मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

सर्वशिक्षा अभियान: कितना और कहां तक पूरा


दिसम्बर 2010 तक सर्वशिक्षा अभियान द्वारा सभी बच्चों को साक्षर बनाना केंद्र सरकार का सपना था। कहना गलत न होगा कि सरकार का सपना चकनाचूर होता नजर आ रहा है।
सर्वशिक्षा अभियान: कितना और कहां तक पूराआखिर क्या वजह है कि साक्षरता का प्रतिशत आज भी 50 से 55 फीसदी से ज्यादा नहीं है। उतनी ही आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की भी है, यानी साक्षरता का सीधा संबंध आय के साथ है। यदि साक्षरता दर में सुधार लाना है तो आमदनी को बढ़ाना ही होगा।
विडंबना यह है कि सरकार ने एक ओर साक्षरता अभियान शुरू किया और दूसरी ओर शिक्षा का निजीकरण। शिक्षा के बाजारीकरण के दौर में यह परिकल्पना ही गलत है कि सभी को शिक्षा दिलाने वाला सरकारी अभियान सफलता प्राप्त करेगा।
सर्वशिक्षा की गारंटी तो तब संभव थी जब आबादी के अनुरूप शासकीय स्कूलों की संख्या होती। सरकारी स्कूलों की संख्या में बढ़ोत्तरी भले नहीं हो पायी किन्तु कई चलते हुए स्कूल जरूर बंद कर दिए गयें। इस विरोधाभास पर ईमानदारी से चिंतन-मनन होना चाहिए था। सरकार ने प्रायमरी कक्षाओं की मुफ्त शिक्षा को प्रचारित खूब किया किन्तु अमलीकरण में ईमानदारी नहीं दिखाई।
गरीब एवं पिछड़े तबके के लोगों से सरकार ने लगातार अपीलें की किंतु लोगों ने वह प्रतिसाद नहीं दिया जिसकी अपेक्षा थी। मुफ्त शिक्षा, मुफ्त किताब-कापियों का प्रलोभन भी कारगर सिद्ध नहीं हो पाया। स्कूलों द्वारा मुफ्त अनाज भी बांटा जा रहा है। बावजूद इन सबके 30 प्रतिशत मां-बाप हैं जो बच्चों की शिक्षा को जरूरी नहीं मानते। उनकी नजर में शिक्षा कोई मायने नहीं रखती।

 

"मुफ्त शिक्षा, मुफ्त किताब-कापियों का प्रलोभन भी कारगर सिद्ध नहीं हो पाया। स्कूलों द्वारा मुफ्त अनाज भी बांटा जा रहा है। बावजूद इन सबके 30 प्रतिशत मां-बाप हैं जो बच्चों की शिक्षा को जरूरी नहीं मानते। उनकी नजर में शिक्षा कोई मायने नहीं रखती।"
हमारे देश में ऐसे भी गरीब लोग हैं जिन्होंने अपनी गरीबी को बच्चों के उज्जवल भविष्य के मार्ग में अवरोधक नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी बदनसीबी को बच्चों की बदनसीबी नहीं बनने दी उनके बच्चों ने अवसरों का भरपूर लाभ उठाया और मां-बाप के सपनों को साकार करते हुए उन भ्रांतियों को झूठा साबित कर दिखाया कि आगे बढ़ने के लिए धन ही सबसे जरूरी है। दरअसल उन्होंने जहां चाह वहां राह कहावत को चरितार्थ कर दिखाया।
अतः जरूरी है सामूहिक प्रयासों की, ऐसे प्रयासों की जिनसे मजबूरियों को कहर ढाने का अवसर ही न प्रदान हो। काश! गरीबी से जूझते लोग बच्चों के भविष्य को महत्त्व प्रदान करते तो आज स्थिति इतनी भयावह कदापि नजर नहीं आती। सर्वशिक्षा अभियान का पूर्वतया सफल न हो पाने की एक वजह भ्रष्टाचारी राजनेता एवं नौकरशाहों का अड़ियल रवैय्या भी रहा।
शिक्षा हमारा अधिकार हैं। हमें शिक्षित होना ही चाहिए, यह जिद्द पैदा न हो सकी। कुछ मुठ्ठीभर लोग जरूर प्रयास करते रहे। सभी ने यदि एक जैसा सोचा होता या सरीखा प्रयास किया होता तो निश्चित तौर पर कहानी कुछ और ही होती।
प्रायमरी स्कूलों के सभी शिक्षकों को एक मिशन जरूर दिया गया था किन्तु सरकार ने उन्हें पढ़ाने का समय कम और अन्य कामों के लिए अधिक समय दिया। जनगणना से लेकर चुनाव प्रक्रिया तक, खिचड़ी बनाने से खिलाने तक का कार्य प्रायमरी शिक्षकों को सौंप कर सरकार ने स्थिति स्पष्ट कर दी कि हम सदैव अड़ियल थे और रहेंगे।

                                                                                                                                                                                                  साभार:राजेन्द्र मिश्र

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