शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

करोड़ो की जमीन पर कब्ज़ा का प्रयास


भदोही/उत्तरप्रदेश देश में इन दिनों भू माफियाओ के कारनामे चरम पर है ! जहाँ देश में जमीनों के बड़े बड़े घोटाले इन दिनों देखने को मिल रहे है ! वही उत्तर प्रदेश में भी भू-माफियाओ का बोल बाला है और यह सरकारी जमीनों का बन्दर बाट कर रहे है ! ताजा मामला भदोही के महबूबपुर का है ,जहाँ भू-माफियाओ ने फर्जी दस्तावेज बनवा कर ग्राम सभा की करोड़ो की जमीन पर कब्ज़ा कर निर्माण कराने लगे और जब भू-माफियाओ के इस गोरखधंधे की भनक आलाधिकारियो को मिली तो उनके कान खड़े हो गए ! आनन् फानन में एस.डी.एम.भदोही ने मौके पर जाकर निर्माण कार्य को रुकवाया ! लेकिन तब तक भू माफिया वंहा से फरार हो चुके थे ! मामले में SDM ने पुलिस को आरोपियों की गिरफ्तारी के आदेश दे दिए है ! वही इस जमीन के घोटाले में तहसील भदोही के भी कुछ कर्मचारियों की मिली भगत से यह कारनामा हुआ है जिसमे SDM ने जाँच बैठा दी है ! मामला भदोही शहर से सटे महबूबपुर का है ! जहाँ बाई पास पर ग्राम सभा की सरकारी जमीन 60 बिस्वा है ! उसी से सटी चार बिस्बा जमीन लक्ष्मी नारायण और अशोक कुमार को तहसीलदार भदोही ने पट्टा किया था ! लक्ष्मी नारायण जौनपुर का रहने वाला है और अशोक कुमार ( भदोही ) इनकी गिनती पूर्वांचल के बड़े भू माफियाओ में होती है ! अपनी जमीन ग्राम सभा से सटी होने के कारण इन्होने तहसील के कर्मचारियों से मिलकर फर्जी दस्तावेज बनवा लिया ! जिसमे 56 एयर को धांधली कर कागजो में 560 दिखाया गया ! जिसमे 56 के बाद एक शून्य बढाया गया ! और पूरी सरकारी जमीन पर कब्ज़ा कर निर्माण कराने लगे ! शहर और बाई पास से सटी होने के कारण इस जमीन की कीमत करोडो में आंकी जा रही है ! और इस कीमती जमीन पर बहुत दिनों से इन भू माफियाओ की निगाह थी इससे पहले भी इस जमीन के मामले में कई बार महबूबपुर में विवाद हो चुके है !
आप अंदाजा लगा सकते है की किस तरह से भू माफिया सक्रीय है ! अगर हम तहसील कर्मचारियों की मिली भगत की बात करे तो यह उनके बिना मिले संभव ही नहीं है ! जिस तरह से दस्तावेजो में नम्बरों को इधर उधर किया गया है और तहसीलदार ने चार बिस्वा ही जमीन का पट्टा किया और नम्बरों का हेर फेर कर सरकारी जमीन पर कब्ज़ा किया जा रहा था ! यह बिना तहसील के कर्मचारियों की मिली भगत से हो ही नहीं सकता ! इस मामले में तहसीलदार से लेकर लेखपाल ,कानूनगो व अन्य कई अधिकारी जाँच के घेरे में है ! जिसपर SDM ने जाँच बैठा दी है ! और बताया की इस मामले में जो भी दोषों होगा उसके खिलाफ सक्त से सक्त कार्यवाही की जाएगी ! हलाकि अभी तक भू माफिया
लक्ष्मी नारायण और अशोक कुमार फरार है !
जब मौके पर भारी पुलिस बल के साथ एस.डी.एम.भदोही गए तो वहा रातो रात निर्माण कार्य इतनी तेजी से कराया गया की लगभग आधी से ज्यादा जमीन पर चार दीवारी बना ली गयी थी ! और 50 से ज्यादा मजदूर लगे थे ! मौके पर काम करा रहे लोगो से जब पूछा गया की आपकी जमीन तो चार बिस्वा ही है तो पूरी जमीन पर कैसे चार दीवारी बनाई जा रही है ! तो उन्होंने बताया की लक्ष्मी नारायण और अशोक कुमार की जमीन है ! उसी का काम हो रहा है और उतनी ही जमीन घेरी जा रही है जब यह पूछा गया की दीवारी तो 60 बिस्बा में हो रही है वो कोई जबाब उनके पास नहीं था ! और वह अपने आप को बचाते दिखे !
इस समय प्रदेश में भू माफियाओ की नजर उन जमीनों पर है जो सोनी की कीमत की है ! अगर देखा जाय तो व्योसाय ऐसा है की सोने की तरह जमीनों की कीमत है ! यह भू माफिया कुछ सरकारी कर्मचारियों की मिली भगत से बहुत कम पैसा लगाकर कौड़ियो के भाव में जमीन पर कब्ज़ा कर उसी जमीन को सोने के भाव बेचते है ! और यह गोरख धंधा पूर्वांचल में इन दिनों बड़े भू माफियाओ के संरक्षण में फल फूल रहा है ! अगर यदा कदा कभी प्रशासन की आँख खुली तो कार्यवाही हो जाती है नहीं तो यह भू माफिया करोडो में खेलते है ! और भदोही में जिस तरह से तहसील के कर्मचारियों की मिली भगत पाई गयी है तो यह साफ़ दिखाता है की किस तरह से सरकारी अधिकारी मिल कर सरकारी जमीनों का बन्दर बाट कर रहे है !

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

पत्रकार बनने के लिए तय हो मानक

राजनीति के अपराधीकरण पर किये गए विभिन्न अध्ययनों के दौरान जो निष्कर्ष प्राप्त हुआ था, वह आज पत्रकारों के राजनीतिकरण पर भी सटीक बैठ रहा है. मोटे तौर पर विधानमंडलों में अपराधियों की बढ़ती संख्या का कारण यह था कि पहले नेताओं ने अपने प्रतिद्वंदियों को दुश्मन समझ उसे निपटाने के लिए किराए के लिए बाहुबलियों की मदद लेना शुरू किया. बाद में उन अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को लगा कि जब केवल ताकत की बदौलत ही सांसद-विधायक बना जा सकता है, तो बजाय दूसरों के लिए पिस्तौल भांजने के क्यू न खुद के लिए ही ताकत का उपयोग शुरू कर दिया जाय. फलतः वे सभी अपनी-अपनी ताकत खुद के लिए उपयोग करने लगे और ग्राम पंचायतों से लेकर संसद तक अपराधी ही अपराधियों की पैठ हो गयी. इस विषय पर वोहरा कमिटी ने काफी प्रकाश डाला है. तो अब चुनाव प्रणाली में नए-नए प्रयोगों के दौरान भले ही असामाजिक तत्वों पर कुछ अंकुश लगा हो लेकिन यह फार्मूला अब पत्रकारों ने भी अपनाना शुरू कर दिया है.
हाल तक पत्रकारिता के लिए भी पेड न्यूज़ चिंता का सबब बना हुआ था. लेकिन राडिया प्रकरण के बाद यह तथ्य सामने आया कि कलम को लाठी की तरह भांजने वाले लोगों ने भी यह सोचा कि अगर केवल कलम या कैमरे से ही किसी की छवि बनायी या बिगाड़ी जा सकती हो, तो क्यू न ऐसा काम केवल खुद की बेहतरी के लिए किया जाय? कल तक जो कलमकार नेताओं के लिए काम करते थे, अब वे नेता बनाने या पोर्टफोलियो तक डिसाइड करवाने की हैसियत में आ गए. अगर इस पर लगाम न लगाई गयी तो कल शायद ये भी खुद ही लोकतंत्र को चलाने या कब्जा करने की स्थिति में आ जाय. तो 2G स्पेक्ट्रम खुलासे ने यह अवसर मुहैया कराया है जब पत्रकारिता की सड़ांध को भी रोकने हेतु समय रहते ही प्रयास शुरू कर देना उचित होगा. यह सड़ांध केवल दिल्ली तक ही सिमटा नहीं है बल्कि कालीन के नीचे छुपी यह धूल, गटर के ढक्कन के नीचे की बदबू राज्यों की राजधानियों और छोटे शहरों तक बदस्तूर फ़ैली हुई है.
संविधान द्वारा आम जनों को मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी का सबसे ज्यादा उपभोग पत्रकारों को करने दे कर समाज ने शायद एक शक्ति संतुलन स्थापित करना चाहा था. अपने हिस्से की आज़ादी की रोटी उसे समर्पित कर के समाज ने यह सोचा होगा कि यह ‘वाच डाग’ का काम करते रहेगा. नयी-नयी मिली आज़ादी की लड़ाई में योगदान के बदौलत इस स्तंभ ने भरोसा भी कमाया था. लेकिन शायद यह उम्मीद किसी को नहीं रही होगी कि यह ‘डॉग’ भौंकने के बदले अपने मालिक यानी जनता को ही काटना शुरू कर देगा. हाल में उजागर मामले का सबसे चिंताजनक पहलू है समाज में मीडिया की बढ़ती बेजा दखलंदाजी.
निश्चित ही कुछ हद तक मीडिया की ज़रूरत देश को है. लेकिन लोगों में पैदा की जा रही ख़बरों की बेतहाशा भूख ने अनावश्यक ही ज़रूरत से ज्यादा इस कथित स्तंभ को मज़बूत बना दिया है. यह पालिका आज ‘बाज़ार’ की तरह यही फंडा अपनाने लगा है कि पहले उत्पाद बनाओ फ़िर उसकी ज़रूरत पैदा करो. प्रसिद्ध मीडिया चिन्तक सुधीश पचौरी ने अपनी एक पुस्तक में ‘ख़बरों की भूख’ की तुलना उस कहानी ( जिसमें ज़मीन की लालच में बेतहाशा दौड़ते हुए व्यक्ति की जान चली जाती है ) में वर्णित पात्र से कर यह सवाल उठाया है कि आखिर लोगों को कितनी खबर चाहिए? तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ख़बरों की बदहजमी रोकने हेतु उपाय किया जाना समीचीन होगा.
शास्त्रों में खबर देने वाले को मोटे तौर पर ‘नारद’ का नकारात्मक रूप देकर उसे सदा झगड़े और फसाद की जड़ ही बताया गया है. इसी तरह महाभारत के कथानक में संजय द्वारा धृतराष्ट्र को सबसे पहले आँखों देखा हाल सुनाने की बात आती है. लेकिन महाभारत में यह उल्लेखनीय है कि आँखों देखा हाल सुनाने की वह व्यवस्था भी केवल (अंधे) राजा के लिए की गयी थी. इस निमित्त संजय को दिव्य दृष्टि से सज्जित किया गया था. तो आज के मीडियाकर्मियों के पास भले ही सम्यक दृष्टि का अभाव हो. चीज़ों को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ कर, अपने लाभ-हानि का विचार करते हुए ख़बरों से खेल कर, व्यक्तिगत पूर्वाग्रह-दुराग्रह के हिसाब से खबर बनाने, निर्माण करने की हरकतों को अब भले ही ‘पत्रकारिता’ की संज्ञा दे दी जाय. भले ही कुछ भी विकल्प न मिलने पर, अन्य कोई काम कर लेने में असफल रहने की कुंठा में ही अधिकाँश लोग पत्रकार बन गए हों, लेकिन आम जनता को आज का मीडिया धृतराष्ट्र की तरह ही अंधा समझने लगा है. तो ऐसी मानसिकता के साथ कलम या कैमरे रूपी उस्तरे लेकर समाज को घायल करने की हरकत पर विराम लगाने हेतु प्रयास किया जाना आज की बड़ी ज़रूरत है.
लोकतंत्र में चूंकि सत्ता ‘लोक’ में समाहित है, अतः यह उचित ही है कि ख़बरों को प्राप्त करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार रहे. लेकिन ‘घटना’ और ‘व्यक्ति’ के बीच ‘माध्यम’ बने पत्रकार अगर बिचौलिये-दलाल का काम करने लगे तो ऐसे तत्वों को पत्रकारिता से बाहर का रास्ता दिखाने हेतु प्रयास किये जाने की ज़रूरत है. जनता को धृतराष्ट्र की तरह समझने वाले तत्वों के आँख खोल देने हेतु व्यवस्था को कुछ कड़े कदम उठाने की ज़रूरत है. कोई पत्रकार अपने ‘संजय’ की भूमिका से अलग होकर अगर ‘शकुनी’ बन जाने का प्रयास करे, षड्यंत्रों को उजागर करने के बदले खुद ही साजिशों में संलग्न हो जाय तो समाज को चाहिये कि ऐसे तत्वों को निरुत्साहित करे.
अव्वल तो यह किया जाना चाहिए कि हर खबर के लिए एक जिम्मेदारी तय हो. अगर खबर गलत हो और उससे किसी निर्दोष का कोई नुकसान हो जाय तो उसकी भरपाई की व्यवस्था होना चाहिए. इसके लिए करना यह होगा कि ‘पत्रकार’ कहाने की मंशा रखने वाले हर व्यक्ति का निबंधन कराया जाय. कुछ परिभाषा तय किया जाय, उचित मानक पर खड़े उतरने वाले व्यक्ति को ही ‘पत्रकार’ के रूप में मान्यता दी जाय. कुछ गलत बात सामने आने पर उसकी मान्यता समाप्त किये जाने का प्रावधान हो. जिस तरह वकालत या ऐसे अन्य व्यवसाय में एक बार प्रतिबंधित होने के बाद कोई पेशेवर कहीं भी प्रैक्टिस करने की स्थिति में नहीं होता, उसी तरह की व्यवस्था मीडिया के लिए भी किये जाने की ज़रूरत है. अभी होता यह है कि कोई कदाचरण साबित होने पर अगर किसी पत्रकार की नौकरी चली भी जाती है तो दूसरा प्रेस उसके लिए जगह देने को तत्पर रहता है. राडिया प्रकरण में भी नौकरी से इस्तीफा देने वाले पत्रकार को भी अन्य प्रेस द्वारा अगले ही दिन नयी नौकरी से पुरस्कृत कर दिया गया. तो जब तक इस तरह के अंकुश की व्यवस्था नहीं हो तब तक निरंकुश हो पत्रकारगण इसी तरह की हरकतों को अंजाम देते रहेंगे.
जहां हर पेशे में आने से पहले उचित छानबीन करके उसे अधिसूचित करने की व्यवस्था है वहाँ पत्रकार किसको कहा जाय यह मानदंड आज तक लागू नहीं किया गया है. आप देखेंगे कि चाहे वकालत की बात हो, सीए, सीएस या इसी तरह के प्रोफेसनल की. हर मामले में कठिन मानदंड को पूरा करने के बाद ही आप अपना पेशा शुरू कर सकते हैं. डाक्टर-इंजीनियर की तो बात ही छोड़ दें, एक सामान्य दवा की दुकान पर भी एक निबंधित फार्मासिस्ट रखने की बाध्यता है. कंपनियों के लिए यह बाध्यता है कि एक सीमा से ऊपर का टर्नओवर होने पर वो नियत सीमा में पेशेवरों को रखे और उसकी जिम्मेदारी तय करे. लेकिन बड़ी-बड़ी कंपनियों का रूप लेते जा रहे मीडिया संगठनों को ऐसे हर बंधनों से मुक्त रखना अब लोकतंत्र पर भारी पड़ने लगा है. चूंकि आज़ादी के बाद, खास कर संविधान बनाते समय पत्रकारों के प्रति एक भरोसे और आदर का भाव था. तो संविधान के निर्माताओं ने इस पेशे में में आने वाले इतनी गिरावट की कल्पना भी नहीं की थी. तो ज़ाहिर है इस तन्त्र पर लगाम लगाने हेतु उन्होंने कोई खास व्यवस्था नहीं की. लेकिन अब बदली हुई परिस्थिति में यह ज़रूरी है कि पत्रकारों के परिचय, उसके नियमन के लिए राज्य द्वारा एक निकाय का गठन किया जाय, अन्यथा इसी तरह हर दलाल खुद को पत्रकार कह लोकतंत्र के कलेजे पर ‘राडिया’ दलता रहेगा.
साभार - पंकज झा

भदोही में बसपा की चली बयार साफ हो गयी सपा

  भदोही/उत्तरप्रदेश  :  जिला पंचायत अध्यक्ष पद की कुर्सी हथियाने के बाद बसपा ने  जनपद की सभी छह क्षेत्र पंचायतों से भी सपा का सुपड़ा साफ कर दिया है  है। बसपा की चली बयार में सपा साफ हो गयी है। सपा ने अपने सबसे मजबूत किले डीघ सहित ज्ञानपुर व भदोही को गंवा दिया है। इन तीनों किले के ढहने से सपा को करारा झटका लगने के साथ ही सपा के विजय {ज्ञानपुर विधायक विजय मिश्रा} के विजय अभियान को बसपा के दो नाथ ने खत्म कर दिया है। यह दीगर बात है की चुनाव के दौरान फरार चल रहे ढाई लाख  के इनामिया सपा विधायक  विजय मिश्रा चर्चा में छाये रहे.
बताते चलें जनपद में दो दशक से सपा की सियासत की खास हिस्सा पंचायतें ही बनी हुई थी। इन्हीं पंचायतों के दम पर सपा दंभ व हुंकार भरती रही। नब्बे के दशक से अब तक पंचायतों पर सपा के एकक्षत्र राज का सबसे कारण ज्ञानपुर के बाहुबली सपा विधायक विजय मिश्र थे। उनके नेतृत्व में सपा ने जिले की सबसे निचली पंचायतों (ग्रामसभा) से लेकर ऊपरी पंचायत (जिला पंचायत) तक पर एकक्षत्र साम्राज्य स्थापित कर लिया था। सपा के पंचायत मिथक के इस लंबे सफर को इस चुनाव में बसपा ने खत्म कर डाला है तो इसकी खास वजह बने हैं बसपा के दो नाथ। एक सूबे के माध्यमिक शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र तथा दूसरे सांसद गोरखनाथ पांडेय। पहले जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में बसपा की अप्रत्याशित जीत दर्ज करा के सनसनी फैलाने वाले यह दोनों नाथ एक बार फिर क्षेत्र पंचायत प्रमुख चुनाव में कमाल कर गये। इस चुनाव में दांव पर लगी अपनी प्रतिष्ठा बचाने के साथ ही सपा के सबसे खास गढ़ डीघ व औराई में निर्विरोध जीत के साथ ही ज्ञानपुर, भदोही व सुरियावां में भी बसपा का नीला झंडा फहरा कर समूचे जिले को नीलामय कर दिया। यही नहीं अभोली में बसपा से टिकट न मिलने पर बागी प्रत्याशी की जीत के बाद यह बयान बसपा से बाहर नहीं हूं ने बसपा के जीत के जश्न को दूना कर दिया है। ..अब जबकि पंचायत चुनाव का आखिरी दौर भी खत्म हो चुका है, ऐसे में यह बात भी स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी है कि सपा का पंचायत अध्याय अब खत्म हो गया है और पंचायतों में बसपा ऐतिहासिक जीत हासिल कर बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। यह सफलता मिशन 2012 के विधान सभा चुनाव में बसपा को मजबूती देने में सहायक साबित होगा इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2005 के जिला पंचायत चुनाव में सर्वाधिक 19 सदस्य सपा के चुने गये थे। इसी तरह सभी क्षेत्र पंचायतों में भी उसका कब्जा था। यही नहीं जिले की तत्कालीन कुल 489 ग्राम पंचायतों में करीब 376 में सपा से जुड़े लोग ग्राम प्रधान तथा 567 क्षेत्र पंचायतों में 400 से अधिक क्षेत्र पंचायत सदस्य थे।जबकि इस बार पूरा परिद्रिस्य ही बदला नजर आ रहा है. पंचायत चुनाव की अधिकतर सीटो पर बसपा ने ही परचम लहराया है.हालाँकि पंचायत चुनाव में धांधली के भी आरोप लगाये जा रहे हैं. चर्चा है की सत्ता के साथ ही धनबल और बाहुबल  का भी जमकर दुरुप्रयोग किया गया है.

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

पुरुष से ऊंचा स्‍थान है नारी का हिंदू परंपरा में


भारतीय संस्कृति में नारी का उल्लेख जगत्-जननी आदि शक्ति-स्वरूपा के रूप में किया गया है। श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणों में नारी को विशेष स्थान मिला है। मनु स्मृति में कहा गया

है-


यत्र नार्यस्‍तु पूज्‍यन्‍ते रमन्‍ते तत्र देवता:।  

यत्रेतास्‍तु न पूज्‍यन्‍ते सर्वास्‍तफला: क्रिया।।


जहाँ नारी का समादर होता है वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं और जहाँ ऐसा नहीं है वहाँ समस्त यज्ञादि क्रियाएं व्यर्थ होती हैं। नारी की महत्ता का वर्णन करते हुये ”महर्षि गर्ग” कहते

हैं-

यद् गृहे रमते नारी लक्ष्‍मीस्‍तद् गृहवासिनी।

देवता: कोटिशो वत्‍स! न त्‍यजन्ति गृहं हितत्।।

जिस घर में सद्गुण सम्पन्न नारी सुख पूर्वक निवास करती है उस घर में लक्ष्मी जी निवास करती हैं। हे वत्स! करोड़ों देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते।

ज्ञान-ऐश्‍वर्य-शौर्य की प्रतीक

भारत में सदैव नारी को उच्च स्थान दिया गया है। समुत्कर्ष और नि.श्रेयस के लिए आधारभूत ‘श्री’, ‘ज्ञान’ तथा ‘शौर्य’ की अधिष्ठात्री नारी रूपों में प्रगट देवियों को ही माना गया है। आदिकाल से ही हमारे देश में नारी की पूजा होती आ रही है। यहाँ ‘अर्द्धनारीश्वर’ का आदर्श रहा है। आज भी आदर्श भारतीय नारी में तीनों देवियाँ विद्यमान हैं। अपनी संतान को संस्कार देते समय उसका ‘सरस्वती’ रूप सामने आता है। गृह प्रबन्धन की कुशलता में ‘लक्ष्मी’ का रूप तथा दुष्टों के अन्याय का प्रतिकार करते समय ‘दुर्गा’ का रूप प्रगट हो जाता है। अत. किसी भी मंगलकार्य को नारी की अनुपस्थिति में अपूर्ण माना गया। पुरुष यज्ञ करें, दान करे, राजसिंहासन पर बैठें या अन्य कोई श्रेष्ठ कर्म करे तो ‘पत्नी’ का साथ होना अनिवार्य माना गया।

वेदों के अनुसार सृष्टि के विधि-विधान में नारी सृष्टिकर्ता ‘श्रीनारायण’ की ओर से मूल्यवान व दुर्लभ उपहार है। नारी ‘माँ’ के रूप में ही हमें इस संसार का साक्षात दिग्दर्शन कराती है, जिसके शुभ आशीर्वाद से जीवन की सफलता फलीभूत होती है। माँ तो प्रेम, भक्ति तथा श्रध्दा की आराध्य देवी है। तीनों लोकों में ‘माता’ के रूप में नारी की महत्ता प्रकट की गई है। जिसके कदमों तले स्वर्ग है, जिसके हृदय में कोमलता, पवित्रता, शीतलता, शाश्वत वाणी की शौर्य-सत्ता और वात्सल्य जैसे अनेक उत्कट गुणों का समावेश है, जिसकी मुस्कान में सृजन रूपी शक्ति है तथा जो हमें सन्मार्ग के चरमोत्कर्ष शिखर तक पहुँचने हेतु उत्प्रेरित करती है, उसे ”मातृदेवो भव” कहा गया है।

नारी का सम्‍मान

 

हिन्दू धर्म की स्मृतियों में यह नियम बनाया गया कि यदि स्त्री रुग्ण व्यक्ति या बोझा लिए कोई व्यक्ति आये तो उसे पहले मार्ग देना चाहिये। नारी के प्रति किसी भी तरह का असम्मान गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया। नारी यदि शत्रु पक्ष की भी है तो उसको पूरा सम्मान देने की परम्परा बनाई। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘रामचरित मानस’ में लिखा है कि भगवान श्री राम बालि से कहते हैं-

अनुज बधू, भगिनी सुत नारी।

सुनु सठ कन्‍या सम ए चारी।। इन्‍हहिं कुदृष्टि विलोकई जोई।

ताहि बधे कछु पाप न होई।।

(छोटे भाई की पत्नी, बहिन, पुत्र की पत्नी कन्या के समान होती हैं। इन्हें कुदृष्टि से देखने वाले का वध कर देना कतई पापनहीं है।)

भारत में हिन्दू धर्म की परम्परा रही है कि छोटी आयु में पिता को बड़े होने (विवाह) के बाद पति को तथा प्रौढ़ होने पर पुत्र को नारी की रक्षा का दायित्व है। यही कारण था कि हमारी संस्कृति में प्राचीन काल से ही महान नारियों की एक उज्ज्वल परम्परा रही है। सीता, सावित्री, अरून्धती, अनुसुइया, द्रोपदी जैसी तेजस्विनी; मैत्रेयी, गार्गी अपाला, लोपामुद्रा जैसी प्रकाण्ड विदुषी, और कुन्ती,विदुला जैसी क्षात्र धर्म की ओर प्रेरित करने वाली तथा एक से बढ़कर एक वीरांगनाओं के अद्वितीय शौर्य से भारत का इतिहास भरा पड़ा है। वर्तमान काल खण्ड में भी महारानी अहल्याबाई, माता जीजाबाई, चेन्नमा, राजमाता रूद्रमाम्बा, दुर्गावती और महारानी लक्ष्मीबाई जैसी महान नारियों ने अपने पराक्रम की अविस्मरणीय छाप छोड़ी । इतना ही नहीं, पद्मिनी का जौहर, मीरा की भक्ति और पन्ना के त्याग से भारत की संस्कृति में नारी को ‘धु्रवतारे’ जैसा स्थान प्राप्त हो गया। भारत में जन्म लेने वाली पीढ़ियाँ कभी भी नारी के इस महान आदर्श को नहीं भूल सकती। हिन्दू संस्कृति में नारी की पूजा हमेशा होती रहेगी।

तेजस्विता की प्रतिमूर्ति

विधर्मियों ने हमारी संस्कृति आधारित जीवन पद्धति पर अनेकों बार कुठाराघात किया है लेकिन हमारे देश की महान् नारियों ने उनको मुँहतोड़ जवाब दिया है। अपने शौर्य व तेजस्विता से यह बता दिया कि भारत की नारी साहसी व त्यागमयी है।

प्राचीन भारत की नारी समाज में अपना स्थान माँगने नहीं गयी, मंच पर खड़े होकर अपने अभावों की माँग पेश करने की आवश्यकता उसे कभी प्रतीत ही नहीं हुई। और न ही विविध संस्थायें स्थापित कर उसमें नारी के अधिकारों पर वाद-विवाद करने की उसे जरूरत हुई। उसने अपने महत्वपूर्ण क्षेत्र को पहचाना था, जहाँ खड़ी होकर वह सम्पूर्ण संसार को अपनी तेजस्विता, नि.स्वार्थ सेवा और त्याग के अमृत प्रवाह से आप्लावित कर सकी थी। व्यक्ति, परिवार, समाज, देश व संसार को अपना-अपना भाग मिलता है- नारी से, फिर वह सर्वस्वदान देने वाली महिमामयी नारी सदा अपने सामने हाथ पसारे खड़े पुरुषों से क्या माँगे और क्यों माँगे?

वह हमारी देवी अन्नपूर्णा है- देना ही जानती है लेने की आकांक्षा उसे नहीं है। इसका उदाहरण भारतीय नारी ने धर्म तथा देश की रक्षा में बलिदान हो रहे बेटों के लिए अपने शब्दों से प्रस्तुत किया है।

”इस धर्म की रक्षा के लिए अगर मेरे पास और भी पुत्र होते तो मैं उन्हें भी धर्म-रक्षा, देश-रक्षा के लिए प्रदान कर देती।” ये शब्द उस ‘माँ’ के थे जिसके तीनों पुत्र दामोदर, बालकृष्ण व वासुदेव चाफेकर स्वतंत्रता के लिये फाँसी चढ़ गये।

अक्षय प्रेरणा का स्रोत

 

यदि भारतवर्ष की नारी अपने ‘नारीधर्म’ का परित्याग कर देती तो आर्यावर्त कहलाने वाला ‘हिन्दुस्थान’ अखिल विश्व की दृष्टि में कभी का गिर गया होता। यदि देखा जाय तो हमारे देश की आन-बान-शान नारी समाज ने ही रखी है। हमारे देश का इतिहास इस बात गवाह है कि युध्द में जाने के पूर्व नारी अपने वीर पति और पुत्रों के माथे पर ”तिलक लगाकर” युध्दस्थल को भेजती थी। लेकिन वर्तमान में पाश्चात्य शिक्षा के प्रचार-प्रसार के प्रभाव से भारत में नारी के अधिकार का आन्दोलन चल पड़ा है। वस्तुत. नारी का अधिकार माँगने और देने के प्रश्न से बहुत ऊपर है। उसे आधुनिक समाज में स्थान अवश्य मिला है पर वह मिला है लालसाओं की मोहावृत प्रतिमूर्ति के रूप में, पूजनीय माता के रूप में नहीं।

अवश्य ही युग परिवर्तन के साथ हमारे आचार-विचार में और हमारे अभाव-आवश्यकताओं में परिवर्तन होना अनिवार्य है। परन्तु जीवन के मौलिक सिद्धान्तों से समझौता कदापि ठीक नहीं। सृष्टि की रचना में नारी और पुरुष दोनों का महत्व है। वे एक दूसरे के पूरक हैं और इसी रूप में उनके जीवन की सार्थकता भी है। यदि नारी अपने क्षेत्र को छोड़कर पुरुष के क्षेत्र में अधिकार माँगने जायेगी तो निश्चित ही वह नारी जीवन की सार्थकता को समाप्त कर देगी।

साभार:राजीव त्रिपाठी

सर्वशिक्षा अभियान: कितना और कहां तक पूरा


दिसम्बर 2010 तक सर्वशिक्षा अभियान द्वारा सभी बच्चों को साक्षर बनाना केंद्र सरकार का सपना था। कहना गलत न होगा कि सरकार का सपना चकनाचूर होता नजर आ रहा है।
सर्वशिक्षा अभियान: कितना और कहां तक पूराआखिर क्या वजह है कि साक्षरता का प्रतिशत आज भी 50 से 55 फीसदी से ज्यादा नहीं है। उतनी ही आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की भी है, यानी साक्षरता का सीधा संबंध आय के साथ है। यदि साक्षरता दर में सुधार लाना है तो आमदनी को बढ़ाना ही होगा।
विडंबना यह है कि सरकार ने एक ओर साक्षरता अभियान शुरू किया और दूसरी ओर शिक्षा का निजीकरण। शिक्षा के बाजारीकरण के दौर में यह परिकल्पना ही गलत है कि सभी को शिक्षा दिलाने वाला सरकारी अभियान सफलता प्राप्त करेगा।
सर्वशिक्षा की गारंटी तो तब संभव थी जब आबादी के अनुरूप शासकीय स्कूलों की संख्या होती। सरकारी स्कूलों की संख्या में बढ़ोत्तरी भले नहीं हो पायी किन्तु कई चलते हुए स्कूल जरूर बंद कर दिए गयें। इस विरोधाभास पर ईमानदारी से चिंतन-मनन होना चाहिए था। सरकार ने प्रायमरी कक्षाओं की मुफ्त शिक्षा को प्रचारित खूब किया किन्तु अमलीकरण में ईमानदारी नहीं दिखाई।
गरीब एवं पिछड़े तबके के लोगों से सरकार ने लगातार अपीलें की किंतु लोगों ने वह प्रतिसाद नहीं दिया जिसकी अपेक्षा थी। मुफ्त शिक्षा, मुफ्त किताब-कापियों का प्रलोभन भी कारगर सिद्ध नहीं हो पाया। स्कूलों द्वारा मुफ्त अनाज भी बांटा जा रहा है। बावजूद इन सबके 30 प्रतिशत मां-बाप हैं जो बच्चों की शिक्षा को जरूरी नहीं मानते। उनकी नजर में शिक्षा कोई मायने नहीं रखती।

 

"मुफ्त शिक्षा, मुफ्त किताब-कापियों का प्रलोभन भी कारगर सिद्ध नहीं हो पाया। स्कूलों द्वारा मुफ्त अनाज भी बांटा जा रहा है। बावजूद इन सबके 30 प्रतिशत मां-बाप हैं जो बच्चों की शिक्षा को जरूरी नहीं मानते। उनकी नजर में शिक्षा कोई मायने नहीं रखती।"
हमारे देश में ऐसे भी गरीब लोग हैं जिन्होंने अपनी गरीबी को बच्चों के उज्जवल भविष्य के मार्ग में अवरोधक नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी बदनसीबी को बच्चों की बदनसीबी नहीं बनने दी उनके बच्चों ने अवसरों का भरपूर लाभ उठाया और मां-बाप के सपनों को साकार करते हुए उन भ्रांतियों को झूठा साबित कर दिखाया कि आगे बढ़ने के लिए धन ही सबसे जरूरी है। दरअसल उन्होंने जहां चाह वहां राह कहावत को चरितार्थ कर दिखाया।
अतः जरूरी है सामूहिक प्रयासों की, ऐसे प्रयासों की जिनसे मजबूरियों को कहर ढाने का अवसर ही न प्रदान हो। काश! गरीबी से जूझते लोग बच्चों के भविष्य को महत्त्व प्रदान करते तो आज स्थिति इतनी भयावह कदापि नजर नहीं आती। सर्वशिक्षा अभियान का पूर्वतया सफल न हो पाने की एक वजह भ्रष्टाचारी राजनेता एवं नौकरशाहों का अड़ियल रवैय्या भी रहा।
शिक्षा हमारा अधिकार हैं। हमें शिक्षित होना ही चाहिए, यह जिद्द पैदा न हो सकी। कुछ मुठ्ठीभर लोग जरूर प्रयास करते रहे। सभी ने यदि एक जैसा सोचा होता या सरीखा प्रयास किया होता तो निश्चित तौर पर कहानी कुछ और ही होती।
प्रायमरी स्कूलों के सभी शिक्षकों को एक मिशन जरूर दिया गया था किन्तु सरकार ने उन्हें पढ़ाने का समय कम और अन्य कामों के लिए अधिक समय दिया। जनगणना से लेकर चुनाव प्रक्रिया तक, खिचड़ी बनाने से खिलाने तक का कार्य प्रायमरी शिक्षकों को सौंप कर सरकार ने स्थिति स्पष्ट कर दी कि हम सदैव अड़ियल थे और रहेंगे।

                                                                                                                                                                                                  साभार:राजेन्द्र मिश्र

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

गरीबी का मनोविज्ञान: आंकड़ों में उलझी हुई गरीबी

सरकार निरन्‍तर गरीबी उन्‍मूलन के कार्यक्रम चला रही है ले‍किन गरीबों की संख्‍या मे कमी आने के बजाय उसमे बृद्धि होती जा रही है। आज के तीस साल पहले जो गरीब थे आज भी गरीब है उनकी आर्थिक स्थिति मे काई परिवर्तन नजर नही आ रहा है। आज के तीस साल पहले जिनके पास फटी लुंगी थी आज भी उनके पास फटी लुंगी ही है। प्रश्‍न उठता है ऐसा क्‍यों है ? इस प्रश्‍न का जबाब पाने के लिये हमे  गरीबी के मनोविज्ञान का अध्‍ययन करना होगा।
प्रश्‍न उठता है गरीबी क्‍या है? सरकारी परिभाषा के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों मे वे लोग जिनकी वार्षिक आय 19840/रू से कम है तथा शहरी क्षेत्र मे 25550/रू से कम है वे लोग गरीबी की रेखा के नीचे है। मतलब गरीब वे है जिनकी वार्षिक आमदनी एक निश्चित सीमा से कम है। गरीब को अमीर की श्रेणी मे लाने के लिये आवश्‍यक है कि उसकी वार्षिक आमदनी उस सीमा के उपर लायी जाय। प्रश्‍न उठता है इस काम को कौन करेगा? सरकार समाज या वह व्‍यक्ति स्‍वयं ? प्राय: सरकार यह दावा करती रहती है कि उसकी आर्थिक नीतियों के परिणाम स्‍वरूप इतने लोग गरीबी की रेखा से उपर हुए। कई स्‍वयं सेवी संगठन भी गरीबी उन्‍मूलन के कार्यक्रम मे लगे हुये है वे भी समय समय पर दावा करते है कि उनके प्रयासों से अमुक संख्‍या मे लोग गरीबी की रेखा के उपर हुए आदि आदि। लेकिन सरकारों और लोगों के वार वार दावों के वावजूद गरीबी और गरीबों की संख्‍या मे कोई उल्‍लेखनीय कमी नही आ रही है। इसका कारण जानने के लिये इसके मनोविज्ञान का अध्‍ययन करना होगा।
इस समबन्‍ध मे मै एक कहानी सुनाना चाहता हू। मानलीजिये सडक पर एक बूढे व्‍यक्ति पैदल पैदल चले जा रहे हैं अचानक उसके पास से एक स्‍कार्पियो गुजरती है स्‍कार्पियों मे बैठा व्‍यक्ति तीन प्रकार का व्‍यवहार कर सकता है पहला कि वह गाडी से उतरेगा और सडक से पैदल पैदल गुजर रहे वयक्ति से पास आकर हाथ जोडकर कहेगा कि वह बहुत परेशान है इसलिये वह उसकी गाडी लेकर जायं और वह पैदल पैदल आ जायेगें। दूसरी स्थिति हो सकती है कि वह सडक से गुजर रहे व्‍यक्ति को अपनी गाडी मे बैठा ले और अपने साथ उनके गंतब्‍य तक छोड दें और तीसरी स्थिति हो सकती है कि वह गाडी को बगल से तेजी से निकाले और इस वात पर गौर ही न करे कि सडक पर कौन गुजर रहा है। यह भी सम्‍भव है कि गाडी चालक सडक किनारे पडे कीचड को उछालता हुआ चला जाय।



उक्‍त परिस्थितयों का आकलन करने पर आप पायेगे कि करोडों मे शायद कोई एक व्‍यक्ति होगा जो पहला दृष्टिकोण अपनाए लाखों मे एक होगा जो दूसरा दृष्किोण अपनाए और सौ मे निन्‍यानवे दशमलव निन्‍यानवे प्रतशित व्‍यक्ति ऐसे होगे जो बगल से गाडी निकालेगे और अगर बगल मे कीचड है तो कीचड उछालते हुए चले जायेंगें आप उस गाडी वाले को गाली देगें। गाडी वाला तो निकल गया। आपके गाली देने से उस गाडी वाले के सेहत पर कोई फर्क नही पडेगा। वह तो गया। इसी प्रकार की स्थिति आपकी है जो लोग विकास कर रहे है वे विकास करते चले जा रहे है। चाहे वे सरकारी मुलाजिम हो या समाज सेवी उन्‍हे आपकी चिन्‍ता नही है। वास्‍तव मे यदि कोई आपकी चिन्‍ता करता दिखाई देता है तो वह वास्‍तव मे चिन्‍ता करने का दिखावा कर रहा है। वास्‍तव मे आपको अपनी प्रगति स्‍वय करनी है। आपकी कोई सहायता नही करने वाला।
 


वर्तमान परिस्‍थितयों का आकलन करने पर आप पायेगे कि वास्‍तविक परिस्थितियां इसके ठीक विपरीत है;गरीब वर्ग अपने उत्‍थान के लिये हमेशा दूसरों का मुह ताकता है। जब आप गांव मे जायेगे तो पायेगे कि लोग सरकार की शिकायत करते मिलगें उन्‍हे शिकायत होगी कि सरकार ने उसके लिये यह नही किया सरकार ने वह नही किया लेकिन उनके द्वारा स्‍वयं अपने विकास के लिये जब आप उनसे पूछेगे कि उनके द्वारा स्‍वयं अपने विकास के लिये क्‍या किया जा रहा है तो शायद इसका उनके पास कोई जबाब नही होगा।
गरीबी के कारणों मे जनसंख्‍या बृद्धि एक महत्‍वपूर्ण कारण है।  जब देश स्‍वतंत्र हुआ था उस समय भारत की जनसंख्‍या लगभग 33 करोड थी आज भारत का मध्‍यम वर्ग 33 करोड से ज्‍यादा है। भारत की 84 करोड जनसंख्‍या का प्रतिदिन आय मात्र 20 रू0 है। एक मध्‍यम वर्गीय व्‍यक्ति जो दो से अधिक बच्‍चों की परवरिस कर सकता है एक या दो बच्‍चे पैदा करता है और वह व्‍यक्ति जो एक बच्‍चे की भी परवरिस नही कर सकता है एक दर्जन बच्‍चे पैदा करता है कहता है बच्‍चे भगवान की देन है जितने बच्‍चे होगें उतनी कमाई होगी। उन्‍हे न बच्‍चों के पढाई की चिन्‍ता न कपडे की फिक्र। दो कमाने वसले हाथ पैदा किये या नही खाने वाला पेट जरूर पैदा कर दिया । यदि आप उनसे इस विषय पर बात करे तो कहते हैं बच्‍चे वे पैदा कर रहे है इससे हमे क्‍या समस्‍या है। दूसरी समस्‍या यह है कि एक बार घर मे खाने के लिये कुछ हो जाय फिर जब तक वह खत्‍म नही हो जायेगा काम पर नही जायेगे। समाज के जितने दुर्व्‍यसन है इनके पास है। शराब पीने से लेकर घर मे महिलाओं पर अत्‍याचार बेकार के प्रदर्शनों पर अपव्‍यय शिक्षा के प्रति जागरूकता का अभाव आदि ऐसे कारक है जो इनकी गरीबी के लिये जिम्‍म्‍ेदार है। आमदनी का सीधा सिद्धान्‍त है जो व्‍यक्ति जितना अधिक शारिरिक श्रम करता है आमदनी उसी अनुपात मे कम होती है जैसे जैसे हम शारीरिक श्रम कम और मांनसिक श्रम बढाते जाते है आय बढती जाती है। इसलिये यदि हम चाहते है कि गरीबी वास्‍तव मे घटे तो हमे निम्‍न प्रयास करने होगे। पहली बात यह कि हमे इस बात का ज्ञान हो कि हमे अपना विकास स्‍वयं करना है हमारा विकास करने कोई दूसरा नही आयेगा;दूसरा हमे दूसरों की सेवा के लिये मजबूर मजदूर पैदा नही करना है इसलिये जनसंख्‍या घटानी होगी;तीसरा हमे शारीरिक श्रम घटाकर मांसिक श्रम बढाना होगा जिसके लिये हमे अपने कौशल मे बृद्धि करनी होगी;चौथा केवल उपभोग के लिये पैसे नही कमाने होगें हमे पूजी सृजन के लिये छोटी छोटी बचते करनी होगी; बेकार के दिखावे पर होने वाले खर्चों को कम करना होगा; और सबसे महत्‍वपूर्ण बात हमे जिन्‍दा रहने के लिये काम नही करना होगा बल्कि आगे बढने के लिये काम करना है। अगर हम इन आधारभूत बातों का ध्‍यान रखकर प्रयास करेगे तो गरीबी दूर करना कठिन नही है आवश्‍यकता है दृढसंकल्‍प की।
साभार: आर.एस. सिंह पटेल

भारत में छुआ- छूत नहीं थी

पता नहीं भारत में कब और कैसे ये छुआ-छूत का विषधर सांप घुस गया? पूर्वाग्रहों को छोड़ कर ज़रा तथ्यों व प्रमाणों की रोशनी में देखें तो पता चलता है कि भारत में जातियां तो थीं पर छुआ- छूत नहीं. स्वयं अंग्रेजों के द्वारा दिए आंकड़े इसके प्रमाण हैं.
भारत को कमज़ोर बनाने की अनेक चालें चलने वाले अंग्रेजों ने आंकड़े जुटाने और हमारी कमजोरी व विशेषताओं को जानने के लिए सर्वे करवाए थे. उन सर्वेक्षणों के तथ्यों और आज के झूठे इतिहास के कथनों में ज़मीन आस्मान का अंतर है.
सन १८२० में एडम स्मिथ नामक अँगरेज़ ने एक सर्वेक्षण किया. एक सर्वेक्षण टी. बी. मैकाले ने १८३५ करवाया था. इन सर्वेक्षणों से ज्ञात और अनेक तथ्यों के इलावा ये पता चलता है कि तबतक भारत में अस्पृश्यता नाम की बीमारी नहीं थी.
यह सर्वे बतलाता है कि—
# तब भारत के विद्यालयों में औसतन २६% ऊंची जातियों के विद्यार्थी पढ़ते थे तथा ६४% छोटी जातियों के छात्र थे.
# १००० शिक्षकों में २०० द्विज / ब्राह्मण और शेष डोम जाती तक के शिक्षक थे. स्वर्ण कहलाने वाली जातियों के छात्र भी उनसे बिना किसी भेद-भाव के पढ़ते थे.
# मद्रास प्रेजीडेन्सी में तब १५०० ( ये भी अविश्वसनीय है न ) मेडिकल कालेज थे जिनमें एम्.एस. डिग्री के बराबर शिक्षा दी जाती थी. ( आज सारे भारत में इतने मेडिकल कालेज नहीं होंगे.)
# दक्षिण भारत में २२०० ( कमाल है! ) इंजीनियरिंग कालेज थे जिनमें एम्.ई. स्तर की शीशा दी जाती थी.
# मेडिकल कालेजों के अधिकांश सर्जन नाई जाती के थे और इंजीनियरिंग कालेज के अधिकाँश आचार्य पेरियार जाती के थे. स्मरणीय है कि आज छोटी जाती के समझे जाने वाले इन पेरियार वास्तुकारों ने ही मदुरई आदि दक्षिण भारत के अद्भुत वास्तु वाले मंदिर बनाए हैं.
# तब के मद्रास के जिला कलेक्टर ए.ओ.ह्युम ( जी हाँ, वही कांग्रेस संस्थापक) ने लिखित आदेश निकालकर पेरियार वास्तुकारों पर रोक लगा दी थी कि वे मंदिर निर्माण नहीं कर सकते. इस आदेश को कानून बना दिया था.
# ये नाई सर्जन या वैद्य कितने योग्य थे इसका अनुमान एक घटना से हो जाता है. सन १७८१ में कर्नल कूट ने हैदर अली पर आक्रमण किया और उससे हार गया . हैदर अली ने कर्नल कूट को मारने के बजाय उसकी नाक काट कर उसे भगा दिया. भागते, भटकते कूट बेलगाँव नामक स्थान पर पहुंचा तो एक नाई सर्जन को उसपर दया आगई. उसने कूट की नई नाक कुछ ही दिनों में बनादी. हैरान हुआ कर्नल कूट ब्रिटिश पार्लियामेंट में गया और उसने सबने अपनी नाक दिखा कर बताया कि मेरी कटी नाक किस प्रकार एक भारतीय सर्जन ने बनाई है. नाक कटने का कोई निशान तक नहीं बचा था. उस समय तक दुनिया को प्लास्टिक सर्जरी की कोई जानकारी नहीं थी. तब इंग्लॅण्ड के चकित्सक उसी भारतीय सर्जन के पास आये और उससे शल्य चिकित्सा, प्लास्टिक सर्जरी सीखी. उसके बाद उन अंग्रेजों के द्वारा यूरोप में यह प्लास्टिक सर्जरी पहुंची.
### अब ज़रा सोचें कि भारत में आज से केवल १७५ साल पहले तक तो कोई जातिवाद याने छुआ-छूत नहीं थी. कार्य विभाजन, कला-कौशल की वृद्धी, समृद्धी के लिए जातियां तो ज़रूर थीं पर जातियों के नाम पर ये घृणा, विद्वेष, अमानवीय व्यवहार नहीं था. फिर ये कुरीति कब और किसके द्वारा और क्यों प्रचलित कीगई ? हज़ारों साल में जो नहीं था वह कैसे होगया? अपने देश-समाज की रक्षा व सम्मान के लिए इस पर खोज, शोध करने की ज़रूरत है. यह अमानवीय व्यवहार बंद होना ही चाहिए और इसे प्रचलित करने वालों के चेहरों से नकाब हमें हटनी चाहिए. साथ ही बंद होना चाहिए ये भारत को चुन-चुन कर लांछित करने के, हीनता बोध जगाने के सुनियोजित प्रयास. हमें अपनी कमियों के साथ-साथ गुणों का भी तो स्मरण करते रहना चाहिए जिससे समाज हीन ग्रंथी का शिकार न बन जाये. यही तो करना चाह रहे हैं हमारे चहने वाले, हमें कजोर बनाने वाले. उनकी चाल सफ़ल करने में‚ सहयोग करना है या उन्हें विफ़ल बनाना है? ये ध्यान रहे!
                                                                                                                                     साभार--डा. राजेश कपूर

कालीन नगरी में ईसाई मिशनरी का फैलता जाल

"हिन्दू धर्म के दलित वर्ग में व्याप्त गरीबी, हिन्दू संगठनो का राजनीती तक सिमित रहना, इंसानियत के विरुद्ध लिखे गए धर्म शास्त्र बन रहे धर्म परिवर्तन के कारण"

 भदोही/उतरप्रदेश;  कलात्मक  रंग बिरंगे  कालीनो के लिए विश्व में अपनी पहचान बना चुका उत्तरप्रदेश के  भदोही जनपद में काफी दिनों से ईसाई मिशनरियां अपना जाल फैलाकर धर्म  परिवर्तन जैसे काम को अंजाम दे रही है. हालाँकि प्रशासन इस मामले में अनभिज्ञता जाहिर करता है जबकि हिन्दू संगठन इसके खिलाफ आवाज़ उठाते रहते है.मामला चाहे जो भी हो किन्तु धर्म परिवर्तन के मामले को लेकर किसी दिन भी भदोही में मामला गंभीर हो सकता  है.
ईसाई मिशनरी द्वारा धर्म परिवर्तन करने वाली महिलाये"
गत सप्ताह सूचना मिली की  वाराणसी-भदोही मार्ग पर चौरी बाज़ार के निकट मोरवा नदी के पास ईसाई मिशनरी द्वारा एक दर्ज़न दलित महिलाओ का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है. सूचना पाते ही जब मैं वहा पहुंचा तो देखा रेलवे लाइन के के किनारे एक गड्ढे में महिलाये नहा रही है और कुछ पादरी वहा पर खड़ा थे. हमें देखते ही उनमे हड़बड़ी मच गयी और सब कपडे पहन कर भागने की फ़िराक में लाग गए. जब उनसे पूछा गया की क्या हो रहा है तो उन्होंने बताया प्रार्थना  की जा रही है. वे लोग धर्म  परिवर्तन की बात नकार गए और भागने लगे, मैं आश्चर्य चकित रह गया जब प्रार्थना हो रही है थी तो  भागने की क्या आवश्यकता है.लगभग १० मिनट बाद विहिप के कार्यकर्त्ता भी पहुँच गए तब तक लोग जा चुके थे नहीं तो बवाल मचना तय था. 
"धर्म परिवर्तन को लेकर प्रदर्शन करते विहिप कार्यकर्त्ता"
 चार दिन बाद ........
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"मौके पर पहुंची पुलिस"

"प्रार्थना सभा में शामिल हिन्दू दलित महिलाएं"
उसके पश्चात् हमें पता चला की जमुनीपुर बीड़ा आवासीय कालोनी के एक घर में प्राथना सभा होती है. सच जानने के लिए वहा पर हमने अपना एक आदमी भेजा जो प्राथना सभा में शामिल हुआ, जहा पर चौकाने वाले तथ्य सामने आये. प्राथना सभाओ में शामिल होने वाले ८० प्रतिशत लोग दलित वर्ग के होते है, जो किसी न किसी रूप में परेशान है, उन्हें भूत प्रेत का चक्कर बता कर भगवान इशु की प्राथना करने के लिए कहा जाता है, झाड-फूक के साथ प्रसाद के नाम पर दवाइयां भी दी जाती है, जब मरीज  ठीक हो जाता है तो उसे भगवान इशु का चमत्कार बताया जाता है. साथ ही इन सभाओ में हिन्दू देवी देवताओ को कल्पना मात्र बताया जाता है कहा जाता है की सभी देवी देवता मात्रा एक काल्पनिक पात्र है. असली भगवान तो इशु है. यह खबर प्रकाशित  होने के बाद विहिप के लोग वहा पहुंचे और बवाल खड़ा कर दिए. थोड़ी देर बाद पुलिस भी पहुँच गयी. तू-तू मै-मै के पश्चात् मामला शांत हो गया , प्राथना सभा में शामिल करीब सात दर्ज़न लोंगो ने बताया की वे अपनी मर्जी से आये है. सभी लोग बेरंग वापस आ गए.

दोषी कौन....
"मैं देखता था जब कुत्ता किसी थाली को जूठा कर देता था तो उस थाली को धोकर घर में रख दी जाती थी किन्तु वही  थाली जब दलित वर्ग जूठा करता था तो वह निकाल दी जाती थी" 
 देखा जाय  तो  धर्म परिवर्तन के लिए  कोई मिशनरी या संगठन दोषी नहीं है बल्कि हिन्दू धर्म में फैली बुराइया व हिन्दू धर्म की ठेकेदारी लेने वाले संगठन इसके लिए दोषी है. जनता के वोटो से चुनी जाने वाली सरकारे गरीबी मिटाने के बड़े बड़े दावे करती है परन्तु गरीबी नहीं मिट रही है बल्कि गरीब मिटता जा रहा है. महगाई के दौर में राशन कार्ड बना देने से राशन नहीं मिलता. कुछ अधिक लिखना शायद मूल विषय से भटकना होगा. यह कहना ही काफी होगा की केंद्र या प्रदेश सरकार सी गरीबी उन्मूलन के लिए संचालित योजनाये सिर्फ बिचौलियों तक ही सिमित है. जिसके कारण गरीबी व भुखमरी से परेशान व्यक्ति इसे अपना भाग्य समझ लेता है और भाग्य सुधारने के लिए धर्म के ठेकेदारों का शिकार बनता है, वही हिन्दू संगठनो के नाम पर सिर्फ राजनिति की जा रही है. हमारे पुरखो ने जो जाति- पाति, छुआ -छूत का जो बीज बोया था उसका पौधा बन चुका है,   वेद में लिखे वाक्यों को सुनाकर दलित वर्ग को भड़काया जा रहा है., इतना ही नहीं दलित वर्ग को हमेशा शिक्षा से दूर रखा गया जब वे पढ़ लिखकर हिन्दू धर्म शास्त्रों का अध्ययन करते है तो उनके दिल पर क्या गुजरती होगी, मुझे अपना बचपन याद है..... मैं देखता था जब कुत्ता किसी थाली को जूठा कर देता था तो उस थाली को धोकर घर में रख दी जाती थी किन्तु वही  थाली जब दलित वर्ग जूठा करता था तो वह निकाल दी जाती थी, क्या आज हमारे  हिन्दू धर्म को विनाश करने में इन सब बातो का योगदान नहीं है. धर्म परिवर्तन हो रहा है और होता रहेगा , हिन्दू संगठनो के नाम पर राजनीती करने वाले इसे नहीं रोक पाएंगे, रुकेगा तब जब हम मनसा,वाचा, कर्मणा से सभी इंसानों को एक बराबर समझेंगे, अन्यथा हिन्दू धर्म बिखर रहा है. और ऐसे ही बिखरता रहेगा.

रविवार, 19 दिसंबर 2010

सेक्स बिकता है

अभी कुछ दिनों से टीवी पर ऎसे विज्ञापनो की संख्या बढ़ गयी है जिसे आप अपने पूरे परिवार के बीच नहीं देख सकते…या देखकर शर्म महसूस कर सकते हैं… पहले ऎसे विज्ञापन केवल कॉंडोम या अन्य गर्भनिरोधकों के ही होते थे. मुझे याद है ..बचपन में जब केवल दूरदर्शन ही एकमात्र चैनल हुआ करता था तब रात के हिन्दी समाचारों के बाद गर्भनिरोधकों जैसे “निरोध” या “माला-डी” का विज्ञापन आता था और जब भी हिन्दी समाचार समाप्त होने को होते और मुख्य समाचारों की बारी आती तो हमारे घर में टी वी की आवाज कम कर दी जाती. हाँलाकि उस समय इन विज्ञापनों में अश्लील कुछ भी नहीं होता था फिर भी इन्हें परिवार के बीच देखना गवारा नहीं समझा जाता था. और आजकल तो विज्ञापन ही ऎसे आ गये हैं जो द्र्श्य और श्रव्य दोनों ही रूपों में अश्लीलता की श्रेणी में आते हैं… और ये विज्ञापन खुले आम हमारे घरों में प्रवेश भी कर गये हैं… यौन कुंठा इशारा आजकल बन रही फिल्मों के बारे में था.. फिल्म देखने के लिये तो तब भी आपके पास एक विकल्प (ऑप्सन )होता है कि आप फिल्म देखें या नहीं लेकिन विज्ञापन तो कोई विकल्प भी नहीं देते… ये तो बस आपके टी.वी. पर आ जाते हैं जब तक आप इसकी शीलता या अश्लीलता समझे तब तक ये समाप्त हो चुके होते हैं और आप सोफे में बैठ नजरें कहीं और ग़ड़ाये चुप रहते हैं ये साबित करने के लिये कि आपका ध्यान तो कहीं और था.
अब “अमूल माचो” नामक अंडरवियर के विज्ञापन को ही लें.. ये किस तरह की फंतासी का निर्माण आपके अन्दर करता है .. जब नयी नवेली दुल्हन तालाब के किनारे अपनी पति के अंतर्वस्त्र को धो रही होती है तब वो और वहां पर जलती भुनती अन्य औरतें क्या सोच रही होती हैं… और वो नयी नवेली दुलहन सारी लोकलाज त्याग कर घुटनों तक अपनी साड़ी उठा कर, अजीब अजीब से मुँह बनाकर अंतर्वस्त्र धोने लगती है .. आप भी देखना चाहते हैं तो देखिये क्या है यह ?.. एक फंतासी के जरिये उत्पाद बेचने की कोशिश .. और ये ही बिक भी रहा है.. समाचारों के मुताबिक इस ब्रांड की बिक्री में इस विज्ञापन के बाद 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.. अंडरवियर के ऎसे बहुत से विज्ञापन आजकल दिखाये जा रहें हैं.. कुछ लोगों के मुताबिक ये सृजनात्मकता (क्रियेटिविटी) है .. लेकिन यदि क्रियेटिविटी क्या केवल अश्लील ही होती है…
इसी तरह के एक अन्य विज्ञापन में एक अर्धनग्न बाला बड़े ही सिड्यूसिंग तरीके से कहती है … “निकालिये ना ……. कपड़े “. ये क्यों?? इस तरह द्विअर्थी वाक्य तो पहले दादा कोंडके की फिल्मों में होते थे .. आपको “ अन्धेरी रात में दिया तेरे हाथ में” या “खोल दे मेरी…… जबान “ तो याद ही होंगे ना..तब लोग इन फिल्मों को कोसते थे और ये फिल्में “ए” सार्टिफिकेट के साथ हॉल में आती थीं .. लेकिन आजकल के विज्ञापन बिना किसी सेंसर के हमारे ड्राइंग रूम में आ रहे हैं… इसी तरह का एक द्विअर्थी विज्ञापन था रीडिफमेल का ..जिसमें लड़कियां एक छोटे राजू के बड़े साइज के बारे में बात कर रही होती हैं.. यहाँ तक की राजू का बॉस भी शौचालय में अपनी दृष्टि राजू के शरीर पर ही गड़ाये रखता है … और अंत में एक बेशरम मित्र पूछ ही लेता है क्या ये सचमुच बहुत बड़ा है .. तो राजू कहता है कि ये बड़ा ही नहीं वरन अनलिमिटेड है .. तब पता चलता है कि वो लोग राजू के मेल बॉक्स के साईज के बारे में बात कर रहे होते हैं…
अब कॉडोम के “बिन्दास बोल” या फिर दिल्ली सरकार के “कॉडोम हमेशा साथ रखिये” से तो बच्चे बहुत कुछ सीख ही रहे थे… अब आने वाले समय में और भी ना जाने क्या क्या सीखेंगे …
हर वस्तु का वैश्वीकरण हो रहा है….जब कोई आंधी चलती है तो सब कुछ प्रभावित होता है फर्क सिर्फ इतना होता है कि कोई कम प्रभावित होता है कोई ज्यादा…अब आप ही की बात लीजिये आप नाटक कर रहे थे कि आप नहीं देख रहे लेकिन आप देख रहे थे….तो यही होता है….कोईघर पर देखता है और अगर नहीं देख सका तो कहीं बाहर जाकर देखता है….आप यह न समझे कि मैं इसकी पक्षधर हूं मैं सिर्फ सच्चाई बता रही हूं….कि चाहे खुलकर देखें य चुपके से बात तो वही है…..स्त्री के इश्तहार के बिना तो कुछ भी नहीं ब
नग्न तन से यहां नाचती हैं जो तारिकाएं,
स्त्री की अस्मिता पर इक बड़ा सवाल कर दिया है।
अब बस यही हमारी संस्कृति का पतन का दौर चल रहा है….और हम विवश होकर देख ही सकते हैं….मूल्यहीनता की आंधी को रोक नहीं सकते…
''कहते है की कला चाहे जो भी हो इन्सान को
विरासत मे मिलती है अगर ये तनिक भी सत्य है तो
कब मुकम्मल हुई है जिन्दगी बगैर इश्क के ,
वो और बात है की हदे आशिकी- तोड़-शख्स (लोग )
दफ़न हुए हैं इश्क मे ।
है बहुत और बस इज़ाज़त आपका चाहिए गर पसंद हो तो , नापसंद हो तो यहीं पे रोक डालिए.........
भारत में ह्यूमन ट्रैफिकिंग का धंधा खासतौर पर सेक्स बाजार की जरूरत को पूरा करने के लिए चल रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत के भीतर ही 90 फीसदी सेक्स ट्रैफिकिंग होती है।...