रविवार, 20 जून 2010

जीवन के लिए घातक बना कालीन नगरी का पानी

- भूगर्भ जल में बहाया जा रहा डाईंग प्लांट का जहरीला पानी 
- प्रदूषित जल के कारण बीमारियों में इजाफा
- जानकारी के बावजूद प्रशासन मौन 
भदोही/ उत्तरप्रदेश :  देश की कालीन नगरी भदोही जो प्रतिवर्ष ३५०० करोड़ रूपये विदेशी मुद्रा सरकार को देती है किन्तु इसी कालीन नगरी के लोग जहरीला पानी पीने को विवश है. जी हा यहाँ का पानी इतना प्रदूषित हो चुका है की लोगो के जीवन में यह ज़हर घोल रहा है और सरकार अभी तक कोई भी सार्थक कदम इस मामले में नहीं उठाई है . 
      कालीन नगरी में जल प्रदूषण की स्थिति भयावह रूप धारण कर चुकी है. जनपद की आधी आबादी स्वच्छ जल से कोसो दूर है.सबसे भयावह स्थिति भदोही नगर की है, जहा केमिकलयुक्त गन्दा पानी सीधे भूगर्भ जल में प्रवाहित किया जा रहा है. जिसके कारण भूगर्भ जल में खतरनाक केमिकल की मात्रा बढ़ गयी है. पूर्व में केन्द्रीय भूगर्भ जल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम नगर के कई स्थानों से पानी का नमूना लिया था जाँच के उपरांत आंकड़ा चौकाने वाला था विशेष रूप से आर्सेनिक व क्रोमियम की मात्रा चौंकाने वाली थी , प्रति लीटर पानी में आर्सेनिक ३.४ मिली. व क्रोमियम २.९ मिली. पाई गयी .
 आइये जानते है की कालीन नगरी के पानी को ज़हर बनाने में किसकी भूमिका अहम् है. कालीन नगरी के शहर में करीब दो दर्ज़न बड़े डाईंग प्लांट लगाये गए है, इसके अलावा दर्जनों की संख्या में कई कूड़ाघर है जिनमे कालीन में प्रयुक्त होने वाली काती की रंगाई की जाती है.आबादी के बीच स्थापित डाईंग प्लांट बिना जल शोधन किये केमिकल्युक्त पानी सीधे बोरिंग कर भूगर्भ जल में प्रवाहित कर रहे है, देंखे तो कालीन निर्माण की प्रक्रिया में एक किलोग्राम काती पर सौ लीटर पानी खर्च होता है. जिससे प्रमाणित होता है की लाखो लीटर भूगर्भ जल का दोहन करने के उपरांत उसे विषैला कर पुनः भूगर्भ जल में मिला दिया जाता है. जिससे उसमे व्याप्त कार्बनिक व अकार्बनिक रसायन का तेजी से आक्सीकरण होता है. जैव आक्सीकरण के कारण जल में उपस्थित घुलित आक्सीज़न की कमी इस हद तक पहुँच सकती है की उससे जलीय प्राणियों की मौत तक हो सकती है. 
  कालीन नगरी में डाईंग प्लांट के जहरीले जल को मिलाये जाने के गंभीर परिणाम सामने आये हैं, कई मुहल्लों में अपाहिज  बच्चे पैदा हुए या फिर पैदा होने के बाद अपाहिज हो गए . जनपद के एक भी स्थान पर  सीवर ट्रीटमेंट प्लांट नहीं है. जबकि नगर के अन्दर इसकी उपलब्धता  काफी मायने रखती है. चिकित्सको का कहना है की पानी में मिले जहरीले तत्व जैसे मैग्नेशियम  एवं सल्फेट की उपस्थिति से आंतो में जलन व खराबी आती है. फ्लोराइड से फ्लोरोसिस एवं नाइट्रेट  से मोग्लोविनेमिया नामक बीमारी हो सकती है. पानी में बढ़ी क्रोमियम,सीसा व कैडमियम से कोम अल्सर, स्नायुमंडल पर दुस्प्रभाव, रक्ताल्पता, सिर व जोड़ो में दर्द अनिद्रा,गुर्दे, फेफड़े व दिल की बीमारी व  बच्चा अपंग पैदा हो सकता है. ज़हर के रूप में तेजी से परिवर्तित हो रहे भूगर्भ जल की चपेट में आकर लोग अपनी जिन्दगी को दांव पर लगा रहे  हो किन्तु प्रशासन इस समस्या से मुह मोड़ कर स्थिति को और भी भयावह बना रहा है. 
भूगर्भ जल को दूषित कर लाखो लोगो की जिन्दगी से खिलवाड़ करने वाले डाईंग प्लाट संचालक मिनरल वाटर या शोधित जल पीकर खुद भले ही सुरक्षित हो किन्तु लाखो गरीब ऐसे है जिन्हें शुद्ध जल भी मयस्सर नहीं है. हालाँकि डाईंग पलट संचालक हमेशा इंकार करते हैं की जहरीला पानी नहीं मिलाया जाता किन्तु सोचना होगा की जहरीला पानी जाता कहा है. गौर करे तो नगर पालिका अंतर्गत जब सीवर का निर्माण हुआ था तो उस समय नगर की जनसँख्या २५ हजार के आसपास थी. उसी मानक के अनुसार सीवर लाईन का निर्माण किया गया . अब नगर की आबादी डेढ़ लाख के आसपास है. अर्थात घर के गंदे पानी को समाहित करने की क्षमता सीवर लाईन में नहीं है. दूसरी तरफ सीवर लाईन में डाईंग प्लांट का पानी बहाने की अनुमति भी नगरपालिका द्वारा  नहीं है. डाईंग प्लांट के आसपास नालियों में निगाह डाले तो उसमे डाईंग प्लांट का पानी दिखाई भी नहीं देता . यदि प्लांट संचालक भूगर्भ जल में पानी प्रवाहित करने से इंकार करते हैं तो लाखो लीटर खर्च होने वाला पानी जाता कहा है. ऐसा नहीं है की प्रदूषण विभाग व प्रशासन इनके कारनामो से अनजान है फिर कार्यवाही क्यों नहीं होती यह सोचनीय विषय है. 

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