सोमवार, 10 जनवरी 2011

बाल मजदूरी का दंश

अगर बच्चे किसी भी देश का मुस्त्क्विल है तो हमारे आने वाले कल की तस्वीर कितनी भयानक होगी इसका अंदाज़ा सडको पर भीख मांगते, कूड़ा बीनते , होटलों पर काम करते कम उम्र के बच्चो को देख कर लगाया जा सकता है. जी हां सच यही है की हमारे देश का भविष्य अंधकार की ओर जा रहा है. सरकार बच्चो की तालीम और उनके भविष्य को सभारने के चाहे कितने भी दावे करे लकिन हकीकत यही है की आज भी लाखो , करोडो की तादाद में बचपन सडको पर भीख मांग रहा है . बस्ता थामने की उम्र में मासूम बच्चे होटलों और ढाबो में बर्तन धो रहे है, गालियाँ ख़ा रहे है. इतना ही नहीं है जिस उम्र में बच्चो के हाथ में खिलोने होते है उस उम्र में बच्चे कूड़ा बीनाने को मजबूर है. रोडवेज बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सब्जी मंडी, सिनेमा हाल समेत दुसरे पब्लिक प्लेस भीख मंगाते, कचरे का ढेर में से प्लास्टिक , कूड़ा, लोहा समेत दूसरी चीजों को बीनते बच्चो के झुण्ड आपको हर महानगर में मिल जायेंगे. देश में तकरीबन ५ करोड़ बच्चे बाल मजदूरी से जूझ रहे है और उनके कोइ सुध लेने वाला नहीं है. बाल मजदूरी का दंश झेल इन बच्चो में से कई को यह भी नहीं मालूम की स्कूल नाम की भी कोइ चिड़िया होती है और कई ऐसे होते है की वोह स्कूल जाना चाहते है. जब वोह साफ़ सुथरी डरेश में स्कूल जाते बच्चो को देखते है तो उनका भी मन मचलता है की काश वोह भी स्कूल जा पाते लकिन घरेलू हालातो के चलते वोह तालीम की रोशनी से महरूम रह जाते है. देश को आज़ाद हुए ६ दशक गुजर गए लकिन आज तक बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिये कोई ठोश कदम नहीं उठाया जा सका. हालाकी बाल मजदूरी को रूकने के लिये कई तरह के कानून बनाये गए लकिन सरकारी अफसरों के गैर जिमादाराना रवैये और ओछी राजनीत के चलते कोई भी कारगर नहीं हो पाया . सरकार की ओर से प्रेइमरी शिक्षा जरुरी और फ्री है ताकी बच्चे तालीम की रोशनी से रोशन हो सके, लकिन अफ़सोस हमारी सरकार यहाँ भी फेल हो गयी और आज तक ऐसी जमीन नहीं बना पायी जिसके चलती स्कूल जाने की उम्र में हर बच्चा स्कूल जाता दीखाई दे , न की होटलों, चाय की दुकानों, पर काम करता. डेल्ही, मुंबई , कोलकाता, बल्ग्लोर , अहमदाबाद , लखनऊ ,देहरादून समेत देश के कई शहरो में भीख मंगाते, कूड़ा बीनते बच्चे मिल जायेंगे. ऐसा नहीं की सरकार बडती बाल मजदूरी से अनजान हो लकिन उसके बाद भी सरकार कोई सखत कदम उठाना नहीं चाहती. सरकार के मुताबिक बाल मजदूरी एक सामाजिक बुराई है और इसके खात्मे के लिए समाज को सहयोग करना होगा. बाल मजदूरी कराने वालो में भी सरकार और कानून का कोई डर नहीं रहा है, वोह धडल्ले से बंधक बना, अगवा कर मजदूरी करवा रहे है. देश तरक्की का राग अलाप रहा है, जिस देश में लाखो करोडो बच्चे भीख मांग रहे हो उसकी तरक्की की तस्वीर क्या होगी अंदाज़ा लाया जा सकता है. आज भी बाल दिवस समेत कई त्यौहार बच्चो के नाम पर मनाये जाते है लकिन आज वोह भी कॉन्वेंट स्कूल तक ही रह गए है . खेलने कूदने की उम्र में अगर कोई बच्चा मजदूरी करने को मजबूर हो जाये तो उससे बड़ी भेदाम्ब्ना और क्या होगी. बाल श्रम आज वोह सामाजिक अभिशाप बन गया है जो मकडजाल की तरह शहरो के साथ साथ गावो तक में फ़ैल रहा है. समाज के लिया कलंक बन चुकी बाल मजदूरी के लिया लोग सरकार को ही जिम्मदार बता रही है. लोगो की माने तो हामारी सरकार बच्चो को लेकर लापरवाह है और यही वजह है की आज तक बाल मजदूरी पर लगाम नहीं लग सकी है. भारत आज खुद की तुलना आर्थिक रूप से संपन देशो से कर रहा है. लकिन शर्म की बात यह है की उसी भारत के बच्चो की विदेशो में भेड़ – बकरियों के भाव खरीद फरोख्त होती है. खाड़ी और अमीर देशो के लिये सेक्स और अंग प्रत्यर्पण के लिये बच्चो की तस्करी की जाती है. हर साल लाखो लड़के लडकियों को जिस्मफरोशी के धंदे में धकेल दिया जाता है. सरकार की अनदेखी और कुछ सफेदपोश लोगो की मिलीभगत की चलते ही बाल मजदूरी — बाल तस्करी का धंधा फल फुल रहा है और बच्चो को भिक्षा व्रती में धकेला जा रहा है. जब तक कानून का कडाई से पालन नहीं होगा और समाज का हर तबका जागरूक होकर अपनी जिम्मदारी को नहीं समझेगा तब तक इन मासूमो के बचपन को बचा पाना बेहद मुश्किल है.
यह लेख हमने पत्रकार कपिल कुमार सक्सेना के ब्लॉग मेरी कलम से… से लिया है

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