सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

अनवर भाई के साथ LBA परिवार को एक खुला ख़त

 


आदरणीय अनवर भाई और LBA परिवार के सभी भाई बहनों



अनवर भाई, आप शायद कई बातें बहुत जल्दी भूल  जाते हैं.मैंने आपको बड़ा भाई कहा है. और बड़ा भाई छोटे भाई को सँभालने की जिम्मेदारी से भाग जाय भला ऐसा हो सकता है कदापि नहीं, जरा अपनी लिखी बातों पर गौर फरमाए,
""अगर सत्य सुनने से आपको मेरे कहने के बाद भी ऐसा महसूस होता है कि आपको नीचा दिखाया जा रहा है तो मैं आगे से यहाँ कम आऊंगा ।""

आपने खुद ही कहा यहाँ  पर कम  आऊंगा.  यानि खुद छोड़ने की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि कुछ देर के लिए रूठने की बात ही कर रहे है. और रूठने वाले को मनाना  कोई मुश्किल काम नहीं और आप जैसे बड़े भाई  को मनाना  बहुत ही आसान है. मैं आपकी परीक्षा ले चुका हूँ , और आप पूरे  सौ नंबर से पास हुए है.,, यदि बहुत जानकर हैं, यही बता दीजिये आपकी परीक्षा कहा हुई थी, 
आपके अन्दर इंसानियत भरी हुई है, आपका दिल बहुत बड़ा है एक संवेदन शील कलाकार की तरह, एक जहीन इन्सान है पर मेरी नजर में, इस बात पर ध्यान दीजियेगा मैं कह रहा हू मेरी नजर में, यानि एक छोटा कह रहा है अपने बड़े भाई से,  न किसी हिन्दू से और न किसी मुसलमान से, मेरे भावों में न तो अनवर है और न ही हरीश , .....  आपमें लचीला पन नहीं है, आपमें झुकाव नहीं है. इसके पीछे कही न कही अहंकार लगता है. [जबकि यह सच नहीं है] यह दोनों गुण मैं आपमें देख चुका हु, बस उसे आप बाहर निकलने नहीं देते हैं. आपको लगता है की आप कही झुक गए तो कही आपका सम्मान घट न जाय,,,,, जबकि आपका कद सभी की नजरो में बढ़ जायेगा, यह भी मेरा ही विश्वाश है. ........... और जरुरी नहीं की मैं सही ही  हू.


इंसानियत  सभी में है किन्तु हर व्यक्ति की  परिभाषा अपनी अपनी होती है. किन्तु मेरी परिभाषा क्या है उसे मैं बता रहा हू..............,
मैं एक अदना सा इन्सान हु. मैं एक गरीब घर का बच्चा था, मेरी परवरिश किसी बंगले में नहीं. एक कच्चे मिटटी के मकान में हुई, शहर से दूर एक गाँव में हुई, उस गाँव में एक मुसलमान भी आता था, अभिवादन की  भाषा. कुछ और नहीं "जय राम जी की"  होती थी, और हमारे बड़े बुजुर्ग कहते थे "आव हो मौलाना," लोग प्रेम से बैठे रहते थे घंटो बात करते थे, उन लोंगो में मुझे कोई हिन्दू या मुसलमान नहीं सिर्फ दो इन्सान दिखाई देते थे. धर्म के नाम पर किसी को नीचा दिखने या दिखाने की इच्छा नहीं होती थी, उम्र के हिसाब से सम्मान देने की बात करते थे. और मैंने हमेशा सीखा वही जो देखता था. मैं उम्र को सम्मान  देता हु, रिश्तो को सम्मान देता हु, 
जाती धर्म को नहीं उस संस्कार को धर्म, मान की  जो मुझे विरासत में मिला , आपके धर्म में मां के पैर नहीं छूए  जाते. मेरे यहाँ छूए जाते है, तो मैं अपने मित्र समसुद्दीन मुन्ना {मो.09026783724 } की मां के पैर भी छूता हु क्योंकि वहा  मुझे कोई मुसलमान नहीं दिखता हिन्दू नहीं दिखता बल्कि मां दिखती है. आप ही कहते है न की जन्नत माँ की कदमो में होता है. यह क्यों नहीं कहते जन्नत मुसलमान मां की कदमो में होती है. क्योंकि आप भी मानते है न मां को किसी धर्म में नहीं बँटा जा सकता........ बंटेगा तब जब उसे हम सिर्फ एक औरत के रूप में देखेंगे..... और मेरे जितने दोस्त है वे चाहे किसी जाती  के हो किसी धर्म के हो वे मेरे भाई बन जाते हैं, चाहे बड़े बने या छोटे........  जब उन्हें मैं अपना भाई बना लेता हु तो, उनके सभी रिश्ते को अपना लेता हु तब वे मेरे लिए वे सब हिन्दू या मुसलमान नहीं रह जाते. ...... वे मेरे साथ जमकर होली मनाते हैं और मैं ईद बकरीद पर जमकर दावते उडाता हू . .. क्या मजा आता है ............. आपको एक घटना बताऊ. मेरा एक मित्र है जमाल खान .....  वह मेरे साथ मेरी रिश्तेदारी में गया.... मैंने उसे पहले  ही बता दिया यह सब पुराने ख़यालात के  है. भैया वे ठाकुर साहेब अभी तक बने है...... जमाल का नाम राहुल सिंह कर दिया. वह मेरे साथ एक दिन रहा और राहुल सिंह बनकर मेरे साथ खाया पिया, बात की हंसी मजाक हुआ...  हम चले आये........  उसे भी मजा आता था.....  वह साथ में  आठ बार मेरे साथ गया.    जब वे लोग जाने तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा, हँसे मजाक हुआ फिर भी बर्ताव वही रह गया  क्योंकि  लगाव का रिश्ता बन गया था. मेरी बुआ उसकी बुआ बन चुकी थी. हम दोनों एक सामान हो गए थे.        मुझे नहीं लगता हमारा धर्म भ्रष्ट हो गया.......... हम आज भी हिन्दू है और हिन्दू होने पर हमें गर्व है. ...........   हमें अपने उन मुसलमान दोस्तों पर भी फख्र होता है. जो हमें रोज़ा अफ्तारी में बुलाते हैं जबकि हम रोज़ा नहीं रखते.......  पर अजान होने इंतजार तो हम भी करते है..... जब आपकी अजान होती है...... अल्लाह हो अकबर की सदा गूंजती है तो वहा  भी हमें अपने खुदा अपने  भगवान का एहसास होता है........ वह हमें सबका रक्षक  सबका अभिभावक  दिखाई देता है.....  और वह कोई दो नहीं होते वहां एक ही होता है वह खुदा है की भगवान मैं नहीं जानता........... वह मुझे हिन्दू मुसलमान नहीं मेरा अपना दिखता है........ 
अनवर भाई............. जब हमारे यहाँ दशहरा के दिन दुर्गा प्रतिमा विसर्ज़ान का जुलूस निकलता है तो,,,,, जामा मस्जिद  तकिया कल्लन शाह पर पानी पिलाने का काम करते हैं. ...... तब उन्हें कोई मुसलमान नहीं कहता और वे भी हिन्दुओ का जुलुस नहीं कहते............ वे भी उस जुलुस का सम्मान करते है क्योंकि उस पर्व के साथ मां शब्द जुड़ा है. और मां तो सभी की होती है......   भले  ही शब्दों के साथ किन्तु एक रिश्ते का एहसास तो हो रहा  है............ फिर भी उन्हें मुसलमान हो ने पर गर्व है............


भाई रिश्ता हर धर्म पर भारी है...........यदि माने तो इस्लाम धर्म ही नहीं हर धर्म इंसानियत की शिक्षा देता है........ बस हमारे अन्दर बसी रूढ़िवादिता, हमारे अन्दर बसा अहंकार कही न कही हमारे इंसानियत  को बाहर नहीं आने देता और कभी न कभी विवाद को पैदा करता है............ 


जिस तरह आपको मुसलमान होने पर गर्व है उसी तरह हमें अपने हिन्दू होने पर गर्व है................... लेकिन हम सभी के अन्दर एक इंसानियत धर्म भी होना चाहिए,,,,,,, ताकि हमारे अन्दर एक मजबूत रिश्ता  हो  ..........
और मेरा वही रिश्ता लखनऊ ब्लोगर असोसिएसन से है............ यह मेरा परिवार है..... 
अब सभी से.............
उत्तरप्रदेश ब्लोगर असोसिएसन बनाने पर हमें मिथिलेश को विभीसन, जयचंद कहा गया, दो मुह वाला साप कहा गया... तमाम बाते कही गयी........  डॉ. ने एक छंद छोड़ दिया,,,  कोई बता सकता है की.... मैंने LBA के किस नियम को भंग किया है........ बल्कि अपनी जिम्मेदारियों से भागा नहीं.. प्रमुख प्रचारक के पद को बखूबी निभाया....  मेरा कार्य प्रचार करना था.......... मैंने किये.... UPA बनने के बाद कई ब्लोगरो ने हमारा सहयोग करना शुरू किया......... कई ब्लोगों पर LBA और UPA की चर्चा होने लगी...... काफी दिन से सोये पड़े सलीम भाई भी जग गए..................... LBA का रूप रंग भी बदल गया........... जब रनवे पर दौड़ रही  प्लेन उडान भरनी शुरू की तो कई लोग अपने बेल्ट सँभालने लगे.......... LBA को आगे बढ़ना था वह बढ़ गया जो लोग संभल नहीं पाए वे पीछे रह गए...... अब साथ में UPA भी आगे बढ़ने लगा तो मैं क्या करूँ............. अब शो -रूम के आगे पंचर की दुकान भी चल निकली तो मेरे क्या भूल है.............. सलीम भाई द्वारा दिए गए दायित्व को मैंने बखूबी निभाया है...... बिना कोई नियम भंग किये.....................
मुझे लगा की जिस तरह मेरा विरोध हो रहा है......... मिथिलेश का विरोध हो रहा है............ सलीम भाई, अनवर भाई  भले ही मेरे साथ हैं किन्तु भैया बहुमत का जमाना है........ मैं देख रहा हु हम लोगो के खिलाफ खूब वोटिंग हो रही है................ सरकार गिरने { परिवार को भंग} से बचने के लिए सलीम भाई हमें बाहर का राश्ता दिखाने को मजबूर हो जाय..... तो इस लखनऊ के विधान सभा में प्रश्न पूछने का मौका  फिर मिले की नहीं  नहीं  तो बताईये मेरा धर्म {इंसानियत का} कहा बुरा है......... मैंने LBA का कौन सा नियम भंग किया है....... मैंने अपने पद के साथ कौन सी गद्दारी की है........
आप सभी से मैं रिश्ते बना चुका हू........... आप सभी मेरे भाई है............ जो भी आरोप लगाना है खुलकर लगाईये........ मुझे बुरा नहीं लगेगा.......... मैं सभी का जबाब दूंगा............


मेरी वजह से किसी को भी मानसिक दबाव न हो सभी में परिवार वाद बना रहे...... अब देखिये केंद्र व प्रदेश में परिवारवाद  का ही बोलबाला है. लोग समझने लगे है की परिवार  जितना मजबूत   हम उतने ताकतवर......... तो हमारा LBA ताकतवर रहना चाहिए....  अब हम भगोड़े तो हो नहीं सकते हा परिवार एकजुट रहे इसके लिए क़ुरबानी दे सकते है...........

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

कालीन निर्यातको एवं पत्रकारों के बीच मैत्री मैच

   शुक्रवार को कालीन निर्माताओं/निर्यातको एवं पत्रकारों के बीच कैनवास बाल  क्रिकेट प्रतियोगिता मैत्री मैच का आयोजन हुआ, जिसमे पत्रकार एकादश  की टीम एक रन से हार का स्वाद चखा, निर्यातक एकादश  विजयी रही. खैर यह मैत्री  मैच था इसीलिए  सब खुश थे. 

हमने सोचा हार की ख़ुशी आप लोंगो के साथ भी बाँट लूं. सो मैच की कुछ झलकियाँ. आपके साथ भी.
पत्रकार टीम के मैनेजर हरीश सिंह को इस्लामिक साफा बंधकर सम्मानित करते कमेटी के नसीरुद्दीन अंसारी

सम्मानित किये गए अखिल भारतीय कालीन निर्माता संघ के पूर्व अध्यक्ष रवि पटोदिया, निर्यातक हाजी मुजाहिद अंसारी, हरीश सिंह और पत्रकार राधेमोहन श्रीवास्तव [ द पायनियर ]


जीत की ख़ुशी चेहरे पर बिखेरे निर्यातक एकादश की टीम--- निर्यातक सौदागर अली, गुलाम रसूल, हाजी शाहिद हुसैन [ कप्तान] असलम महबूब, हसीब खान आदि.

हारने के बाद भी खुश दिखाई दे रही पत्रकारों की टीम. जिसमे शामिल है. कोच-राधेमोहन श्रीवास्तव{ द-पायनियर}, मैनेजर-हरीश सिंह { संपादक- न्यू कान्तिदूत टाइम्स, जिला अपराध संवाददाता हिंदी दैनिक "आज" }, कप्तान-साजिद अली अंसारी-{अमर उजाला }, उप-कप्तान--संजय श्रीवास्तव { प्रसार भारती}, दिनेश पटेल { ज़ी-न्यूज़}, रोहित गुप्ता { महुआ न्यूज़}, होरीलाल यादव {दैनिक जागरण}, पंकज गुप्ता { जैन टी वी}, कैसर परवेज़ { अमर उजाला }, नैरंग खान [वारिस-ए-अवध}, रेहान हाशमी { आडिशन टाइम्स}, समसुद्दीन मुन्ना { सिटी केबल} और साथ में हैं निर्यातक रवि पटोदिया, हाजी मुजाहिद हुसैन, हसीब खान



पुरस्कार वितरण और उपस्थित लोग

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

काला धन केवल कर चोरी का धन नहीं


 हमारे देश में जितने भी गैरकानूनी काम हैं, उन्हें कानूनी जटिलताएं संरक्षण देने का काम करती हैं। काले धन की वापसी की प्रक्रिया भी केंद्र सरकार के स्तर पर ऐसे ही हश्र का शिकार है। सरकार इस धन को कर चोरी का मामला मानते हुए संधियों की ओट में काले धन को गुप्त बने रहने देना चाहती है, जबकि विदेशी बैंकों में जमा काला धन केवल कर चोरी का धन नहीं है, भ्रष्टाचार से अर्जित काली कमाई भी उसमें शामिल है। जिसमें बड़ा हिस्सा राजनेताओं और नौकरशाहों का है। बोफोर्स दलाली, 2जी स्पेक्ट्रम और राष्ट्रमंडल खेलों के माध्यम से विदेशी बैंकों में जमा हुए काले धन का भला कर चोरी से क्या वास्ता? दरअसल, प्रधानमंत्री और उनके रहनुमा कर चोरी के बहाने कालेधन की वापसी की कोशिशों को इसलिए अंजाम तक नहीं पहंुचा रहे, क्योंकि नकाब हटने पर सबसे ज्यादा फजीहत कांग्रेसी कुनबे और उनके बरदहस्त नौकरशाहों की ही होने वाली है। वरना, स्विट्जरलैंड सरकार तो न केवल सहयोग के लिए तैयार है, अलबत्ता वहां की एक संसदीय समिति ने तो इस मामले में दोनों देशों के बीच हुए समझौते को मंजूरी भी दे दी है। यही नहीं, काला धन जमा करने वाले दक्षिण पूर्व एशिया से लेकर अफ्रीका तक के कई देशों ने भी भारत को सहयोग करने का भरोसा जताया है। हालांकि हाल ही में मजबूरी जताते हुए वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि केंद्र सरकार धन वापसी के लिए जमाखोरों के हित में क्षमादान योजना लागू करने पर भी विचार कर रही है। उन्होंने 500 से 1400 अरब डॉलर धन विदेशों में जमा होने का संकेत दिया, लेकिन मुकदमा चलने पर ही नाम उजागर करने की लाचारगी जताई। पर देर-सबेर विकिलीक्स करीब दो हजार भारतीय खाताधारकों के नामों का खुलासा कर देगी, इसमें कोई संशय नहीं है। पूरी दुनिया में करचोरी और भ्रष्ट आचरण से कमाया धन सुरक्षित रखने की पहली पसंद स्विस बैंक रहे हैं, क्योंकि यहां खाताधारकों के नाम गोपनीय रखने संबंधी कानून का पालन कड़ाई से किया जाता है। नाम की जानकारी बैंक के कुछ आला अधिकारियों को ही रहती है। ऐसे ही स्विस बैंक से सेवानिवृत्त एक अधिकारी रूडोल्फ ऐल्मर ने दो हजार भारतीय खाताधारकों की सूची विकिलीक्स को सौंप दी है। इसी तरह फ्रांस सरकार ने भी हर्व फेल्सियानी से मिली एचएसबीसी बैंक की सीडी ग्लोबल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूट को हासिल कराई है, जिसमें कई भारतीयों के नाम दर्ज हैं। स्विस बैंक एसोसिएशन की तीन साल पहले जारी एक रिपोर्ट के हवाले से स्विस बैंकों में कुल जमा भारतीय धन 66 हजार अरब रुपये है। खाता खोलने के लिए शुरुआती राशि ही 50 हजार करोड़ डॉलर होना जरूरी शर्त है। अन्यथा, खाता नहीं खुलेगा। भारत के बाद काला धन जमा करने वाले देशों में रूस 470, ब्रिटेन 390 और यूके्रन ने भी 390 बिलियन डॉलर जमा करके अपने ही देश की जनता से घात करने वालों की सूची में शामिल हैं। केंद्र सरकार इस मामले को कर चोरी और दोहरे कराधान संधियों का हवाला देकर टालने में लगी है। दरअसल, इस मामले ने तूल पकड़ा तो यूपीए सरकार को वजूद के संकट से गुजरना होगा। इसलिए सरकार बहाना बना रही है कि विभिन्न देशों ने ऐसी जानकारी केवल कर संबंधी कार्यो के निष्पादन के लिए दी है। खाताधारियों के नाम सार्वजनिक करने के लिए चल रहे करारों को बदलना होगा। दोहरे कराधान बचाव संधि में बदलाव के लिए इन देशों के साथ नए करार करने होंगे। भारत सरकार का रुख काले धन की वापसी के लिए साफ नहीं है। यह इस बात से जाहिर होता है कि कुछ समय पहले भारत और स्विट्जरलैंड के बीच दोहरे कराधान संशोधित करने के लिए संशोधित प्रोटोकॉल संपादित हुआ था, लेकिन इस पर दस्तखत करते वक्त भारत सरकार ने कोई ऐसी शर्त पेश नहीं की, जिससे काले धन की वापसी का रास्ता प्रशस्त होता। जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संपन्न होने वाले ऐसे किसी भी दोहरे समझौते में राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होने चाहिए। दुनिया में 77.6 प्रतिशत काली कमाई ट्रांसफर प्राइसिंग (संबद्ध पक्षों के बीच सौदों में मूल्य अंतरण) के जरिए पैदा हो रही है। इसमें एक कंपनी विदेशों में अपनी सहायक कंपनी के साथ सौदों में 100 रुपये की एक वस्तु की कीमत 1000 रुपये या 10 रुपये दिखाकर करों की चोरी और धन की हेराफेरी करती है। भारत में संबद्ध फर्मो के बीच इस तरह के मूल्य अंतरण में हेराफेरी रोकने का प्रयास 2000 के आसपास वजूद में आने लगा था, पर सरकार इसे और कड़ा कर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की सोच रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र ने एक संकल्प पारित किया है, जिसका मकसद है कि गैरकानूनी तरीके से विदेशों में जमा काला धन वापस लाया जा सके। इस संकल्प पर भारत समेत 140 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। यही नहीं, 126 देशों ने तो इसे लागू कर काला धन वसूलना भी शुरू कर दिया है। यह संकल्प 2003 में पारित हुआ था, लेकिन भारत सरकार इसे टालती रही। आखिरकार 2005 में उसे हस्ताक्षर करने पड़े। लेकिन इसके सत्यापन में अभी भी टालमटोल हो रहा है। स्विट्जरलैंड के कानून के अनुसार कोई भी देश संकल्प को सत्यापित किए बिना विदेशों में जमा धन की वापसी की कार्रवाई नहीं कर पाएगा। हालांकि इसके बावजूद स्विट्जरलैंड सरकार की संसदीय समिति ने इस मामले में भारत सरकार के प्रति उदारता बरतते हुए दोनों देशों के बीच हुए समझौते को मंजूरी दे दी है। इससे जाहिर होता है कि स्विट्जरलैंड सरकार भारत का सहयोग करने को तैयार है, लेकिन भारत सरकार ही कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते पीछे हट रही है। हालांकि दुनिया के तमाम देशों ने काले धन की वापसी का सिलसिला शुरू भी कर दिया है। इसकी पृष्ठभूमि में दुनिया में आई वह आर्थिक मंदी थी, जिसने दुनिया की आर्थिक महाशक्ति माने जाने वाले देश अमेरिका की भी चूलें हिलाकर रख दी थीं। मंदी के काले पक्ष में छिपे इस उज्जवल पक्ष ने ही पश्चिमी देशों को समझाइश दी कि काला धन ही उस आधुनिक पूंजीवाद की देन है, जो विश्वव्यापी आर्थिक संकट का कारण बना। 9/11 के आतंकी हमले के बाद अमेरिका की आंखें खुलीं कि दुनिया के नेता, नौकरशाह, कारोबारी और दलालों का गठजोड़ ही नहीं आतंकवाद का पर्याय बना ओसामा बिन लादेन भी अपना धन खातों को गोपनीय रखने वाले बैंकों में जमा कर दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। स्विस बैंकों में गोपनीय तरीके से काला धन जमा करने का सिलसिला पिछली दो सदियों से बरकरार है, लेकिन कभी किसी देश ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई। आर्थिक मंदी का सामना करने पर पश्चिमी देश चैतन्य हुए और कड़ाई से पेश आए। 2008 में जर्मन सरकार ने लिंचेस्टाइन बैंक के उस कर्मचारी हर्व फेल्सियानी को धर दबोचा, जिसके पास कर चोरी करने वालों की लंबी सूची की सीडी थी। इस सीडी में जर्मन के अलावा कई देशों के लोगों के खातों का ब्यौरा भी था। लिहाजा, जर्मनी ने उन सभी देशों को सीडी देने का प्रस्ताव रखा, जिनके नागरिकों के सीडी में नाम थे। अमेरिका, ब्रिटेन और इटली ने तत्परता से सीडी की प्रतिलिपि हासिल की और धन वसूलने की कार्रवाई शुरू कर दी। संयोग से फ्रांस सरकार के हाथ भी एक ऐसी ही सीडी लग गई। फ्रेंच अधिकारियों को यह जानकारी उस समय मिली, जब उन्होंने स्विस सरकार की हिदायत पर हर्व फेल्सियानी के घर छापा मारा। दरअसल, फेल्सियानी एचएसबीसी बैंक का कर्मचारी था और उसने काले धन के खाताधारियों की सीडी बैंक से चुराई थी। फ्रांस ने उदारता बरतते हुए अमेरिका, इंग्लैंड, स्पेन और इटली के साथ खाताधारकों की जानकारी बांटकर सहयोग किया। दूसरी तरफ ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कारपोरेशन एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ने स्विट्जरलैंड समेत उन 40 देशों के बीच कर सूचना आदान-प्रदान संबंधी 500 से अधिक संधियां हुई। शुरुआती दौर में स्विट्जरलैंड और लिंचेस्टाइन जैसे देशों ने आनाकानी की, लेकिन आखिरकार अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे उन्होंने घुटने टेक दिए। अन्य देशों ने भी ऐसी संधियों का अनुसरण किया, लेकिन भारत ने अभी तक एक भी देश से संधि नहीं की है। हालांकि प्रणब मुखर्जी अब संकेत दे रहे हैं कि 65 देशों से सरकार बात करने का मन बना रही है। 
साभार- प्रमोद भार्गव  (वरिष्ठ पत्रकार )

भ्रष्ट सरकार से कैसे करें ईमानदारी की उम्मीद


क्या आप जानते हैं कि स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारत के नेताओं और उद्योगपतियों के कितने रुपये जमा हैं? आपको शायद विश्वास नहीं होगा, क्योंकि यह राशि इतनी बड़ी है कि हम पर जितना विदेशी कर्ज है, उसका हम एक बार नहीं, बल्कि 13 बार भुगतान कर सकते हैं। जी हां, स्विस बैंकों में भारत के कुल एक अरब करोड़ रुपये जमा हैं। इस राशि को यदि भारत के गरीबी रेखा से नीचे जीने वाले 45 करोड़ लोगों में बांट दिया जाए तो हर इंसान लखपति हो जाए। अन्य बैंक जहां जमा राशि पर ब्याज देते हैं, वहीं स्विस बैंक धन को सुरक्षित रखने के लिए जमाकर्ता से धन लेते हैं। आज हमारे पास सूचना का अधिकार है तो क्या हम यह जानने का अधिकार नहीं रखते कि हमारे देश का कितना धन स्विस बैंकों में जमा है? क्या यह धन हमारे देश में वापस नहीं आ सकता? अवश्य आ सकता है। क्योंकि अभी नाइजीरिया यह लड़ाई जीत चुका है। नाइजीरिया के राष्ट्रपति सानी अबाचा ने अपनी प्रजा को लूटकर स्विस बैंक में कुल 33 करोड़ अमेरिकी डॉलर जमा कराए थे। अबाचा को पदभ्रष्ट करके वहां के शासकों ने स्विस बैंकों से राष्ट्र का धन वापस लाने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी। जब नाइजीरिया के शासकों ने ऐसा सोच लिया तो हमारे शासक ऐसा क्यों नहीं सोच सकते? स्विस बैंकों से धन वापस निकालने की तीन शर्ते हैं। पहली, क्या वह धन आतंकी गतिविधियों को चलाने के लिए जमा किया गया है? दूसरी, क्या वह धन मादक द्रव्यों के धंधे से प्राप्त किया गया है और तीसरी, क्या वह धन देश के कानून को भंग करके प्राप्त किया गया है? इसमें से तीसरा कारण है, जिससे हम स्विस बैंकों में जमा भारत का धन वापस ले सकते हैं, क्योंकि हमारे नेताओं ने कानून को भंग करके ही वह धन प्राप्त किया है। हमारे खून-पसीने की कमाई को इन नेताओं ने अपनी बपौती समझकर विदेशी बैंकों में जमा कर रखा है, उसका इस्तेमाल हमारे ही देश की भलाई में होना चाहिए। आज आम आदमी की थाली जो कुल मिलाकर छोटे किसान और खेतिहर मजदूर की भी थाली है, खुद खाने वालों को खा रही है, जबकि सरकार का आकलन है कि लोग न केवल पहले की तुलना में ज्यादा खाने लगे हैं, बल्कि पहले से अच्छा भी खाने लगे हैं। खाने-पीने के सामान की कीमतों में वृद्धि रोकने में एकदम नाकाम सरकार इसी तरह के जख्म पर नमक छिड़कने वाले जवाब देकर अपने हाथ खड़े कर देती है। इसका मतलब यह है कि किसान तो भयावह हालात के बावजूद ज्यादा पैदा करके दिखला रहा है, मगर हाथ पर हाथ धरकर बैठी सरकार न तो यह सुनिश्चित कर पा रही है कि किसान को उसकी मेहनत का पूरा पैसा मिले और न ही यह कि जनता को उचित दर पर खाने-पीने का सामान मिले। इसलिए यह पूछना आवश्यक है कि इस बढ़ी हुई उपज दर के लाभों को बीच में कौन हड़प ले रहा है? सरकार उपदेश देती है कि लोग रोटी के साथ अब दाल और सब्जियां भी खाने लगे हैं और दूध-दही का उपभोग भी ज्यादा करने लगे हैं, इसलिए इन तमाम चीजों का उत्पादन भी बढ़ाया जाना चाहिए, सिर्फ खाद्यान्न का ही नहीं। मगर वह एक बार भी यह यकीन नहीं दिलाती कि पैदावार बढ़ेगी तो कीमतें घटेंगी। पैदावार बढ़ने पर सरकार निर्यात करके पैसा बनाने की सोचती है और फिर कमी होने पर उसी जींस का आयात करने लगती है, जैसा चीनी के मामले में हुआ। बहरहाल, आज नेताओं में धन को विदेशी बैंकों में जमा करने की जो प्रवृत्ति बढ़ रही है, उसके पीछे हमारे देश का कमजोर आयकर कानून है। इसी आयकर से बचने के लिए ही तो ये नेता, अधिकारी और भ्रष्ट लोग अपने धन को काले धन के रूप में रखते हैं। यदि आयकर कानून को लचीला बना दिया जाए तो इस पर अंकुश लगाया जा सकता है। अभी हमारे देश में 10 लाख करोड़ रुपये काले धन के रूप में प्रचलित है। इस दिशा में कोई भी पार्टी कानून बनाने की जहमत नहीं उठाएगी, क्योंकि यदि किसी पार्टी ने इस दिशा में जरा भी हरकत की तो विदेशी कंपनियां उसे सत्ताच्युत कर देंगी। ये कंपनियां हमारे नेताओं को अपनी उंगलियों पर नचा रही हैं। यदि प्रजा जागरूक हो जाती है और नेताओं को इस बात के लिए विवश कर सकती है कि वह स्विस बैंकों में जमा भारतीय धन को वापस ले आएं तो ही हम सब सही अर्थो में आजाद देश के नागरिक माने जाएंगे। इस धन के देश में आ जाने से न तो हमें किसी से भीख मांगने की आवश्यकता होगी और न ही हमारा देश पिछड़ा होगा। इस धन की बदौलत भारत का नाम पूरे विश्व में एक विकसित देश के रूप में गूंजेगा। आज इस देश को शक्तिशाली और ईमानदारी नेतृत्व की आवश्यकता है।

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

रहिमन धागा प्रेम का....

सच्चे प्यार की अनोखी दास्ताँ  
प्यार ईश्वर का दूसरा रूप है। यदि यह सच्चा हो तो इसकी राह में आने वाले कांटे भी फूल बनकर जीवन की बगिया को गमकाने लगते हैं। यही मानना है युगल जोड़ी केके यादव व संगीता यादव का। 19 साल पहले मुम्बई में संगीता राणे व केके यादव के रूप में मिले ये दो दिल आज यादव दम्पती के रूप में एक दूसरे के प्रति श्रद्धा, विश्वास व सहयोग के साथ जीवन की नैया पार कर रहे हैं। शादी के 18 बसंत पूरी कर चुकी यह जोड़ी आज के प्रेमी युगल के लिए एक मिशाल है।
बात 1992 की है। मुम्बई के राणे परिवार में जन्मी संगीता की पहली मुलाकात मुंबई के एक कंपनी में नौकरी के दौरान केके यादव से हुई थी। जहां केके बिहार के मुंगेर से रोजी-रोटी की तलाश में पहुंचकर नौकरी कर रहा था। इस दौरान दोनों को एक दूसरे की सादगी बेहद पसंद आयी। इस दौरान बात दिन-प्रतिदिन बढ़ती गयी और फिर वे कब एक दूसरे के हो गये पता ही नहीं चला। दोनों एक दूसरे की नजरों के इशारों को पढ़ने में कम नहीं थे। न मिलने पर घबराहट और मिलने पर आंख चुराना इस बात का तस्दीक कर चुका था कि बात आगे बढ़ चुकी है। अतीत की सुनहरी यादों में खोती हुई संगीता ने बताया कि मिलने की बेताबी, तड़प और बेकरारी बढ़ती गयी तो एक दिन प्यार का इजहार करना ही पड़ा। माध्यम बना प्रेम पत्र। उसके बाद दिल के धड़कन की हाल न पूछिये। फिर क्या था केके की मानों मन मांगी मुराद पूरी हो गयी। रातों की नींद और दिन का चैन गायब हो गया। बात बढ़ी तो दूर तक जाना लाजिमी था सो हुआ भी। फिर परिजनों की बंदिश पर संगीता राणे का इजहारे मोहब्बत भारी पड़ा और जनवरी 1993 में दोनों मंदिर में सात फेरे लेकर यादव दम्पति के रूप में एक दूजे के हो गये। इस दौरान दोनों नौकरी करते हुए परिवार से अलग होकर रहने लगे। धीरे-धीरे समय बीता और दोनों नौकरी छोड़कर व्यापार करने लगे। अब ये दम्पति गोपीगंज के शुक्ला बिल्डिंग में रहकर व्यापार कर रहे हैं। उन्हे इस बात का बेहद फक्र है कि आज उनके प्यार की मुम्बई में मिशाल दी जाती है। उनके प्यार की ताकत का ही असर है कि शून्य से जीवन शुरू कर आज वे एक मुकाम को हासिल कर चुके है। हालांकि इस दौरान तमाम संघर्षो और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। एक दूसरे के प्रति विश्वास रूपी ठोस नींव पर प्यार की बुलंद इमारत तैयार हुई। उनके दो बेटे हुए। जो मुंबई में ही शिक्षा ग्रहण कर रहे है। आज वे सामाजिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे है। नये युगल को संदेश देते हुए केके यादव ने कहा कि एक दूसरे के प्रति वफादारी प्रेम रूपी पौधे को हमेशा हरा-भरा रख सकता है। ये दम्पति इस बात से आहत हैं कि आज के दौर में प्यार के परिभाषा की गलत तरीके से व्याख्या हो रही है।

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

वेलेंटाइन-डे: प्यार भरे दिन का प्यारा सा इतिहास-- हरीश सिंह

वेलेंटाइन-डे, यानि प्रेम के प्रतीक का एक प्यारा सा त्यौहार, प्रेम के कई रूप होते है. किन्तु इस दिन को लोग सिर्फ एक ही रूप में देखते है. भगवा कंपनी ने तो इस त्यौहार को बदनाम कर दिया है. साल भर चुप रहने वाले यह लोग मात्र इसी दिन समाज सुधार का बीड़ा उठाने चल देते है. आइये देखते है इसका इतिहास........
 

प्यार का दिन, प्यार के इजहार का दिन। अपने जज्बातों को शब्दों में बयाँ करने के लिए शायद इस दिन का हर धड़कते हुए दिल को बेसब्री से इंतजार होता है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं, प्यार के परवानों के दिन की, वेलेंटाइन-डे की...। प्यार भरा यह दिन खुशियों का प्रतीक माना जाता है और हर प्यार करने वाले शख्स के लिए अलग ही अहमियत रखता है।

14 फरवरी को मनाया जाने वाला यह दिन विभिन्न देशों में अलग-अलग तरह से और अलग-अलग विश्वास के साथ मनाया जाता है। पश्चिमी देशों में तो इस दिन की रौनक अपने शबाब पर ही होती है, मगर पूर्वी देशों में भी इस दिन को मनाने का अपना-अपना अंदाज होता है।

जहाँ चीन में यह दिन 'नाइट्स ऑफ सेवेन्स' प्यार में डूबे दिलों के लिए खास होता है, वहीं जापान व कोरिया में इस पर्व को 'वाइट डे' का नाम से जाना जाता है। इतना ही नहीं, इन देशों में इस दिन से लगाए पूरे एक महीने तक यहाँ पर लोग अपने प्यार का इजहार करते हैं और एक-दूसरे को तोहफे व फूल देकर अपनी भावनाओं का इजहार करते हैं।
  प्यार का दिन, प्यार के इजहार का दिन। अपने जज्बातों को शब्दों में बयाँ करने के लिए शायद इस दिन का हर धड़कते हुए दिल को बेसब्री से इंतजार होता है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं, प्यार के परवानों के दिन की, वेलेंटाइन-डे की...।     


इस पर्व पर पश्चिमी देशों में पारंपरिक रूप से इस पर्व को मनाने के लिए 'वेलेंटाइन-डे' नाम से प्रेम-पत्रों का आदान प्रदान तो किया जाता है ही, साथ में दिल, क्यूपिड, फूलों आदि प्रेम के चिन्हों को उपहार स्वरूप देकर अपनी भावनाओं को भी इजहार किया जाता है। 19वीं सदीं में अमेरिका ने इस दिन पर अधिकारिक तौर पर अवकाश घोषित कर दिया था।

यू.एस ग्रीटिंग कार्ड के अनुमान के अनुसार पूरे विश्व में प्रति वर्ष करीब एक बिलियन वेलेंटाइन्स एक-दूसरे को कार्ड भेजते हैं, जो क्रिसमस के बाद दूसरे स्थान सबसे अधिक कार्ड के विक्रय वाला पर्व माना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि वेलेंटाइन-डे मूल रूप से संत वेलेंटाइन के नाम पर रखा गया है। परंतु सैंट वेलेंटाइन के विषय में ऐतिहासिक तौर पर विभिन्न मत हैं और कुछ भी सटीक जानकारी नहीं है। 1969 में कैथोलिक चर्च ने कुल ग्यारह सेंट वेलेंटाइन के होने की पुष्टि की और 14 फरवरी को उनके सम्मान में पर्व मनाने की घोषणा की। इनमें सबसे महत्वपूर्ण वेलेंटाइन रोम के सेंट वेलेंटाइन माने जाते हैं।

1260 में संकलित कि गई 'ऑरिया ऑफ जैकोबस डी वॉराजिन' नामक पुस्तक में सेंट वेलेंटाइन का वर्णन मिलता है। इसके अनुसार शहंशाह क्लॉडियस के शासन में सेंट वेलेंटाइन ने जब ईसाई धर्म को अपनाने से इंकार कर दिया था, तो क्लॉडियस ने उनका सिर कलम करने के आदेश दिए।

कहा जाता है कि सेंट वेलेंटाइन ने अपनी मृत्यु के समय जेलर की नेत्रहीन बेटी जैकोबस को नेत्रदान किया व जेकोबस को एक पत्र लिखा, जिसमें अंत में उन्होंने लिखा था 'तुम्हारा वेलेंटाइन'। यह दिन था 14 फरवरी, जिसे बाद में इस संत के नाम से मनाया जाने लगा और वेलेंटाइन-डे के बहाने पूरे विश्व में निःस्वार्थ प्रेम का संदेश फैलाया जाता है।

आइये हम सब मिलकर इस निःस्वार्थ प्रेम  को सारे जहा में फैलाएं ताकि द्वेष, इर्ष्या,कटुता हमारे  समाज से मिट जाय और एक सुखद वातावरण पैदा हो. 
आप सभी को वेलेंटाइन-डे पर हार्दिक शुभकामनायें.