सोमवार, 20 दिसंबर 2010

गरीबी का मनोविज्ञान: आंकड़ों में उलझी हुई गरीबी

सरकार निरन्‍तर गरीबी उन्‍मूलन के कार्यक्रम चला रही है ले‍किन गरीबों की संख्‍या मे कमी आने के बजाय उसमे बृद्धि होती जा रही है। आज के तीस साल पहले जो गरीब थे आज भी गरीब है उनकी आर्थिक स्थिति मे काई परिवर्तन नजर नही आ रहा है। आज के तीस साल पहले जिनके पास फटी लुंगी थी आज भी उनके पास फटी लुंगी ही है। प्रश्‍न उठता है ऐसा क्‍यों है ? इस प्रश्‍न का जबाब पाने के लिये हमे  गरीबी के मनोविज्ञान का अध्‍ययन करना होगा।
प्रश्‍न उठता है गरीबी क्‍या है? सरकारी परिभाषा के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों मे वे लोग जिनकी वार्षिक आय 19840/रू से कम है तथा शहरी क्षेत्र मे 25550/रू से कम है वे लोग गरीबी की रेखा के नीचे है। मतलब गरीब वे है जिनकी वार्षिक आमदनी एक निश्चित सीमा से कम है। गरीब को अमीर की श्रेणी मे लाने के लिये आवश्‍यक है कि उसकी वार्षिक आमदनी उस सीमा के उपर लायी जाय। प्रश्‍न उठता है इस काम को कौन करेगा? सरकार समाज या वह व्‍यक्ति स्‍वयं ? प्राय: सरकार यह दावा करती रहती है कि उसकी आर्थिक नीतियों के परिणाम स्‍वरूप इतने लोग गरीबी की रेखा से उपर हुए। कई स्‍वयं सेवी संगठन भी गरीबी उन्‍मूलन के कार्यक्रम मे लगे हुये है वे भी समय समय पर दावा करते है कि उनके प्रयासों से अमुक संख्‍या मे लोग गरीबी की रेखा के उपर हुए आदि आदि। लेकिन सरकारों और लोगों के वार वार दावों के वावजूद गरीबी और गरीबों की संख्‍या मे कोई उल्‍लेखनीय कमी नही आ रही है। इसका कारण जानने के लिये इसके मनोविज्ञान का अध्‍ययन करना होगा।
इस समबन्‍ध मे मै एक कहानी सुनाना चाहता हू। मानलीजिये सडक पर एक बूढे व्‍यक्ति पैदल पैदल चले जा रहे हैं अचानक उसके पास से एक स्‍कार्पियो गुजरती है स्‍कार्पियों मे बैठा व्‍यक्ति तीन प्रकार का व्‍यवहार कर सकता है पहला कि वह गाडी से उतरेगा और सडक से पैदल पैदल गुजर रहे वयक्ति से पास आकर हाथ जोडकर कहेगा कि वह बहुत परेशान है इसलिये वह उसकी गाडी लेकर जायं और वह पैदल पैदल आ जायेगें। दूसरी स्थिति हो सकती है कि वह सडक से गुजर रहे व्‍यक्ति को अपनी गाडी मे बैठा ले और अपने साथ उनके गंतब्‍य तक छोड दें और तीसरी स्थिति हो सकती है कि वह गाडी को बगल से तेजी से निकाले और इस वात पर गौर ही न करे कि सडक पर कौन गुजर रहा है। यह भी सम्‍भव है कि गाडी चालक सडक किनारे पडे कीचड को उछालता हुआ चला जाय।



उक्‍त परिस्थितयों का आकलन करने पर आप पायेगे कि करोडों मे शायद कोई एक व्‍यक्ति होगा जो पहला दृष्टिकोण अपनाए लाखों मे एक होगा जो दूसरा दृष्किोण अपनाए और सौ मे निन्‍यानवे दशमलव निन्‍यानवे प्रतशित व्‍यक्ति ऐसे होगे जो बगल से गाडी निकालेगे और अगर बगल मे कीचड है तो कीचड उछालते हुए चले जायेंगें आप उस गाडी वाले को गाली देगें। गाडी वाला तो निकल गया। आपके गाली देने से उस गाडी वाले के सेहत पर कोई फर्क नही पडेगा। वह तो गया। इसी प्रकार की स्थिति आपकी है जो लोग विकास कर रहे है वे विकास करते चले जा रहे है। चाहे वे सरकारी मुलाजिम हो या समाज सेवी उन्‍हे आपकी चिन्‍ता नही है। वास्‍तव मे यदि कोई आपकी चिन्‍ता करता दिखाई देता है तो वह वास्‍तव मे चिन्‍ता करने का दिखावा कर रहा है। वास्‍तव मे आपको अपनी प्रगति स्‍वय करनी है। आपकी कोई सहायता नही करने वाला।
 


वर्तमान परिस्‍थितयों का आकलन करने पर आप पायेगे कि वास्‍तविक परिस्थितियां इसके ठीक विपरीत है;गरीब वर्ग अपने उत्‍थान के लिये हमेशा दूसरों का मुह ताकता है। जब आप गांव मे जायेगे तो पायेगे कि लोग सरकार की शिकायत करते मिलगें उन्‍हे शिकायत होगी कि सरकार ने उसके लिये यह नही किया सरकार ने वह नही किया लेकिन उनके द्वारा स्‍वयं अपने विकास के लिये जब आप उनसे पूछेगे कि उनके द्वारा स्‍वयं अपने विकास के लिये क्‍या किया जा रहा है तो शायद इसका उनके पास कोई जबाब नही होगा।
गरीबी के कारणों मे जनसंख्‍या बृद्धि एक महत्‍वपूर्ण कारण है।  जब देश स्‍वतंत्र हुआ था उस समय भारत की जनसंख्‍या लगभग 33 करोड थी आज भारत का मध्‍यम वर्ग 33 करोड से ज्‍यादा है। भारत की 84 करोड जनसंख्‍या का प्रतिदिन आय मात्र 20 रू0 है। एक मध्‍यम वर्गीय व्‍यक्ति जो दो से अधिक बच्‍चों की परवरिस कर सकता है एक या दो बच्‍चे पैदा करता है और वह व्‍यक्ति जो एक बच्‍चे की भी परवरिस नही कर सकता है एक दर्जन बच्‍चे पैदा करता है कहता है बच्‍चे भगवान की देन है जितने बच्‍चे होगें उतनी कमाई होगी। उन्‍हे न बच्‍चों के पढाई की चिन्‍ता न कपडे की फिक्र। दो कमाने वसले हाथ पैदा किये या नही खाने वाला पेट जरूर पैदा कर दिया । यदि आप उनसे इस विषय पर बात करे तो कहते हैं बच्‍चे वे पैदा कर रहे है इससे हमे क्‍या समस्‍या है। दूसरी समस्‍या यह है कि एक बार घर मे खाने के लिये कुछ हो जाय फिर जब तक वह खत्‍म नही हो जायेगा काम पर नही जायेगे। समाज के जितने दुर्व्‍यसन है इनके पास है। शराब पीने से लेकर घर मे महिलाओं पर अत्‍याचार बेकार के प्रदर्शनों पर अपव्‍यय शिक्षा के प्रति जागरूकता का अभाव आदि ऐसे कारक है जो इनकी गरीबी के लिये जिम्‍म्‍ेदार है। आमदनी का सीधा सिद्धान्‍त है जो व्‍यक्ति जितना अधिक शारिरिक श्रम करता है आमदनी उसी अनुपात मे कम होती है जैसे जैसे हम शारीरिक श्रम कम और मांनसिक श्रम बढाते जाते है आय बढती जाती है। इसलिये यदि हम चाहते है कि गरीबी वास्‍तव मे घटे तो हमे निम्‍न प्रयास करने होगे। पहली बात यह कि हमे इस बात का ज्ञान हो कि हमे अपना विकास स्‍वयं करना है हमारा विकास करने कोई दूसरा नही आयेगा;दूसरा हमे दूसरों की सेवा के लिये मजबूर मजदूर पैदा नही करना है इसलिये जनसंख्‍या घटानी होगी;तीसरा हमे शारीरिक श्रम घटाकर मांसिक श्रम बढाना होगा जिसके लिये हमे अपने कौशल मे बृद्धि करनी होगी;चौथा केवल उपभोग के लिये पैसे नही कमाने होगें हमे पूजी सृजन के लिये छोटी छोटी बचते करनी होगी; बेकार के दिखावे पर होने वाले खर्चों को कम करना होगा; और सबसे महत्‍वपूर्ण बात हमे जिन्‍दा रहने के लिये काम नही करना होगा बल्कि आगे बढने के लिये काम करना है। अगर हम इन आधारभूत बातों का ध्‍यान रखकर प्रयास करेगे तो गरीबी दूर करना कठिन नही है आवश्‍यकता है दृढसंकल्‍प की।
साभार: आर.एस. सिंह पटेल

कोई टिप्पणी नहीं: