्टि सम्पन्न होगा !! कब वह सृष्टी में अपने अस्तित्व के सही कारण जान पाएगा!! कब वह इस सृष्टि से काल्पनिक शक्तियों को पदच्यूत कर अपनी वास्तविक शक्ति से संवार पाएगा ?
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क्या यह लेख नही बताता  की प्रेम मोहब्बत की बात करने वाले अनवर भाई अपना व्यक्तित्व खुद ही गिरा रहे हैं. 
यदि अनवर भाई के समर्थक है तो भी अपनी टिपण्णी दे. पर यह साबित करें की यह पोस्ट उचित है. मैं सभी मुस्लिम व हिन्दू ब्लागरो से निवेदन करूँगा की अपने विचार अवश्य रखें. 

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

माफियाओं के चंगुल में ब्लागिंग

क्या इसी सभ्यता पर करेंगे हिंदी का सम्मान


रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय ,
टूटे  से फिर ना जुटे, जुटे गांठ पड़  जाय.
मनुष्य जीवन इस सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ रचना है. भगवन ने अपनी सारी कारीगरी समेट कर इसे बनाया है. जिन  गुणों और विशेषताओं के साथ इसे भेजा गया है, वे किसी अन्य  प्राणी को प्राप्त नहीं हैं. भगवान तो सबका पालनहार पिता है. उसे अपनी संताने एक सामान प्रिय हैं. और वह न्यायप्रिय है. स्वयं निराकार होने के कारण उसने मनुष्य को अपना मुख्य प्रतिनिधि बनाकर भेजा है. ताकि वह सृष्टि {विश्व व्यवस्था} की देखरेख कर सके. उसे उसकी आवश्यकता से अधिक सुख सुविधाएँ और शक्तियां इसलिए दी हैं की वह उसके विश्व उद्यान को सुन्दर,सभ्य  और खुशहाल बनाने में अपनी जिम्मेदारियों को ठीक ढंग से निभा सके. 
पर मनुष्य की पिपाशा, लोभ और स्वार्थ इतना बढ़ गया है की वह विश्व उद्यान को सजाने सवारने  के बजाय उसे नष्ट करने में जुट गया है. हम सभी मानते हैं की ईश्वर एक है,  मात्र वही एक पालनहार पूरी सृष्टि का सञ्चालन कर रहा है. धर्म या जाति का बंटवारा ईश्वर ने नहीं बल्कि मनुष्य ने किया है. हिन्दू मानता है की मनु और सतरूपा से मनुष्य जाति का प्रादुर्भाव हुवा और मुसलमान आदम और हव्वा को बताता है.  मेरी खुद की सोच है की दोनों एक को ही अलग अलग भाषाओ में परिभाषित करते हैं. हो सकता है की यही सोच आप लोंगो की भी हो. जब सभी मनुष्य जाति एक ही पूर्वज की संतान हैं तो झगडे किस बात के हो रहे हैं. सभी आपस  में भाई-भाई होने के बावजूद क्यों लड़ते हैं. यह श्रृंखला जब मैंने शुरू की तो कुछ लोंगो ने मुझपर आरोप लगाये की मैं सलीम खान और अनवर जमाल का समर्थन करता हू, जी नहीं यह बात सर्वथा अनुचित है. दोनों ब्लोगर हैं मैं दोनों का सम्मान करता हूँ. पर आपत्तिजनक विचार किसी के हो उसका मैं समर्थन नहीं करता. और न ही "बी एन  शर्मा जी ,सुरेश चिपलूनकर जी हमारे लिए दुश्मन है. जिस तरह मुसलमान सलीम खान और अनवर जमाल को अपना प्रतिनिधि नहीं मानता उसी तरह हिन्दू भी बी एन शर्मा और सुरेश चिपलूनकर को अपना प्रतिनिधि नहीं  मानता है. मेरा विरोध किसी से भी व्यक्तिगत नहीं बल्कि विचारों का है.  फिर भी इनके लेखो पर समस्त मुसलमानों और समस्त हिन्दुओ पर अंगुलिया उठाई जाने लगती हैं. जब सलीम खान ने लिखा की "

जापान दुनियाँ का पहला देश जिसने इस्लाम को प्रतिबंधित किया !

तब  मुझे यह बिलकुल अच्छा नहीं लगा था क्योंकि एक तरफ उसी परमात्मा के बनाये हुए इन्सान भयंकर हादसे से पीड़ित थे और दूसरी तरफ सलीम खान "इस्लाम" का प्रचार करने में जुटे थे. मैं सलीम भाई से पूछना चाहूँगा की पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक सहित कई मुस्लिम देश जो इस्लाम को ही मानते हैं फिर उन पर मुसीबते क्यों आई. अब कोई यह मत कह देना की यहाँ मनुष्यों द्वारा शुरू की गयी लड़ाई है और वह खुदा के फज़ल से हुआ....... जी नहीं खुदा इतना कठोर नहीं हो सकता की अपनी संतानों को इस तरह की यातना दे. निश्चित रूप से हर मनुष्य अपने कर्मो की सजा भोगता है. प्रकृति के साथ किया गया खिलवाड़ मनुष्य को ही भोगना पड़ेगा.  सलीम खान की पोस्ट में अहंकार भी झलकता है जो उनके व्यक्तित्व को छोटा कर देता है. अपने ही ब्लॉग पर उन्होंने ने लिखा है. 

दोस्तों का दोस्त और दुश्मनों का दुश्मन हूँ::: सलीम ख़ान


भई ! सीधा सा फ़ॉर्मूला है TIT FOR TAT ! अभी पिछले दिनों एक सज्जन ने मुझे फ़ोन करके पूछा कि आप ऐसे क्यूँ हैं?
मैं कहा::: क्यूँ वे ऐसे है, इसलिए. जब मैं मोहब्बत से बात करता हूँ तो लोग डरपोंक समझते हैं और जब मैं जूता उठता हूँ तो वो सलाम करते हैं.
तो भई जूता खाना कौन चाहता है और कौन मोहब्बत से रहना चाहता है वो खुद ही तय कर ले.
-सलीम ख़ान
हद तो यह है की ऐसे अहंकार भरे शब्दों का विरोध करने के बजाय कुछ लोंगो ने उनकी तारीफ भी की...

सलीम खान के कई लेख निश्चित रूप आपत्तिजनक है. पर उसी ब्लॉग पर उन्होंने कई ऐसे लेख भी लिखे है जो निश्चित रूप से प्रेरणा देते हैं. हम सलीम खान के उसी रूप को पसंद करते हैं जहा पर वे आपसी सौहार्द और भाईचारे की बात करते हैं. यही हाल अनवर जमाल खान का भी है. बन्दा  पठान है जोश में आकर कुछ भी लिख देता है. जैसे उन्होंने शिवलिंग के बारे में जो आपत्तिजनक बाते लिखी वह और लोंगो की तरह मुझे भी पसंद नहीं आई. पर वही अनवर भाई ने भगवन शिव के बारे में बेहतरीन पोस्ट भी लिखी है. यही नहीं प्रेम, हिन्दू-मुस्लिम एकता के बारे में भी उन्होंने काफी कुछ लिखा है. 

पर हिन्दुज्म की बात करने वाले  बी एन शर्मा और सुरेश चिपलूनकर ने इस्लाम और अल्लाह की बुराई के सिवा कुछ भी नहीं लिखा. इसी तरह कई ऐसे लेखक भी हैं जो चेहरा छुपाकर लोंगो को गालियाँ देने में ही अपनी शान समझते हैं.  उन नकाबपोशो से यह लोग अच्छे हैं जो कुछ कहते हैं तो खुलेआम कहते हैं. 

मैं मानता हूँ कश्मीर में जो हिन्दुओ के साथ हो रहा है वह निश्चित रूप से गलत है. जो गुजरात में हुआ वह भी गलत है. देखा जाय  तो हिन्दू-मुसलमान को लेकर देश में कितनी लड़ाईयां हो चुकी हैं, अब तो जाति के नाम पर, शिया सुन्नी के नाम पर  लोग एक दुसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं. आखिर क्यों.?  अभी तक बाबरी मस्जिद को लेकर लाखो लोग अपनी जान गँवा चुके हैं. जिन लोंगो की जान दंगे में गयी क्या वही लोग दोषी थे, जिनके परिवार आज भी उस त्रासदी को झेल रहे हैं उनका कुसूर क्या है..? जिन बातों को बहुत पहले भुला देना चाहिए था उसी बातों को हम बार-बार जिन्दा करके कही न कही मानवता को नुकसान पहुंचा रहे हैं. 

मैंने ब्लोगिंग के दौरान बहुत से ब्लोगों पर गया और देखा की ९९ प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो किसी भी विवाद से दूर रहना चाहते हैं. ऐसे लोंगो के नाम गिनना शुरू करूँ तो शायद सारे  नाम लिखने के लिए मुझे कई दिनों का वक़्त चाहिए, मैं ऐसे सभी लोंगो को प्रणाम करता हूँ जो हिन्दू मुसलमान होने से पहले एक सच्चे इन्सान हैं और इन्ही लोंगो से आज इंसानियत जिन्दा हैं. आज यदि देश में अमन चैन कायम है तो ऐसे ही लोंगो की देन हैं., मैं देखता हूँ कई लोग मुझे गलियां देते हैं, अपशब्दों से नवाजते हैं पर मैं उनकी बातों का बुरा नहीं मानता. क्योंकि गालियाँ  देने वाले डरपोक लोग हैं. ना तो उनकी कोई पहचान होती है और ना ही ऐसे लोग अपने नाम उजागर करना चाहते है. निश्चित रूप से ऐसे लोग डरते हैं.... सच भी है जिनकी मानसिकता गलत है. जो समाज में  विन्द्वंश फैलाना चाहते हैं वे तो डरेंगे ही. यदि सच कहना ही है तो पहचान छुपाने की जरुरत क्या है. 

मैं एक पत्रकार हूँ पर यह अच्छी तरह जानता  हूँ जो बातें अख़बार में लिखी जाती हैं वह लोग पढ़ते हैं और भूल जाते है. पर ब्लॉग पर लिखी बाते हमारी आने वाली पीढियां भी पढ़ेंगी, वे क्या सोचेंगी हमारे बारे में. लिहाजा बाते वही होनी चाहिए जो इन्सान और इन्सान के बीच आपसी सौहार्द कायम रखे. आपसी प्रेम बनाये रखे. 

आज यदि हिन्दू मुसलमान के बीच बनी खाई गहरी होती जा रही है तो उसके गुनाहगार हम सभी हैं. प्रत्येक मानव धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर आपस में मनमुटाव बनाये हुए है. मात्र चंद लोंगो के किये की सजा सभी को भुगतनी पड़ती है. आखिर धर्म और जाति की बेड़ियों में जकड़कर हम कब तक मानवता को दागदार करते रहेंगे. 

एक अनुरोध सभी से...........

 आप सभी लोंगो से अनुरोध है की उन सभी ब्लागरों का विरोध करें जो आपसी प्रेम में खटास पैदा कर रहे हैं. जो मानवता को शर्मशार कर रहे हैं. उनका सबसे अच्छा विरोध यही है की उनकी किसी भी पोस्ट पर न तो कमेन्ट करें और न ही उन्हें तरजीह दें. आज दुनिया कहा से कहा जा रही है और लोग  फालतू बातो में वक्त जाया कर रहे हैं है. 

 


सोमवार, 11 अप्रैल 2011

माफियाओं के चंगुल में ब्लागिंग -4

हिन्दू कट्टर कैसे........... ?  मेरी नजर में कट्टरता....

क्या इसी सभ्यता पर करेंगे हिंदी का सम्मान [ चौथा भाग ]

 लोग कहते है की   कट्टरता हमारे लिए  घातक है पर इस बात को मैं नहीं मानता , कट्टरता ही एक ऐसा रास्ता  है जो सारे विवाद को नष्ट कर सकता है. पर कट्टरता क्या होती है शायद यह किसी को पता नहीं है, और जो कट्टरता हमारे समाज  को विध्वंस कर रही है,  वह रूढ़िवादिता में सिमटी एक  ऐसी कट्टरता है जो हिन्दू धर्म को चौपट कर रही है. जब लोग कहते है की इस्लाम तलवार के दम पर बना एक ऐसा धर्म है जो लोंगो को भयाक्रांत करता है. जब मैं छोटा था तो मैं भी इस बात को मानता था. पर धीरे-धीरे जब मैं समाज से जुड़ता गया तो देखा और महसूस किया की कोई भी धर्म सिर्फ डर या तलवार के दम पर इतना विशाल नहीं हो सकता. कोई न कोई बात इस्लाम में जरुर है जो दिनों दिन आगे बढ़ता गया. आखिर इस बात का राज़  क्या है. जब इसकी गहराई में गया तो पाया की हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियाँ और छुआछूत तथा इस्लाम में समावेश प्रेम ने ही इस्लाम को मानने वालो में इजाफा किया है. यदि देखा जाय तो हिन्दू कोई धर्म नहीं बल्कि एक जीवन शैली है, हिन्दू धर्मशास्त्र  जीवन जीने के नियम है. पर हिन्दुओ ने उन नियमो को मानना छोड़ दिया है. " यदि यह कहे की आज मुसलमान उन नियमो को अधिक मानता है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. जो काम और जिन नियमो आदर्शो का पालन मुसलमान करता है यदि हिन्दू  उन्ही नियमो का पालन करता तो आज के भारत में उतने मुसलमान कदापि नहीं होते जितने आज की तारीख़ में हैं. " जिस तरह "गीता" एक सम्पूर्ण जीवन शैली है. उसी प्रकार "कुरान" सभी हिन्दू धर्म शाश्त्रो का सार है. कुरान में लिखी लगभग सभी बाते किसी न किसी हिन्दू धर्म शास्त्र में मिल जाएगी. जो आपसी प्रेम मुसलमानों में है वह हिन्दुओ में रह ही नहीं गया है. जब मुसलमान मस्जिद में नमाज़ पढने जाता है तो नमाज़ पढने के बाद एक दुसरे से गले मिलता है, वह यह नहीं देखता की उसकी बगल में खड़ा व्यक्ति किस जाती है पर जब हिन्दू मंदिर में पूजा करने जाता है तो छोटी जाती से दुरी बना लेता लेता है क्योंकि इश्वर के दरबार में भी उसे छुआछूत की बीमारी जकड़े रहती है. वहा भी धर्म भ्रष्ट होने का भय बना रहता है. मैं पूछना चाहता हूँ हिन्दू धर्म के उन ठेकेदारों से क्या इसी दम पर तुम हिन्दू धर्म को मजबूत बनाओगे. कट्टर बनो पर धर्म के प्रति, धर्म जो शिक्षा देते है उन पर अमल करो. फिर तो सरे विवाद ही ख़त्म हो जायेंगे. 

पर यहाँ पर हम धर्म की चर्चा  करने नहीं बैठे है. आज हम हिन्दुओ की कथित कट्टरता पर बात करेंगे जिस कट्टरता ने हमेशा हिन्दुओ को कमजोर करने का काम किया है. आज के परिवेश में यदि किसी हिन्दू से पूछा जाय की वह किस जाती का है तो कोई भी हिन्दू यह नहीं कहेगा की वह हिन्दू है. ब्राह्मन,   ठाकुर, यादव, चमार, पासी { माफ़ करना भाई कोई एस सी एस टी  मत लगवा देना }  गड़ेरिया, कोइरी, बनिया आदि आदि जाती बताएगा...... और यही सवाल यदि किसी मुसलमान से किया जाय तो वह सिर्फ मुसलमान कहेगा, यह है धर्म के प्रति सच्ची आस्था , जातिया मुसलमानों में भी बनी  है पर उससे उनका समाज नहीं टूटता, वहा पर जातियां खान-पान व व्यवहार को नहीं बाँटती, वहा पर छुआ छूत नहीं है. यदि कही दिखता भी है तो  उसका कारण  जातियां नहीं होती, जबकि हिन्दू धर्म में ऊँची नाक वाले छोटी जाति के यहाँ खाना तो दूर पानी पीना भी पसंद नही करेंगे. छुआ छूत का कैंसर हमारे अन्दर इतना समां गया है. की उसे बाबा रामदेव का योग भी दूर नहीं कर सकता. हिन्दू शिक्षित भले ही हो पर धार्मिक कुरीतियों में जकड़कर इतना असहाय हो चुका है की  वह छटपटाने के बावजूद उस बंधन से निकलना नहीं चाहता. और यही  कारण धीरे-धीरे हिन्दू धर्म को कमजोर कर रहा है. 

जिन मुसलमानों पर हम अंगुलिया उठाते है. सच्चा  प्रेम हमें वही दिखाई देता है. हिन्दू  आज यदि उसी प्रेम को अपनाये होते तो हिन्दू समाज का बंटवारा नहीं होता, जाति पाति  के आधार पर हम बंटे  नहीं होते. मै आज तक मुसलमानों की जितनी भी पार्टियों में गया वह पर जाति के आधार पर सम्मान पाते किसी को नहीं देखा. चाहे पठान हो या अंसारी, जिसमे जितनी क़ाबलियत वह उतना ही सम्मान का अधिकारी., हम किसी भी मुसलमान  भाई के यहाँ गए. सभी जितने प्रेम से मिलते हैं. क्या उतने ही प्रेम से हम उनसे मिलते है. भले ही लोग कहे मिलते है पर ऐसा नहीं है. आज भी हिन्दू  की बड़ी जातियों में मुसलमानों के लिए या हिन्दू  छोटी जातियों के लिए अलग से बर्तन निकाल  कर रखे जाते है. इस्लाम इतना कमजोर नहीं है की वह सिर्फ बर्तनों के आधार पर खतरे में पड़ जाय. पर हिन्दू धर्म खतरे में पड़ जाता है. जब हमारा धर्म इतना कमजोर है. कि सिर्फ छूने और खाने से कमजोर हो जाता है और भ्रष्ट हो जाता है तो ऐसे धर्म का मालिक कौन हो सकता है. 

मेरी नजर में जो मुसलमान है वह मुसलमान मैं भी हूँ. जी हाँ जनाब हरीश सिंह एक सच्चा मुसलमान है.मुसलमान का मतलब जानते हैं. " कुरान में केवल मुस्लिम शब्द का इस्तेमाल हुआ है. जिसके माने है, एक वो शख्स जो अपनी तमाम इच्छाओ को और अपने आप को खुदा { ईश्वर} के आगे नतमस्तक कर दे.

मेरी नजर में मुसलमान वह है जो "

जिसका सम्पूर्ण ईमान अपने ईश्वर अपने परवरदिगार के प्रति हो.  और यही भाव हिन्दुओ का भी होना चाहिए, निश्चित रूप से इस सृष्टी का संचालन करने वाला एकमात्र वाही परमात्मा है जिसे मुसलमान खुदा कहता है, ईसाई गाड कहता है या हिन्दू भगवान कहता है. जिसने भी सम्पूर्ण मानव जाति को इस पृथ्वी पर भेजा है वह एक ही है चाहे उसे हम किसी भी नाम से पुकारे. यदि ऐसा नहीं होता हमारे शरीर एक जैसे नहीं होते, हमारे खून का रंग एक नहीं होता बल्कि कुछ न कुछ अलग जरूर होता. हरीश सिंह एक सच्चा मुसलमान भी है और हिन्दू भी है. क्या फर्क पड़ता है. हम ईश्वर के प्रति समर्पित है. इसीलिए प्रेम कि भाषा बोलता है पर कुछ लोंगो को प्रेम कि यह भाषा समझ में नहीं आती. ईश्वर कि बनायीं हुई इस अनमोल कृति से प्रेम करना सीखो बंधुओ. कमियां सभी में होती है क्योंकि कोई मानव  खुदा नहीं है, यदि समाज को विवाद मुक्त करना है तो जाति के आधार पर धर्म के आधार पर  इन्सान को इंसानों से मत बांटो, यदि यह कोई मुसलमान यह समझे कि उसने हिन्दुओ की बुराई करके या भगवान को गाली देकर  कोई तीर मार लिया या हिन्दू यह समझे की उसने मुसलमानों को गाली देकर या खुदा को गाली देकर जग जीत लिया तो यह बेवकूफी और पागलपन के सिवा कुछ नहीं है. समाज से विवाद ख़त्म करना है उंच-नीच, धर्म-जाति, हिन्दू मुसलमान की बातों को छोड़कर प्रेम करना सीखो. खुद के अन्दर खो रहे इन्सान को देखो तभी मानव जाति का भला हो सकता है.
                                                                         क्रमशः ..............................

 

रविवार, 10 अप्रैल 2011

हाँ "किलर झपाटा"... हरीश सिंह एक सच्चा मुसलमान है....

माफियाओं के चंगुल में ब्लागिंग -३

क्या इसी सभ्यता पर करेंगे हिंदी का सम्मान [ तीसरा भाग ]

ब्लॉगर किलर झपाटा ने कहा…
जमाल बाबू क्यों इतना झुँझला रहे हो यार ? इत्ती लम्बी टिप्पणी की जगह एक पोस्ट ही मार देते जो कोई भी न पढ़ पाता क्योंकि हमारीवाणी से तुम्हें हमने ही तो डिच कराया है। हा हा।
१० अप्रैल २०११ १०:१६ अपराह्न
हटाएँ
ब्लॉगर किलर झपाटा ने कहा…
और ये बुल्ले मुसलमान का फ़ोटो हरीश सिंह के नाम से लगाकर लोगों को क्यों उल्लू बना रहे हो ? हा हा।
१० अप्रैल २०११ १०:१८ अपराह्न

यह  टिप्पणिया "किलर झपाटा" ने मेरी पोस्ट पर की है. बड़े खुश हैं की उन्होंने "अनवर जमाल" को  डिच कराया. बहुत बहादुरी का काम किया है. आपने तो विश्व विजय प्राप्त कर ली, महान हैं आप, आपने तो ऐसा पुनीत काम किया है. भारत सरकार को चाहिए की वह आपको फूल मालाओ से लाद दे.  आपकी जय-जैकार होनी चाहिए. आपके नाम पर अवार्ड घोषित होना चाहिए, क्योंकि आप ही तो वह सख्श हैं जिन्होंने हिन्दुओ को बदनाम किया है, आप जैसे लोंगो की वजह से ही आज मुसलमान हम पर अंगुलिया उठाता है. हम भले ही उसे अपना छोटा भाई कहे पर मुसलमान आज यदि इस पर विश्वाश करने को तैयार नहीं है तो वह आप जैसे लोंगो की देन है. आप जिस हिंदुत्व की बात करते हैं बता सकते हैं की इस हिंदुत्व ने हमसे क्या छीना है. कट्टर हम मुसलमानों को कहते हैं पर कट्टरता हिन्दुओ की नस में भरी है. जो दर्शन सनातन धर्म में था वही दर्शन इस्लाम में है. मुसलमान ही आज के दौर में सनातन धर्म का पालन कर रहा है. हिन्दू तो भटक गया है उसे तो यह भी नहीं पता की उसका धर्म क्या है. 

आप खुद को देख लीजिये, आप जिस चेहरे को प्रदर्शित कर रहे है. ऐसा चेहरा यदि वास्तव में सामने आ जाय तो सभी डर के घरो में छुप जायेंगे. हिन्दू आपकी आरती नहीं उतरेगा. कोशिस करेगा की जल्द से जल्द आप जैसे चेहरे वालो के सर कुचल दिए जाय. असली आतंकवादी आप नजर आ रहे हैं. और हमें अब हमारीवाणी जैसे एग्रीगेटर पर भी आती है. जो आप जैसे घटिया हिन्दुओ की बात मानता है. हमें परवाह नहीं की हमें हमारीवाणी से निकाल दिया गया या निकाल दिया जायेगा. आप जैसे हिन्दुओ से अनवर जमाल लाख गुना अच्छा है. ऐसे लोग हिंदी और हिंदुस्तान को बढ़ावा दे सकते हैं आप जैसे लोग नहीं. अनवर जमाल की टिप्पणिया कभी आपकी तरह अभद्रता समेटे नहीं होती. जो भी बात वे कहते हैं. एक शालीनता के साथ. डॉ. श्याम गुप्ता  जी के पोस्ट पर उनके बहुत कमेन्ट आये, जिस पर विवाद भी पैदा हुआ. उस विवाद की शुरुवात मैंने की थी. उसमे मैंने कई लोंगो को परखा. सिर्फ अनवर जमाल को पढ़ने के लिए मैंने अपने ब्लॉग पर ऐसी पोस्ट लिखी, जिससे हमारी वाणी के हिन्दुओ की ---- फट गयी. उन्होंने हमारे ब्लॉग को हटा दिया, जब हिन्दू बनते हो तो हिम्मत भी रखो क्यों फटने लगती है तुम्हारी. क्यों डरपोक हो जाते हो तुम. जिस पोस्ट ने तुम्हारे छक्के छुड़ा दिए और बिना सोचे समझे हमारी पोस्ट को हटा दिया. उस पर भी अनवर भाई ने शालीनता का दामन नहीं छोड़ा. जो बात हमने उन्हें भड़काने के लिए लिखी थी उस पोस्ट ने हमें खुद हमारी नजरो ने गिरा दिया. अनवर जमाल एक सच्चा मुसलमान है. सच्चा भारतीय है. हिन्दू संस्कृति का सम्मान करने वाला मनु का सच्चा संतान है. 

यदि हमारी वाणी वास्तव में एक अच्छा एग्रीगेटर  होता तो उसने एक नियम बनाये होते. जैसा की अपना ब्लॉग ने बनाया है. अगर हमारी वाणी की शर्तों का उलंघन कोई करता तो उसे चेतावनी देते. और तब जाकर ब्लॉग हटाया जाता. पर नहीं यहाँ तो हिंदी को बढ़ावा देने के नाम पर माफियागिरी चल रही है. हिटलरशाही का बोलबाला है. मोगाम्बो खुश हुआ तो ठीक नहीं तो कूद जाओ तेजाब के ड्रम में, तो भैया एग्रीगेटर के नाम पर तुम्हारी दादागिरी हमें मंजूर नहीं है. हममे क़ाबलियत होगी तो पढने वाले हमें खोज ही लेंगे. हम तुम्हारे अंधे और लंगड़े, बहरे, गूंगे और घूंघट में छिपे  माफियाओ से नहीं डरते. जो किसी को डिच करके रावन जैसी हंसी हँसे. 

हिन्दू कट्टर कैसे........... ? { पढ़े अगले भाग में

नोट------- लगता है हमें कुछ जादा ही लिखना पड़ेगा.   सलीम खान की बात और हरीश सिंह मुसलमान क्यों ? अब चौथे भाग में, गालीया ही सही  पर अपने विचार अवश्य दे. 

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

माफियाओं के चंगुल में ब्लागिंग - 2

क्या इसी सभ्यता पर करेंगे हिंदी का सम्मान [ दूसरा  भाग] 
पिछले भाग में हम बात कर रहे थे अशोभनीय टिप्पणियों की, बिना किसी लाग लपेट के हम कहना चाहेंगे की हम ब्लॉग में अपने अधिकारों का सदुपयोग नहीं दुरुपयोग कर रहे हैं. जब हम किसी से खुद के सम्मान की अपेक्षा रखते हैं तो निश्चित रूप से हमें दूसरों का भी सम्मान करना होगा, किसी भी एक व्यक्ति के लिए हम सम्पूर्ण समुदाय को दोषी नहीं ठहरा सकते, निश्चित रूप से कुछ भटके लोग इस्लाम या हिंदुत्व के नाम पर आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं. पर उनके किये गए कृत्यों से पूरा जनमानस प्रभावित होता है. चंद भटके हुए लोग सामाजिक विन्ध्वंस का काम करते हैं, जिसका भुगतान सर्व समाज को करना पड़ता है.  पर उसके लिए कोई भी धर्म दोषी नहीं है. यदि यह जिम्मेदारी हम किसी विशेष धर्म या समुदाय के ऊपर थोपते हैं तो निश्चित रूप से सामाजिक विन्ध्वंस में हम भी दोषी है. यदि हम यह अपेक्षा करते हैं की दूसरे लोग सुधर जाय तो पहले हमें सुधर कर दिखाना होगा. जरा आशुतोष जी की यह टिपण्णी देखें.........
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आशुतोष ने कहा…
नूर मोहम्मद जैसे जघन्य गद्दार &^@#$$ कातिलों व उनके आकाओं के लिए एक पंक्ति याद आई मेरी कविता की ........................................ ये नर मुंडो की मस्जिद मे खूनी नमाज को पढ़ते है. अपने पापों का प्रश्चित भी गोहत्या करके करते है | ......................................... इन कुत्ते की औलादों(माफ़ करे गलत शब्द इस्तेमाल करने के लिए) को जिन्दा दफ़न कर देना चाहिए..
-------------------------------------- अपनी रोजी रोटी का साधन नूर मोहम्मद ही नहीं गोपाल भी ढूंढता है. आज यदि गाय का वध किया जा रहा है तो क्या उसके लिए सिर्फ मुसलमान ही दोषी हैं, जी नहीं उसके लिए हिन्दू भी उतने ही दोषी हैं. जानवरों के चमड़े से बनी हुयी तमाम चीजे हम सभी अपने दैनिक उपभोग में लेते हैं. सिर्फ मांस खाने वाले लोग ही उन निरीह जानवरों के वध के लिए दोषी नहीं है बल्कि वे शाकाहारी लोग भी दोषी हैं जो चमड़े से निर्मित वस्तुओ का उपभोग करते हैं. फिर  ऐसे शब्दों का प्रयोग कहा तक उचित है जो हिन्दू - मुसलमानों या फिर किसी भी समुदाय के बीच आपसी विद्वेस पैदा करते हैं. डॉ. अनवर जमाल साहब ने सही कहा गाय बेचने वाले निश्चित रूप से गौपालक होते हैं. वही एम सिंह का कहना रहा की जिनसे यह गाये खरीदी जाती हैं वे भोले भाले लोंगो को पता नहीं होता की उनका हस्र क्या होता है. यहाँ पर मैं अनवर भाई का समर्थन करता हू. जो लोग गाय बेचते हैं वे अच्छी तरह जानते हैं की उनका हस्र क्या होगा. जब गायें दूध देने के काबिल नहीं रह जाती तो उन्हें चंद रुपयों की खातिर जिन लोंगो के हाथ में बेचा जाता है वे उनकी सेवा करने के लिए नहीं ले जाते, क्या आज के ज़माने में लोग इतने भोले हो गए हैं की उन्हें यह नहीं पता की उन गायों का हस्र क्या होगा. यदि ऐसी सोच नहीं होती और चंद सिक्को की लालच नहीं रहता  तो निश्चित रूप से उन गायों को गौशाला में दान दे दी जाती. यही नहीं बड़े पैमाने पर देंखें तो आज देश में  कई स्थान ऐसे हैं जहा पर गाय का मांस निर्यात किया जाता है. उन बूचडखानो में काम करने वाले सिर्फ मुसलमान ही नहीं होते, बल्कि हिन्दू भी होते हैं, मैं कई ऐसे हिन्दुओ को जनता हूँ जो यह काम करते हैं.  बल्कि यह कहना उचित होगा की गाय के मांस को निर्यात करने वाले सिर्फ मुसलमान ही नहीं होते, बल्कि बड़े पैमाने पर हिन्दू भी इस कृत्य में शामिल है. जो सरकार गायों को काटने और उनके मांस को निर्यात करने की अनुमति देती है वह सरकार मुसलमानों की नहीं बल्कि उस सरकार का बड़ा तबका हिन्दुओ का ही  है. हिन्दू धर्म की रक्षा का अलाप लगाने वाली भाजपा ने भी गाय के वध पर रोक नहीं लगा पाई फिर सारा दोष मुसलमानों को ही क्यों दिया जाता है. हम लोग कोई बात कहने से पहले सोचते नहीं है और धर्म पर अंगुली उठाना शुरू कर देते हैं. एक तरफ हम चाहते हैं की आपस में सांप्रदायिक सौहार्द, भाईचारा, प्रेम बना रहे और दूसरी तरफ आरोप-प्रत्यारोप के संकुचित दायरे से निकलने का प्रयास नहीं करते. यदि हम चाहते है की देश व समाज का विकास हो तो हमें एक दूसरे पर विश्वास करना होगा, एक दूसरे की अच्छी बातों को ग्रहण करना होगा. यदि कोई मुसलमान यह सोचे की हिन्दू धर्म को नीचा दिखाकर हम बड़े बन जायेंगे या फिर हिन्दू यह सोचे की मुसलमानों पर अंगुली उठाकर हम बड़े कहलायेंगे तो यह दूषित मानसिकता के अलावा कुछ नहीं है. हमें गौर करना होगा की जब हम अपनी एक अंगुली दूसरे की तरफ उठाते हैं तो बाकी चार अंगुलिया खुद बा खुद हमारी ओर उठ जाती हैं. ब्लोगिंग में भी यही हो रहा है जो हिंदी का  सम्मान नहीं बढ़ा रहा है बल्कि हिंदी का सर नीचा कर रहा है.
नोट-- अगले भाग में पढ़े हमारीवाणी की माफियागिरी और अनवर जमाल तथा सलीम खान का कसूर ..

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

माफियाओं के चंगुल में ब्लागिंग

क्या इसी सभ्यता पर करेंगे हिंदी का सम्मान [ प्रथम भाग]   
हम बड़े शान से लिखते है की "हिंदी मात्र एक भाषा ही नहीं वरन हमारी मातृभाषा है". जी हाँ हिंदी को बढ़ावा देने की बात हम बड़े गर्व से करते है पर कैसे बढ़ावा देंगे यह कभी सोचा है आपने. जी नहीं आप सोच सकते है पर सोचने की जहमत नहीं उठाते. 
यह बाते हमें काफी दिनों से खटक रही थी पर सोचता था की जाने दीजिये इन विवादित बातो से बचना ही उचित पर आज बड़े भाई प्रवीन शाह के ब्लॉग "सुनिए मेरी बात" पर एक पोस्ट पढ़ी ..... आप भी देंखे.

सलीम खान से डरते हो आप, आपके दिल में भी कोई जगह तक नहीं उसके लिये... इतने छोटे दिल के साथ कैसे ' हमारी वाणी ' कहला सकते हो आप ?

.देखा आपने , मैं प्रवीन जी  पोस्ट पर नहीं  जाता  पर इस पोस्ट में जो कमेट दिए गए हैं, मैं उनकी बात करता हूँ.  जब मैं ब्लॉग लेखन में आया तो  मैं समझा था की यह वही लोग लिखते होंगे जो वास्तव में समाज के बारे में चिंतित होंगे. एक अच्छे विचारक होंगे. येह  पर स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति होगी न की अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता ......... जी हा स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति से मेरा तात्पर्य है की हमारा समाज जो सदियों से पुराने रीतिरिवाजो से जकड़ा पड़ा है उसे मुक्त कराएँगे. भारतीय परम्पराओ का सम्मान  बढ़ाएंगे पर हो क्या रहा है. इस दौरान मैंने कई ब्लोगों पर भ्रमण किया. और सभी की मानसिकता को जाना ... कुछ ऐसे लोग मिले जो चाहते थे टिप्पणिया हमारे ब्लॉग पर आयें चाहे जैसे आये. भले ही किसी की माँ-बहन करनी पड़े. और कई लोग ऐसे मिले जो लिखने में मगन हैं उनसे यह नहीं मतलब की उनका ब्लॉग कोई पढ़ रहा है या नहीं. यह सब देखने के बाद मेरा यहसास काफी दुखद रहा. कुछ सामुदायिक ब्लॉग भी मिले जो बिना किसी नियम कानून के चल रहे है. साझा ब्लॉग बनाने का कोई भी मकसद नहीं. बस लेखक जुड़े औए जी चाहे जितना पोस्ट करते चले जाय. न कोई मकसद और न कोई सन्देश. बस पोस्ट लिखने है और लिखनी है. चाहे किसी के धर्म की खिल्लिया उड़ाई जाय. चाहे कमेन्ट बॉक्स में किसी की माँ-बहन की जाय. 
हम बात शुरू करते है. अपने ही ब्लॉग से. मैंने एक पोस्ट लगायी थी.

एक ऐसा दृश्य जिसने मानवता का सर शर्म से झुका दिया.

यह कोई लेख नहीं एक फोटो  फीचर था. हैरानी हुई यहाँ  पर आये कमेन्ट को देखकर . एक बार दिल कहा की ऐसे कमेन्ट हटा देने चाहिए पर हटाया नहीं क्योंकि हम चाहते है की लोग कमेन्ट के जरिये झलक रही उनके दिल की बात जाने और  किसी ने गलत कहा तो उसकी गलती का यहसास कराएँ, जबकि निश्चित तौर पर मन ही मन कुछ लोग गाली भी दिए होंगे. कुछ लोंगो ने यह भी सोचा  होगा की, हरीश जानबूझकर ऐसी बातो को सुनना चाहता  था, निश्चित है उन बातो की जिम्मेदारी कमेन्ट देने वाले और ब्लॉग मालिक की होती है. देंखे..
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निरामिष ने कहा… घृणित क्रूर कार्य!!! 
सलीम ख़ान ने कहा…
आज इंसान शैतान बन गया है, जबकि उसे ऊपर वाले ने फ़रिश्ता बनने के लिए इस दुनियां में कायम किया. जानवर को भी उसी ऊपर वाले ने ही बनाया लेकिन जानवर तो नहीं बदला मगर इंसान ज़रूर बदल गया और शैतान को भी अपने पीछे छोड़ दिया. ये बात हर जगह समान लागू है, कुछ अपवाद बचे हैं बस ! जानवर को इतनी छोटी गाड़ी में ले जाना अत्यंत निन्दनीय कार्य है....! ------------------------------------------------------------ यहाँ पर "निरामिष" इस कार्य की निंदा कर विवादों से पल्ला झाड़ लिया..वही सलीम खान नि घटना की निंदा करते हुए अच्छे विचार व्यक्त किये. पर जब लोग उनकी अंतिम पंक्ति पढ़े होंगे तो यही सोचा होगा. देखिये मुसलमान है इसलिए समर्थन भी कर रहा है. यही बात यदि एक हिन्दू ने कहा होता, तो कोई कुछ भी नहीं सोचता. जबकि उनकी सलाह उचित है. जो लोग जानवर खा रहे है उन्हें मना नहीं किया जा सकता.  हमारे कई ऐसे  मुसलमान दोस्त होंगे  जो भैंस या अन्य जानवरों मांस खाते हैं. पर हम भी उनके यहाँ जाकर क्या मुर्गा या बकरे का मांस नहीं खाते. हम सबको नहीं कह रहे हैं पर जो लोग खाते है. वह लोग भी किसी न जानवर की हत्या का कारण बन रहे हैं.  चाहे भैंस कटे या गाय या फिर बकरा जीव हत्या तो सब है पाप भी है. पर एक बराबर. हमारे जो फोटो थे वे दर्दनाक थे इस तरह किसी भी जानवर को ले जाना क्रूर कार्य है. सलीम ने सही कहा इतने छोटे वाहन में जानवरों को नहीं ले जाना चाहिए. हम भी यही कहना चाहते थे. क्योंकि जब सरकार खुद गाय कटवा रही है तो हम किसी धर्म विशेष को दोषी क्यों ठहराएँ. हम किसी को मांसाहार करने से नहीं रोक सकते. पर कोई भी कार्य तरीके से होना चाहिए. नोट.  जब हम इस पोस्ट को लिखना शुरू किये तो सोचे थे की सिर्फ सलीम, अनवर, हमारीवानी के विवादों से सम्बंधित बात लिखेंगे पर लिखने के दौरान देखा हम अपनी बात उस तरह से नहीं कह प् रहे हैं जैसे कहना चाहिए तो इसे धारावाहिक का रूप दे दिया, शायद बहुत कुछ और बहुत लोंगो के बारे में लिखना है. मेरा मकसद सिर्फ एक अच्छे समाज के निर्माण में सहायक बनना है.}                                                                                             क्रमशः......................