रविवार, 19 दिसंबर 2010

सेक्स बिकता है

अभी कुछ दिनों से टीवी पर ऎसे विज्ञापनो की संख्या बढ़ गयी है जिसे आप अपने पूरे परिवार के बीच नहीं देख सकते…या देखकर शर्म महसूस कर सकते हैं… पहले ऎसे विज्ञापन केवल कॉंडोम या अन्य गर्भनिरोधकों के ही होते थे. मुझे याद है ..बचपन में जब केवल दूरदर्शन ही एकमात्र चैनल हुआ करता था तब रात के हिन्दी समाचारों के बाद गर्भनिरोधकों जैसे “निरोध” या “माला-डी” का विज्ञापन आता था और जब भी हिन्दी समाचार समाप्त होने को होते और मुख्य समाचारों की बारी आती तो हमारे घर में टी वी की आवाज कम कर दी जाती. हाँलाकि उस समय इन विज्ञापनों में अश्लील कुछ भी नहीं होता था फिर भी इन्हें परिवार के बीच देखना गवारा नहीं समझा जाता था. और आजकल तो विज्ञापन ही ऎसे आ गये हैं जो द्र्श्य और श्रव्य दोनों ही रूपों में अश्लीलता की श्रेणी में आते हैं… और ये विज्ञापन खुले आम हमारे घरों में प्रवेश भी कर गये हैं… यौन कुंठा इशारा आजकल बन रही फिल्मों के बारे में था.. फिल्म देखने के लिये तो तब भी आपके पास एक विकल्प (ऑप्सन )होता है कि आप फिल्म देखें या नहीं लेकिन विज्ञापन तो कोई विकल्प भी नहीं देते… ये तो बस आपके टी.वी. पर आ जाते हैं जब तक आप इसकी शीलता या अश्लीलता समझे तब तक ये समाप्त हो चुके होते हैं और आप सोफे में बैठ नजरें कहीं और ग़ड़ाये चुप रहते हैं ये साबित करने के लिये कि आपका ध्यान तो कहीं और था.
अब “अमूल माचो” नामक अंडरवियर के विज्ञापन को ही लें.. ये किस तरह की फंतासी का निर्माण आपके अन्दर करता है .. जब नयी नवेली दुल्हन तालाब के किनारे अपनी पति के अंतर्वस्त्र को धो रही होती है तब वो और वहां पर जलती भुनती अन्य औरतें क्या सोच रही होती हैं… और वो नयी नवेली दुलहन सारी लोकलाज त्याग कर घुटनों तक अपनी साड़ी उठा कर, अजीब अजीब से मुँह बनाकर अंतर्वस्त्र धोने लगती है .. आप भी देखना चाहते हैं तो देखिये क्या है यह ?.. एक फंतासी के जरिये उत्पाद बेचने की कोशिश .. और ये ही बिक भी रहा है.. समाचारों के मुताबिक इस ब्रांड की बिक्री में इस विज्ञापन के बाद 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.. अंडरवियर के ऎसे बहुत से विज्ञापन आजकल दिखाये जा रहें हैं.. कुछ लोगों के मुताबिक ये सृजनात्मकता (क्रियेटिविटी) है .. लेकिन यदि क्रियेटिविटी क्या केवल अश्लील ही होती है…
इसी तरह के एक अन्य विज्ञापन में एक अर्धनग्न बाला बड़े ही सिड्यूसिंग तरीके से कहती है … “निकालिये ना ……. कपड़े “. ये क्यों?? इस तरह द्विअर्थी वाक्य तो पहले दादा कोंडके की फिल्मों में होते थे .. आपको “ अन्धेरी रात में दिया तेरे हाथ में” या “खोल दे मेरी…… जबान “ तो याद ही होंगे ना..तब लोग इन फिल्मों को कोसते थे और ये फिल्में “ए” सार्टिफिकेट के साथ हॉल में आती थीं .. लेकिन आजकल के विज्ञापन बिना किसी सेंसर के हमारे ड्राइंग रूम में आ रहे हैं… इसी तरह का एक द्विअर्थी विज्ञापन था रीडिफमेल का ..जिसमें लड़कियां एक छोटे राजू के बड़े साइज के बारे में बात कर रही होती हैं.. यहाँ तक की राजू का बॉस भी शौचालय में अपनी दृष्टि राजू के शरीर पर ही गड़ाये रखता है … और अंत में एक बेशरम मित्र पूछ ही लेता है क्या ये सचमुच बहुत बड़ा है .. तो राजू कहता है कि ये बड़ा ही नहीं वरन अनलिमिटेड है .. तब पता चलता है कि वो लोग राजू के मेल बॉक्स के साईज के बारे में बात कर रहे होते हैं…
अब कॉडोम के “बिन्दास बोल” या फिर दिल्ली सरकार के “कॉडोम हमेशा साथ रखिये” से तो बच्चे बहुत कुछ सीख ही रहे थे… अब आने वाले समय में और भी ना जाने क्या क्या सीखेंगे …
हर वस्तु का वैश्वीकरण हो रहा है….जब कोई आंधी चलती है तो सब कुछ प्रभावित होता है फर्क सिर्फ इतना होता है कि कोई कम प्रभावित होता है कोई ज्यादा…अब आप ही की बात लीजिये आप नाटक कर रहे थे कि आप नहीं देख रहे लेकिन आप देख रहे थे….तो यही होता है….कोईघर पर देखता है और अगर नहीं देख सका तो कहीं बाहर जाकर देखता है….आप यह न समझे कि मैं इसकी पक्षधर हूं मैं सिर्फ सच्चाई बता रही हूं….कि चाहे खुलकर देखें य चुपके से बात तो वही है…..स्त्री के इश्तहार के बिना तो कुछ भी नहीं ब
नग्न तन से यहां नाचती हैं जो तारिकाएं,
स्त्री की अस्मिता पर इक बड़ा सवाल कर दिया है।
अब बस यही हमारी संस्कृति का पतन का दौर चल रहा है….और हम विवश होकर देख ही सकते हैं….मूल्यहीनता की आंधी को रोक नहीं सकते…
''कहते है की कला चाहे जो भी हो इन्सान को
विरासत मे मिलती है अगर ये तनिक भी सत्य है तो
कब मुकम्मल हुई है जिन्दगी बगैर इश्क के ,
वो और बात है की हदे आशिकी- तोड़-शख्स (लोग )
दफ़न हुए हैं इश्क मे ।
है बहुत और बस इज़ाज़त आपका चाहिए गर पसंद हो तो , नापसंद हो तो यहीं पे रोक डालिए.........
भारत में ह्यूमन ट्रैफिकिंग का धंधा खासतौर पर सेक्स बाजार की जरूरत को पूरा करने के लिए चल रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत के भीतर ही 90 फीसदी सेक्स ट्रैफिकिंग होती है।...

1 टिप्पणी:

Dr. shyam gupta ने कहा…

----सुन्दर विचार
कुछ लोगों के मुताबिक ये सृजनात्मकता (क्रियेटिविटी) है .. लेकिन यदि क्रियेटिविटी क्या केवल अश्लील ही होती है--
---भैया, कुछ लोगों का क्या है... वैश्याओं के दलाल भी तो होते हैं न...जैसे अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का खेल होरहा है वैसे ही क्रीएटिविटी के नाम पर धन्धा होरहा है...दलालों द्वारा..

---इसे वैश्वीकरण नहीं पाश्चात्यीकरण( या पौराणिक भाषा में राक्षसी करण) कहिये विश्व का...