शनिवार, 19 जून 2010

उद्योग के लिये खतरा बना सिंथेटिक कालीन

सिंथेटिक कालीन परम्‍परागत भारतीय कालीनों के लिए खतरे की घंटी
भदोही, उत्तरप्रदेशः चीन व मध्य एशिया के देशों से भारत में आयात हो रहे सिंथेटिक कालीनों से भारत के परम्परागत कालीनों पर खासा असर पड़ने की आशंका प्रबल हो गई है। हाथ से बुने गए भारतीय कालीनों के मुकाबले सिंथेटिक कालीन सब्जी के भाव बिक रहे हैं। कालीन निर्यातकों का कहना है कि यदि इसे इसी तरह बढ़ावा मिलता रहा, तो इस उद्योग में लगे लाखों बुनकरों को रोजी-रोटी के लिए मोहताज होना पडेगा।

अपनी कला के बल पर पूरे विश्व में पहचान बना चुका भारतीय कालीन उद्योग का अस्तित्व मुगल काल से ही है। कार्पेट एक्‍सपोर्ट प्रोमोशन काउंसिल (सीईपीसी) के अनुसार कालीन का निर्यात जहां 1980 में 800 करोड़ रुपए का था, वहीं आज 3500 करोड़ रुपए तक जा पहुंचा है। भदोही, मिर्जापुर, वाराणसी व कश्मीर के बाद हरियाणा, राजस्थान व दिल्ली तक अपना पांव पसार चुके इस उद्योग में मंदी का ही असर है कि धीरे-धीरे लोग सस्ती क्वालिटी की ओर मुखातिब हो रहे हैं। सबसे पहले तिब्बती, गाबे, टफ्टेड, सुमैक, हैण्डलूम व शैगी ने बाजार को बनाये रखने में मदद की। इन कालीनों की खास बात यह रही कि भले ही ये सस्ते थे, किन्तु इनके उत्पादन की जिम्मेदारी भारतीय श्रमिकों पर ही रही, इससे छोटे-बड़े सभी श्रमिकों का पेट भरता रहा।

जबसे विश्व में मन्दी का दौर शुरु हुआ, हर तरफ सस्ते कालीनों की मांग होने लगी। इसमें सिंथेटिक कालीनों ने सभी को पछाड़ दिया। हाथ से बुने कालीनों के आगे यह कालीन सब्जी के भाव बिक रहा है। प्रमुख कालीन निर्यातक शाहिद हुसैन अंसारी ने बताया कि सिंथेटिक कालीनों की माग बढ़ी, तो इसका लाभ सबसे पहले चीन ने उठाया। इसी का नतीजा है कि पिछले एक-दो सालों में चीन व मध्य एशिया से सिंथेटिक कालीनों का आयात बढ़ा है। उन्‍होंने कहा कि ये सस्ते कालीन भारत के मेट्रो शहरों सहित बडे शहरों के मॉल्स व शापिंग सेंटर में खूब बिक रहे हैं।

भारतीय कालीन उद्योग से वर्तमान में 15-20 लाख मजदूरों की रोजी-रोटी चल रही है, किन्तु सिंथेटिक कालीनों का बढ़ता आयात हमारे मजदूरों के लिये बहुत बडे खतरे का संकेत है। अंसारी ने कहा कि पूरी तरह मशीन से निर्मित यह कालीन पलक झपकते ही तैयार हो जाता है, लिहाजा भविष्‍य में लाखों गरीब मजदूरों का रोजगार छिन जाने की आशंका प्रबल हो गई है। लाखों मजदूरों के भविष्‍य का ध्यान रखते हुए यदि केन्द्र सरकार ने कोई गम्भीर कदम नही उठाए तो आने वाले समय में यह समस्या और भी गम्भीर हो जायेगी।

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