शनिवार, 5 अप्रैल 2014

उत्तर प्रदेश-- जाति के चक्रव्यूह को कैसे भेद पायेगी भाजपा

जाति आधारित पार्टियों सपा बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की चुनौती
देश की राजनीति में मौजूदा समय एक अजीब सा माहौल बन चुका है। पहली बार देखा जा रहा है कि कोई एक व्यक्ति पार्टी से उपर उठकर चुनाव मैदान में उतरा हुआ है और यह माहौल सिर्फ एकतरफा ही नहीं वरन् हर तरफ से बना हुआ है। जो राजनीतिक सरगर्मिंया बढ़ी हुई हैं उसमें एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री प्रत्याषी नरेन्द्र दामोदर दास मोदी हैं तो दूसरी तरफ सारी राजनीतिक पार्टियां एकजुट होती दिखायी दे रही हैं। सर्वविदित है कि दिल्ली की कुर्सी पर वहीं विराजित होता है जिसके उपर उत्तर प्रदेष का हाथ होता है। वह हाथ चाहे बाहर से हो अन्दर से। हालांकि चुनावी सर्वे में यह बात उभर कर सामने आ रही है कि भजपा उत्तर प्रदेष में सबसे अधिक सीटे्र हासिल करने वाली पार्टी बनेगी, किन्तु सवाल यह भी उठता है कि यहां पर जातीय आधार पर ध्रुवीकरण हो चुके वोटों को भाजपा कैसे अपने पक्ष में कर पायेगी। क्या जाति के इस चक्रव्यूह को तोड़कर उत्तर प्रदेष में भजपा अपनी धमक जमा पायेगी।
गौरतलब है कि उत्तरप्रदेष कांग्रेस के हाथों से निकलने के बाद जाति आधारित पार्टियों ने अपनी जड़े जमा ली हैं। प्रदेष की सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी पिछड़ी जाति विषेश कर यादव वोटों पर अपनी बपौती समझने के साथ मुस्लिम वोट पर भी अपना अधिकार समझती है। वहीं दलितों की मसीहा बनकर उभर चुकी बहुजन समाजवादी पार्टी पिछले दो दषक से दलित वोटों पर अपना कब्जा जमाये हुये है। देखा यह भी गया है कि जबसे जाति आधारित दल सपा बसपा ने प्रदेष में अपना अधिपत्य जमाया है। तभी से सवर्ण जाति के वोटर अनिष्चय के हालात में जी रहे हैं। व्यापारी वर्ग के साथ सवर्ण वोट पर भाजपा का कब्जा भले ही समझा जाता रहा है किन्तु सपा बसपा के अस्तित्व में आने के बाद यह वर्ग भी गेंद की तरह कभी एक पाले में जाता है तो कभी दूसरे की गोद में बैठने के लिये विवष होता है। पिछले विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो समाजवादी पार्टी के सरकार में बढ़ते अपराध और कानून व्यवस्था से उबकर तथा बसपा की सोषल इंजीनियरिंग के चलते ब्राह्णों के साथ अन्य जाति के वोटरों ने भी प्रदेष की कुर्सी मायावती को सौंप दी। हालांकि मायावती के षाशनकाल में कानून व्यवस्था सख्त दिखायी दी किन्तु सत्ता में आते ही दलित समाज पर अंकुष सरकार नहीं लगा पायी। जिसका परिणाम रहा कि सवर्णों की जमीन पर कब्जा और भारी तादात में फर्जी एससी एसटी के मुकदमें होने लगे। यहां तक कि दलितों को बिजली का नंगा तार कहा जाने लगा। सवर्ण समाज अपमान के घूंट पीकर चुप रहने के लिये विवष रहा। जिसका परिणाम 2012 के विधानसभा चुनाव में दिखायी दिया। पूर्व के षासनकाल में हुई समाजवादी सरकार की लचर व्यवस्था को भूलकर लोगों ने फिर उसे सत्ता सौंप दी।
हालांकि यह कहा जा सकता है कि यह लोकसभा चुनाव है और विधानसभा चुनाव की गणित यहां मायने नहीं रखती। फिर भी जातीय समीकरण को नजरअंदाज इस चुनाव में भी नहीं किया जा सकता। सर्वे पोल भले ही भाजपा की बढ़त बता रहें हो किन्तु ऐसे सर्वेक्षण अधिकतर षहरी क्षेत्रों में किये जाते हैं जहां वोटरों का षिक्षित तबका रहता है। इसके इतर जातीय समीकरण ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रभावी होते हैं, जहां के वोटरों पर सपा बसपा जैसी जातीय पार्टियां प्रभावी हैं।
आज के चुनावी परिवेष में नजर डालें तो यह चुनाव दूसरे आम चुनावों से अलग दिखायी दे रहा है। भारतीय जनता पार्टी नरेन्द्र मोदी के हिन्दुत्व वाली छवि को भुनाने में लगी है तो और पार्टियों मोदी के विरोध में कथित धर्मनिरपेक्षता का राग अलाप रही हैं। अन्य दलों के निषाने पर भाजपा नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी दिखायी दे रहे हैं। अन्य दलों के नेता मोदी के खिलाफ जो तीर तरकष में से निकाल कर चल रहे हैं उसका उसका लबोलुआब यह है कि मोदी मुसलमानों के दुष्मन हैं और वे यदि सत्ता में आये तो मुसलमानों का जीना दूभर हो जायेगा।
उत्तर प्रदेष में सपा बसपा दो प्रमुख दल अभी तक यहीं समझ रहे हैं कि एक विषेश जाति के वोट बैंक पर उनका कब्जा है ही यदि मुस्लिम वोटरों को अपने पक्ष में कर लिया तो चुनावी नैया पार कर जायेंगे। सपा का घोशणा पत्र इस बात को खुद ही प्रमाणित कर रहा है। दूसरी तरफ बसपा की मंषा भी किसी से छुपी नहीं है, उसके पास वोट बैंक का एक बड़ा हथियार है जिसमें सेंध लगा पाना अन्य दलों के लिये टेढ़ी खीर ही है। प्रदेष में जातीय समीकरण के अनुसार ही उसने टिकटों का वितरण किया है। बसपा का अपना वोट बैंक और प्रत्याषी की जाति का वोट पाकर बसपा भी दिल्ली पहुंचने का सपना संजो चुकी है।
अब मुस्लिम समुदाय के मतों पर नजर डाली जाय तो वे अभी तक अनिष्चय की स्थिति में दिखायी दे रहे हैं। भले ही अपने भाशणों में मोदी विकास और सुषासन की बात कह रहे हैं किन्तु उनकी हिन्दूवादी छवि के कारण मुस्लिम वोट पर कुछ खास प्रभाव पड़ता दिखायी नहीं दे रहा है। मुस्लिम वोटरों की मंषा इस बार सपा या बसपा के पक्ष में नहीं बल्कि उसके पक्ष में दिख रहा है जो भाजपा के प्रत्याषी को परास्त करने की क्षमता रखता है।
लोकसभा चुनाव में मोदी के लहर की बात करें तो निष्चित रूप से मोदी की लहर चल रही है। विशेष कर युवा वोटरों पर मोदी का काफी असर दिख रहा है। मोदी की हिन्दुत्ववादी छवि इस बार काफी प्रभाव दिखा सकती है। इसका एक कारण यह है कि सपा का मुस्लिम प्रेम उसके वोट बैंक को रास नहीं आ रहा है। और दूसरा कारण यह भी है कि मंहगाई, भ्रश्टाचार के कारण कांग्रेस के षासनकाल से उब चुकी जनता अब उससे निजात भी पाना चाहती है। लोगों में यह चर्चा भी जोरों पर हो रही है कि दिल्ली की सत्ता पर कांग्रेस या भाजपा के अलावा दूसरा कब्जा करने में सक्षम नहीं है। सपा बसपा जैसे दल अंततागत्वा कांग्रेस को ही समर्थन देकर सत्ता सौंप देगी और उन्हें फिर वहीं त्रासदी झेलने के लिये विवष होना पड़ेगी। इसका असर यह है कि इस चुनाव में खुद अपनी सरकार चुनना चाहते हैं। भले ही भाजपा के लिये जातिगत चक्रव्यूह भेदना मुष्किल दिखायी दे रहा है किन्तु भाजपा के रणनीतिकार यदि ग्रामीण वोटरों पर अपनी पकड़ मजबूत कर लिये तो चुनावी हवा का रूख अप्रत्याषित रूप से बदल भी सकता है।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

क्या हम सचमुच सुरक्षित है।

दिल्ली में हुयी बलात्कार की घटना के बाद सेना के दो जवानों का पाकिस्तान के सैनिको द्वारा सर  काटे जाने की घटना को लेकर पूरा देश मर्माहत है। लोग वही लिख रहे हैं जो लोंगो को सुन्ना अच्छा लगा रहा रहा। यदि किसी ने विरोध जाता या फिर अपने विचारों को रखा तो गालियाँ खाने को मिली। पर कुछ मन में सवाल हैं जिनका जवाब लोंगो को चाहिए।
समाचारों के अनुसार पाक के सैनिक 200 मीटर हमारी सीमा में घुस आये और दो सैनिको को बुरी तरीके से मौत के घाट उतारा । इस घटना ने पूरे देश के साथ मुझे भी मर्माहत कर दिया है। भगवन न करे की ऐसा किसी के साथ भी हो। पर मन में कुछ सवाल भी उठा रहे हैं। पाक के सैनिक 200 सौ मीटर घुसे चले आये और हमारे सैनिक जो सीमा की पहरेदारी पर थे वे क्या कर रहे थे। पाक के नापाक इरादे कामयाब कैसे हुए। हमारे  सैनिको ने क्या उन्हें घुसते नहीं देखा ? क्या वहा पर सिर्फ दो सैनिक पहरा दे रहे थे। यदि हाँ भी तो उनकी निगाह बचाकर हमारी सीमा में कोई 200 मीटर घुस आता है और हमें पता भी नहीं चलता। यह भी तो हो सकता है की उनके साथ कुछ और आतंकियों की फौज आई हो जो आगे चलकर देश के अन्दर दंगा भड़काए। यह भी हो सकता है की हमारे बहादुर सैनिको ने उनका विरोध किया हो और कुछ दुश्मनों को मौत के घाट भी उतारा  हो और दुश्मन उनके शवों को लेकर चले गए हो और उस बात को दबा दिया गया। इस मुद्दे पर हमें दो पहलू से सोचना होगा। यदि हमारी सीमा में कोई अन्दर घुस आता है और दो सैनिको की निर्मम हत्या कर देता है। हमारे सैनिको को कुछ पता नहीं चल पाता तो यह बहुत ही दुखद स्तिथि है। क्योंकि हमारी सीमा में घुसने वालो को गोली से उड़ा देने के लिए कोई रोक नहीं है। यदि किसी ने उन्हें देखा नहीं तो इसका मतलब यह भी हो सकता है हमारे सैनिक मुस्तैद नहीं थे यदि होते तो कुछ लोंगो को मार गिराए होते। हालांकि भारतीय फौज की तरफ से कोई गोलीबारी की खबर नहीं आई। या हुयी तो वह दोनों सैनिको के साथ ही सूचना भी ख़त्म हो गयी। दोनों परिस्तिथियो में जाँच होनी चाहिए। क्योंकि सीमा पर तैनात लोग यदि मुस्तैद नहीं होंगे तो भविष्य में भी ऐसी घटनाये घटने की सम्भावना बरकरार है। और इसके पीछे यदि  घुसपैठ हुयी है तो भविष्य में देश  के अन्दर कोई बड़ी घटना हो सकती है। सैनिको की मौत पर शोक मानाने के साथ ही सर्कार को इस मसले पर गहन चिंतन करना होगा क्योंकि दोनों स्तिथि गंभीर है। 

कौन कहता है प्रलय नहीं हुयी ...?

बहुत दिनों से खबर पढने को मिल रही थी 2012 में दुनिया समाप्त हो जाएगी। इस खबर पर न्यूज़ चैनलो पर बड़े ही जोर शोर से प्रचारित भी किया जा रहा था। लोग चिंतित थे की दिसम्बर में दुनिया समाप्त होगी। 2012 बीत गया और लोग खुशियाँ मनाने लगे, राहत की साँस लिए की चलो दुनिया बच गयी। हो सकता है की दुनिया बच  गयी हो, पर भारत में प्रलय आई और लोंगो ने महसूस ही नहीं किया। मानव जीवन भले ही बच गया हो पर प्रलय को कोई भी नहीं रोक पाया। हमारा जमीर मर गया। हमारा स्वाभिमान मर गया और हम कहते हैं की प्रलय नहीं। क्या बचा है हमारे अन्दर। कहते हैं की जब इन्सान का सम्मान मर जय उसका स्वाभिमान मर जाय  तो उसके पास कुछ नहीं बचता है। हम जी रहे हैं। हमारी सांसे चल रही हैं पर हम जो जिन्दगी जी रहे हैं। क्या हम इसी जिन्दगी की अपेक्षा करते हैं। दिल्ली में दामिनी के साथ जो बलात्कार किया गया और उसके साथ जो बर्बरता की गयी वह मानवता को शर्मसार कर गयी। समाचार पत्रों में बलात्कार की घटनाएँ सुखियों में छपने लगी। एक बाढ़  सी आ गयी। लगाने लगा जैसे पूरे देश में सारे कम बंद हो गए हैं। सिर्फ बलात्कार हो रहे है, पता नहीं कितनी दमिनियाँ हैवानियत का शिकार हो गयी। देश के छोटे बढे सभी शहरों गावो में बलात्कार की घटनाएँ सामने आने लगी।
मन में सहज रूप से एक सवाल सा उठाना शुरू हो गया। यदि दामिनी के साथ वही घटना उसके गृह जनपद बलिया में घटी होती तो क्या सर्कार जागती। क्या इसी तरह आन्दोलन किया जाता। इसका जवाब भले ही लोंगो की नागाह में कुछ भी हो पर मेरी निगाह में सिर्फ ना ही है। क्योंकि बलात्कार की खबरे देश के कोने कोने से आना शुरू हो गयी किन्तु कही से भी आन्दोलन की खबरे नहीं आई। जिस जगह पर घटनाएँ हुयी वह के लोंगो का जमीर नहीं जागा क्योंकि जमीर तो मर चूका है। किसी ने बयां दिया था की दिल्ली में लोग टीवी पर आने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं। क्या उनका बयान सच नहीं है। यदि सच नहीं है तो देश के उन सभी जगहों पर आन्दोलन होने चाहिए थे जहाँ पर छोटी छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ। वे भी गरीब घर की बच्चियां थी, यदि वहां पर भी आन्दोलन होते तो शायद सरकार की आंख खुलती और उनके परिवारों को भी आर्थिक सहायता मिलती।
दामिनी के गाँव में राजनितिक रोटी सेंकने के लिए राजनेताओ का जमावड़ा लग रहा है। नेताओ को वोट की फिकर लगी है लिहाजा आर्थिक सहायता भी दी जा रही है। सभी राजनितिक लोंगो को यह भय सताने लगा है की कही दामिनी की लहर में उनका वोट बैंक न बह जाय ।
इसी बीच एक और घटना घटी भारत की सीमा की सुरक्षा करने वाले दो सैनिको की हत्या कर दी गयी। यहाँ किसी का जमीर नहीं जागा  कोई आन्दोलन नहीं हुआ। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री एक सैनिक को कन्धा देने पहुंचे पर उत्तरप्रदेश में वीर को कोई सम्मान नहीं मिला। प्रदेश की सर्कार डर  गयी शायद कही पाकिस्तान नाराज़ न हो हो जाय और वोट बैंक खिसक जाय।
सच में प्रलय आ चुकी है हमारा जमीर, मान सम्मान स्वाभिमान सब मर चूका है। यदि हम जिन्दा होते  तो पूरे देश में एक क्रांति आणि चाहिए थी ताकि पाकिस्तान की हिम्मत हिंदुस्तान को घूरने की नहीं होती और किसी मासूम का बलात्कार नहीं होता। 

शनिवार, 5 जनवरी 2013

राजनितिक वर्चस्व में लोकतंत्र की हत्या

भदोही ब्लाक प्रमुख चुनाव ने उठाये सवालिया निशान
राजनितिक वर्चस्व की जंग में क्या सचमुच लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। यह सवाल आज हर भदोही वासी के दिल में उठ रहा है किन्तु लोंगो के मन में भय है और कोई भी खुलकर बोलने से कतरा रहा है। चुनाव के दौरान जो हालात पैदा हुए क्या वह लोकतंत्र में होना चाहिए, यदि हां तो मान लीजिये की कोई भी व्यक्ति अब महफूज़ नहीं रह गया है।
बता दे की अब राजनीती सेवा का माध्यम नहीं बल्कि वर्चस्व और व्यवसाय का  माध्यम बन चूका है। यही वजह है की कोई भी व्यक्ति अब राजनीती को गन्दी बताकर इसमें आना नहीं चाहता है। शायद यह सही भी है   के दौरान जो हालात पैदा हो रहा है वह तो यही बता रहे हैं। 4 जनवरी को भदोही ब्लाक प्रमुख चुनाव में जो भी हुआ वह लोकतंत्र के लिए घातक है। मात्र 114 क्षेत्र पंचायत सदस्यों के लिए भदोही जनपद के सभी अधिकारी ही नहीं लगे थे बल्कि मिर्ज़ापुर और सोनभद्र से भरी संख्या में फ़ोर्स मंगाई गयी थी। चौरी रोड पर दो किलोमीटर की परिधि में कोई भी नहीं आ जा सकता था। सारी दुकाने बंद थी। कर्फ्यू जैसा माहौल था। लोंगो के दिलो में भय था। पूरा जनपद इस चुनाव को लेकर सशंकित था। लोग पल पल की ख़बरें ले रहे थे। यह मुकाबला प्रशांत सिंह और सुनीता यादव के बीच था। प्रिंट मीडिया में जो खबरे आई उसमे साफ साफ लिखा गया की यह मुकाबला प्रशांत और प्रह्ससं के बीच था। क्षेत्र पंचायत सदस्यों के डर का आलम यह था की वे लोग एक ट्रक में मवेशियों की तरह बैठकर आये। आखिर यह डर किससे था। आखिर उन्हें क्यों डर सता रहा था की वे सुरक्षित मतदान स्थल तक नहीं पहुँच पाएंगे। आने के बाद भी उन्हें प्रशासन द्वारा घंटो बैरियर पर क्यों रोक लिया गया। चैनलों पर खबर आने के बाद ही उन्हें मतदान की अनुमति मिली। आखिर क्यों? यह सवाल अभी तक लोंगो के दिलों में है।
सबसे बड़ी बात यह है की हजारों लोंगो का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षेत्र पंचायत सदस्य इतने नासमझ कैसे हो गए की उन्हें अपना वोट देने भी नहीं आया। कुल पड़े 112 मतों में 23 मत अवैध घोषित हो गए। यह एक आश्चर्य नहीं तो और क्या है। जिन जनप्रतिनिधियों को जनता ने ही चुन कर अपना प्रतिनिधित्व करने भेजा वे खुद वोट देना नहीं चाहते। यदि 114 लोंगो को वोट देने के लिए पूरा प्रशासन ऐसे ही लगा रहा तो सामान्य चुनाव कैसे होंगे।
लोंगो को सोचना होगा की लोकतंत्र की स्थापना इसलिए हुयी थी की लोग अपना वोट बिना किसी भय के देकर अपनी सर्कार अपनी इच्छा के अनुरूप चुन सके। पर जिस तरह राजनीती में अपराध का बोलबाला बढ़ता जा रहा है क्या यह आने वाले दिनों में लोकतंत्र के लिए घातक नहीं है। शायद ऐसे ही हालत धीरे धीरे हर जगह हो रहे हैं। यदि इसी तरह हालात बनते रहे तो लोंगो को मंथन करना होगा की आने वाले दिनों में देश के हालात क्या होंगे। 

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

थैंक्स गॉड दामिनी को बुला लिया

आज सुबह उठा तो फिजा में कुहरा छाया हुआ था। सोच रहा था की ऐसे मौसम में कहा जाये। घर से बाहर सड़क पर निकला तो कुछ मित्र मिले और उनके मुह से यह सुनते ही जैसे सदमा  लगा की दामिनी मर गयी। दिल के किसी कोने में दर्द का एहसास हुआ। महसूस हुआ की आँखों में कुछ नमी सी आ गयी है। दिल उदास हो गया। जिसके लिए लाखो लोग दुआएं कर रहे थे उसे भगवान  ने क्यों बुला लिया।
ओह याद आया भगवान् ने लोंगो की दुआएं सुन ली तभी तो उसे अपने पास बुलाया। लिखने का कुछ मन नहीं हो रहा रहा था। पर सुबह की मौन संवेदना में ऊपर वाले से बात करने का जो एहसास हुआ। सोचा उसे ही लिख डालू।
जिस दिन दामिनी के साथ घटना घटी उसी दिन से वह असहनीय पीड़ा के दौर से गुजर रही थी। उस दिन
शाम को वह जब घर से फिल्म देखने  निकली होगी तो मन में उमंगें होंगी। वह भविष्य के सपने बुन रही होगी जैसे तमाम लड़कियां अपने जीवन के सपने बुनती होंगी। कितनी मस्ती में पोपकोर्न खाते हुए फिल्म देखि होगी। वह से जब घर के लिए निकली होगी तो उसे एहसास भी नहीं होगा की कुछ हैवानियत के दरिन्दे उसकी जिन्दगी को तबाह करने का कही मंसूबा बना रहें होंगे। देखते ही देखते उसका जीवन एक ऐसे हादसे का शिकार हो जायेगा की उसका अंतिम पड़ाव सिर्फ मौत ही होगी।
हे प्रभु तुम बहुत ही दयावान हो। वे लोग नासमझ हैं जो तुम पर इलज़ाम लगते हैं की तुम्हे किसी की भावनाओ का ख्याल नहीं रहता। तुम किसी के दर्द को एहसास नहीं करते। गलत हैं लोग तुम तो बहुत ही दयालू हो। तुम्हे पता था की वह कितने दर्द से गुजर रही थी। उसका शरीर एक शरीर नहीं बल्कि डाक्टरों के लिए प्रयोगशाला बन गया था। जिस तरह एक मिटटी के खिलौने को कुम्हार बनाता और तोड़ता है उसी तरह तो दामिनी के  साथ भी हो रहा था। कुछ लोग उसके घायल जिस्म को राजनीती का आखाडा भी बना दिए थे। भगवन बहुत अच्छा किया जो उसे अपनी पनाह में बुला लिया। वह बच  भी जाती तो क्या होता। उसके साथ जो हुआ क्या वह एहसास उसे जीने देता। बलात्कारियों ने तो सिर्फ एक बार ही हैवानियत दिखाई। पर हमारे नेता चुनाव के दौरान बार बार उसके साथ बलात्कार करते। उसके ज़ख्मो को बार बार कुरेदा  जाता। उसे राजनितिक मुद्दा बना दिया जाता। उस दौरान उसे जो एहसास होता क्या वह जी पाती। शायद नहीं। जब वह बाहर निकलती तो क्या लोंगो की चुभती निगाहों को वह सहन कर पाती। आज जो लोग उसके लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। क्या उनकी निगाहे उसकी हंसी नहीं उड़ाते। क्या उसे उपेक्षा और तिरस्कार का दंश नहीं झेलना  पड़ता। लोंगो की निगाहों में सहानुभूति भी होती तो क्या वह सहन कर पाती।
दामिनी तुम भले ही चली गयी पर तुमने एक नयी बहस भी छेड़ दी है। लोंगो को जागरूक किया है। शायद तुम्हारे बलिदान का असर सर्कार पर हो और एक नए कानून का सृजन हो। हो सकता है कुछ और दामिनियाँ तुम्हारी वजह से बच  जाये। तुमने उन लडकियों को हिम्मत दी है। जो हालातों से घबरा जाती हैं। तुम मरी नहीं हो दामिनी बल्कि तुमने बलिदान दिया है। तुम महान  हो क्योंकि तू आततायियों के सामने झुकी नहीं बल्कि तुमने अपनी अस्मिता के लिए अपनी जान को न्योछावर कर दिया। तुम महान हो दामिनी। भगवान तुम्हारी आत्मा को शांति प्रदान करे।
भगवान् तुम्हे भी धन्यवाद की तुमने दामिनी को असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिला  दी।

                           दामिनी को सच्ची श्रद्धांजलि